<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489</id><updated>2012-02-16T09:35:40.264-08:00</updated><category term='ताने'/><category term='कहानी'/><category term='परदेसी'/><category term='लेडीज टेलर'/><category term='मैं और मौत'/><category term='गरीब आदमी'/><category term='माँ'/><category term='लड़की'/><category term='व्यंग्य'/><category term='मिसकॉल'/><category term='टाइमपास'/><category term='रिक्शावाला'/><title type='text'>गंदा बच्चा</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>41</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-7335561730018369493</id><published>2010-01-15T04:11:00.000-08:00</published><updated>2010-01-15T04:22:07.493-08:00</updated><title type='text'>कार वाले हॉकर...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1Bd0hR-qKI/AAAAAAAAAOA/hyIgcDpB5pI/s1600-h/Kamal+ji+Nagpal.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 208px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1Bd0hR-qKI/AAAAAAAAAOA/hyIgcDpB5pI/s320/Kamal+ji+Nagpal.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5426940707849808034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;('प्रताप केसरी' के संस्थापक-संपादक स्व.कमल नागपाल जी की आज पुण्यतिथि है)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;उन्हें गए कितने दिन हुए...एक और बरस बीत गया। एक से दो, दो से तीन, तीन से चार...इसी तरह बरस बीतते जाएंगे और हम हमेशा यही कहेंगे कि इतने साल हो गए उन्हें गुजरे, लेकिन यूं लगता है जैसे कल तक वे हमारे साथ थे। तारीखें बढ़ती रहेंगी पर दिन और रात तो वही रहेंगे। सभी के लिए नहीं तो कम-से-कम मुझ जैसों के लिए तो ऐसा होगा ही, जिन्हें लंबे समय तक उनके सान्नध्य का सौभाग्य मिला है। स्व. कमल नागपाल जी को श्रद्धांजलि के लिए कोई लेख या प्रशंसा-पत्र लिखना तो बेमानी ही होगा। उनके साथ बिताए लंबे समय की यादों ने मेरे मन की परतों के साथ जैसे एक किताब का रूप ले लिया है। उन्हीं परतों में से कुछ खोल रहा हूं।&lt;br /&gt;'दीपू, जल्दी काम निपटा लो। तुम्हें मेरे साथ चलना है।' उनका ये मैसेज मिलते ही मेरी उंगलियां दोगुनी तेजी से की-बोर्ड पर चलने लगती थी। स्वभाव से थोड़ा घुमक्कड़ हूं, लेकिन इसके अलावा भी कारण बहुत-से थे। उनके साथ हर बार कुछ नया सीखने का मौका मिलना और पूरे रास्ते गजलों का आनंद आदि के बारे में सोचकर ही मैं एनर्जी से भर जाता था।&lt;br /&gt;कार को साफ करने के बाद ऑफिस बॉय उसमें पानी की बोतल, टिफिन के साथ जरूरी सामान रखता, तब तक अंकल डायरी, पेन और दो-तीन लेटर पैड लेकर आ जाते। लेटर-पैड एक से ज्यादा इसलिए होते थे, क्योंकि एक-डेढ़ घंटे के सफर में न जाने कितनी खबरें उनके दिमाग में कैद हो जाती थीं। कार में रखे सामान पर नजर डालते हुए वे पूछते-'सब-कुछ आ गया?' ऑफिस बॉय हां में सिर हिलाता तो वे कहते-'सबसे जरूरी चीज नहीं आई। 'प्रताप केसरी' कहां है? टिफिन रह जाए, लेकिन अखबार नहीं रहने चाहिए।' &lt;br /&gt;ऑफिस बॉय दौड़कर जाता और अखबार का बंडल कार की पिछली सीट पर रख देता। ऊपर वाले का नाम लेकर हम रवाना होते। श्रीगंगानगर क्रॉस होते ही वे कभी भी मुझसे पूछ लेते-'हम कहां पहुंचे हैं?' मैं हड़बड़ाया हुआ-सा इधर-उधर ताकने लगता। कार के स्टीरियो की आवाज कम करते हुए थोड़ा डांटकर वे कहते-'गजलों में इतने गुम मत हुआ करो कि कहीं और ध्यान ही ना रहे। पत्रकार की तरह दो आंखें अंदर और दो आंखें बाहर रखा करो...।'&lt;br /&gt;वे कुछ और कहें, इससे पहले तीन-चार आदमी उनकी गाड़ी के पास आते। सभी को वे 'प्रताप केसरी' की एक-एक कॉपी देते। मैं बड़ी तल्लीनता से देखता। वे अपनी बात आगे बढ़ाते-'पत्रकार चार आंखें नहीं रखेगा तो अखबार किसी काम का नहीं रहेगा। इन गांव वालों के पास अखबार काफी देरी से पहुंचता है या फिर पहुंचता ही नहीं। कुछ गरीबी के कारण खरीद नहीं पाते। शुरुआत में एक-दो बार इनके लिए अखबार लाया तो ये हमेशा इंतजार करने लगे। प्रेस की गाड़ी देखते ही दुकानों-घरों से बाहर निकल गाड़ी के नजदीक आ जाते हैं।'&lt;br /&gt;वे मुस्कुराकर बोले-'इनके प्यार ने संपादक के साथ मुझे हॉकर भी बना दिया।'&lt;br /&gt;अचानक मेरे मुंह से निकल गया-'कार वाले हॉकर...।'&lt;br /&gt;वे बोले-'कार तो बाद में आई। हॉकर तो मैं पहले-से हूं।'&lt;br /&gt;हम दोनों जोर-से ठहाका लगाते हैं। बिलकुल ऐसे, जैसे दो हमउम्र दोस्त हों। इस हंसी और उनकी सादगी में तीस-पैंतीस साल का अंतर कहीं गुम हो जाता। उस ठहाके की आवाज आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है।&lt;br /&gt;...वी ऑलवेज मिस यूं अंकल।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-7335561730018369493?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/7335561730018369493/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=7335561730018369493' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7335561730018369493'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7335561730018369493'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2010/01/blog-post_15.html' title='कार वाले हॉकर...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1Bd0hR-qKI/AAAAAAAAAOA/hyIgcDpB5pI/s72-c/Kamal+ji+Nagpal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-3109491619304587680</id><published>2010-01-07T02:09:00.000-08:00</published><updated>2010-01-07T04:08:47.327-08:00</updated><title type='text'>मैंने किसी का दिल दुखाया है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S0W0P406U5I/AAAAAAAAAN4/G1Allik0NOc/s1600-h/sad-boy11.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 234px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S0W0P406U5I/AAAAAAAAAN4/G1Allik0NOc/s320/sad-boy11.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5423939511282979730" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दो रातों से सोया नहीं हूं। मैंने किसी का दिल दुखा दिया है, क्योंकि वही दिल मुझे बेवकूफ बनाता है। मेरी आंखों में आंसू लाता है। एक बार नहीं, बार-बार। कितनी बार माफ करूं। हर बार यही सोचता हूं कि एक मौका और...पर इस बार नहीं...। भरोसा टूटता है फिर जुड़ता है पर इतनी दरारें अच्छी नहीं। कुछ इतना बुरा हो कि दिलों में नफरत पनप उठे, इससे तो अच्छा है कि दूरियां बन जाएं। उसी की दोस्त के ऑरकुट प्रोफाइल में पढ़ा कि किसी के लिए कितना ही कर लो, कम पड़ ही जाता है...। रात को घड़ी देखते, एफएम सुनते, आंखें नम...। खुद से बातें होती हैं कि दो दिन हो गए, अब मुझे मान जाना चाहिए पर अगले ही पल खयाल आता है कि ऐसे मानने से क्या होगा कि फिर दुखी होने के लिए खुद को पेश करना...&lt;br /&gt;पागलों की तरह खुद से यूं ही बड़बड़ाता रहता हूं। आज जल्दी ऑफिस आना था। आते ही एक प्रेम कहानी टाइप करने को मिल गई। लेखक की सच्ची कहानी। मुझे लगता है कि हर कहानी सच्ची होती है, बस यूं ही लिखने वाले 'यह कहानी और इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं' जैसी बातें लिख देते हैं।&lt;br /&gt;इस कहानी की एक लाइन थी-'मैंने तीन दिन से कुछ नहीं खाया, फिर लोग रसोई क्यों बनाते हैं?'&lt;br /&gt;बहुत दर्द है इस लाइन में पर इसे वही समझे, जिसके पास दिल हो। मैंने भी कहा, अब तक मैंने गर्म कपड़े नहीं पहने, फिर लोग क्यों गर्म कपड़े खरीदते हैं। ठंड दिनोंदिन बढ़ रही है। मुझे तो वैसे भी ठंड ज्यादा लगती है। पिछले साल तक ठंड में इनर के अलावा दो-दो जींस पहनने वाला इस बार सर्दी के कपड़े पैक कर चुका हूं। ऑफिस में किसी ने बोला-तुहें ठंड नहीं लगती? झूठी मुस्कान के साथ मैंने भी झूठ बोल दिया-सुबह इतने गर्म पानी से नहाता हूं कि वो गर्मी दिनभर ठंड का अहसास ही नहीं होने देती।&lt;br /&gt;कैसे बताता उसे असली कारण। बताऊं भी क्यों, जब मम्मी को नहीं बताया। दो दिन पहले फोन पर उनसे बतियाते हुए रुलाई फूट पड़ी तो फोन काट दिया। स्विच ऑफ कर दिया। घंटे बाद ऑन किया तो पहला फोन घर से। मां है न, सब समझ जाती है। बोलीं-रोया क्यों, फिर कुछ हुआ क्या?&lt;br /&gt;मैंने फिर झूठ बोला-नहीं, चार्जिंग खत्म हो गई थी। अब फोन रखो, मुझे नहाने जाना है। नहाकर निकला, तब तक कुछ कॉल्स मोबाइल पर मिस हो चुकी थी। उसकी नहीं, जिसके कारण रोया, सभी कॉल घर से थी। काश...उसकी होती। खुद को चपत लगाकर बोला-आय एम मजबूत मैन।&lt;br /&gt;मजबूत मैन इसलिए, क्योंकि अंग्रेजी में हाथ तंग है। मजबूत का अंग्रेजी शब्द ध्यान नहीं आया। ठंडे मारबल के फर्श पर गीला तौलिया लपेटे पूजा करते हुए भगवान में ध्यान नहीं लग रहा था। ठंड से कंपकंपी छूटते आंखों में पानी आ गया है। लग रहा था कि अगले पल जान निकल जाएगी। काश, निकल जाती...&lt;br /&gt;&lt;em&gt;तुमसे ना मिलके खुश रह पाएंगे,&lt;br /&gt;वो दावा किधर गया...&lt;br /&gt;दो रोज में गुलाब सा चेहरा उतर गया...&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-3109491619304587680?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/3109491619304587680/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=3109491619304587680' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3109491619304587680'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3109491619304587680'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='मैंने किसी का दिल दुखाया है...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S0W0P406U5I/AAAAAAAAAN4/G1Allik0NOc/s72-c/sad-boy11.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-3388655784572109872</id><published>2009-12-09T08:36:00.000-08:00</published><updated>2009-12-09T09:02:15.325-08:00</updated><title type='text'>हंगर ज़ीरो</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sx_XkPJ3hcI/AAAAAAAAANs/V2a3WDmA-BA/s1600-h/76.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 186px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sx_XkPJ3hcI/AAAAAAAAANs/V2a3WDmA-BA/s320/76.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413282294665807298" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कल मानव अधिकार दिवस है।&lt;br /&gt;हम कैसे इस दिवस को मना सकते हैं जब हम लोगों को दो जून की रोटी नहीं दे पाए हैं। इस निजाम ने तो इनसान के निवाले छीनने शुरू कर दिए हैं। दाल-रोटी के ही दाम आसमान चीरते जा रहे हैं। अधिकारों की बात तो तब हो, जब पेट भरा हुआ हो।&lt;br /&gt;महंगाई का ग्राफ घर की लक्ष्मियों के ही प्राण हर रहा हो तो कल्पना कीजिए उस गरीब की जिसकी आय में कोई स्थिरता नहीं है।&lt;br /&gt;सामर्थ्यवान मॉल्स-रेस्त्रा में हजारों रुपए का बिल भले ही चेहरे पर शिकन लाए बिना चुका देते हैं, लेकिन मेहनतकश को एक-एक रुपया भी माथे पर बल डालकर देते हैं, वह भी उसका पसीना सूखने के बाद...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजमेर रोड के किनारे झुग्गी के बाहर बैठी सरिता को नहीं मालूम कि उसे आज रात का खाना नसीब होगा या नहीं। बढ़ती महंगाई ने आम आदमी का बजट तो बिगाड़ा है, साथ ही भीख मांगकर गुजारा करने वालों का निवाला भी छीन लिया है। सरिता कहती हैं कि अब लोग रोटी गिनकर बनाने लगे हैं। सब्जी भी उतनी बनाते हैं, जितनी जरूरत। बासी रोटी-सब्जी बचती नहीं और हमें खाली हाथ लौटना पड़ता है। सरिता जैसे न जाने कितने लोग आधा पेट भरकर संतोष करते हैं या किसी रोज भूखे पेट सोना भी उनकी मजबूरी है। कल मानवाधिकार दिवस है। जब तक देश का एक भी नागरिक भूखे पेट सोने पर मजबूर है, तब तक बाकी मानवाधिकारों की बात करना बेमानी ही है। 'दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओं' जैसे मुहावरे भी आज आम आदमी की पहुंच से दूर हो गए हैं, क्योंकि दालें अब 90 रुपए तक पहुंच गई हैं। चीनी के दोगुने हुए दामों ने आम आदमी की जिंदगी में बची मिठास भी गायब कर दी है। राशन कार्ड पर कुछ किलो दाल, चावल मुहैया करवाकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। हंगर जीरों और प्रत्येक नागरिक को सम्मान के साथ भोजन देने की घोषणाएं अभी दूर दिखाई देती हैं, लेकिन बढ़ती महंगाई ने आम आदमी को पेट काटने पर मजबूर कर दिया है। भीख मांगकर गुजारा करने वालों से लेकर बिजनेस क्लास फैमिली तक महंगाई के जैसे सवाल पूछे तो दर्द शब्दों में फूट पड़ा...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नहीं मिलता बासी खाना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दो बच्चों की मां अनुराधा परेशान है। कई दिन हुए घर का चूल्हा नहीं जला। भीख में रोटी की जगह आटा-दाल देने वाले लोग अब महंगाई के ताने देने लगे हैं। अनुराधा कहती हैं कि पहले रोटी नहीं मिलती थी तो घरों से मिले आटे से खुद खाना बनाकर पेट भरते थे पर अब लोग हमें आटे-दाल का भाव सुनाकर भगा देते हैं। खुद तो कभी भूखे भी रह सकते हैं, लेकिन छोटे बच्चों को तो खाना खिलाना ही है। मेरे पति गलियों में झूला चलाते हैं। अब लोग रोटी-सब्जी की बजाए एक-दो रुपए दे देते हैं पर इतने पैसों से खाने का कुछ भी नहीं मिलता। पंद्रह-बीस लोगों से मिली चिल्लर से आटा खरीद लें तो उसे पकाने व सब्जी की समस्या रहती है। घरों से कुछ नहीं मिलता तो मंदिर-गुरुद्वारे से मिल जाता है। दूध के भाव भी बढ़ गए हैं तो बच्चे का दूध कम कर दिया है। चीनी महंगी हुई तो अब नहीं खरीदते। प्रसाद में बताशे मिलते हैं, उन्हें कूटकर दूध में मिला देती हूं। कभी कोई सदस्य बीमार हो जाए तो आफत आ जाती है। दवाई खरीदने में ही जान निकल जाती है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब घर कैसे जाएं&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;चार साल पहले झारखंड से परिवार सहित जयपुर आकर बसी बसंती देवी घरों में बाई का काम करती हैं। पति चौकीदारी करते हैं। दो बेटे व दो बेटियां हैं। वे बताती हैं हम दोनों की कमाई से पहले मकान का किराया, बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च चल जाता था, लेकिन बढ़ी महंगाई ने जैसे खुशियां ही छीन ली हैं। पहले हम सभी हर छह महीने बाद परिवार से मिलने झारखंड जाते थे, लेकिन अब इतनी बचत नहीं हो पाती कि घर जाने के लिए किराया जुटा सकें। इसी कारण अब तय किया है कि सालभर से पहले गांव नहीं जाएंगे। बेटे ने देखा कि महंगाई के कारण अब घर चलाना मुश्किल हो रहा है तो उसने पढ़ाई छोड़ दी। अब वह दवाई की फैक्ट्री में काम करता है। इससे कुछ आर्थिक मदद तो मिली पर उसकी पढ़ाई छूटने से मन बहुत दुखी है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बच्चों की पढ़ाई में कटौती&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हम दोनों पति-पत्नी झाड़ू-बुहारी करके तीनों बेटों को खूब पढ़ाने-लिखाने का सपना संजोए थे, लेकिन बढ़ती महंगाई ने परेशान कर दिया है। सफाईकर्मी सीमा डंगोरिया कहती हैं कि बेटों की परीक्षाएं नजदीक हैं तो सोचा था कि बच्चों को ट्यूशन दिलाऊंगी पर अब यह मुश्किल लगता है। डर है कि कहीं बच्चों की पढ़ाई बीच में ना रुकवानी पड़े। आटा, दाल, चीनी, सब्जी के भाव बढ़ने से रसोई पर संकट आ गया है। बाकी चीजों के बिना गुजारा हो सकता है, लेकिन रोटी खाए बिना तो नहीं रह सकते। सब्जी महंगी थी तो दाल-चावल से काम चलता था पर अब तो दालों के भाव भी आसमान छू रहे हैं। कीमतें बढ़ानी हों तो अमीरों के काम आने वाली चीजों की बढ़ाएं। वे लोग तो अपनी बचत व फालतू खर्च में कटौती कर सकते हैं, लेकिन गरीब दो वक्त की रोटी भी नहीं खाएगा फिर काम कैसे करेगा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लौटना पड़ा काम पर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;तीन साल पहले तक कीर्ति एक स्कूल में पढ़ाती थीं। मां बनने के बाद उन्होंने जॉब नहीं करने का फैसला किया। कीर्ति बताती हैं कि मैं अपना पूरा ध्यान बेटे की परवरिश पर देना चाहती थी, लेकिन महंगाई बढ़ने से घर का बजट बिगड़ने लगा था। बेटे का स्कूल में एडमिशन करवाया तो बढ़ती फीसों से सिर चकराने लगा। यहीं आकर मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा और मैंने दोबारा जॉइन की। इससे बच्चे को कुछ कम टाइम दे पाती हूं, लेकिन अब जॉब करना बहुत जरूरी हो गया है। पति प्राइवेट जॉब में हैं। दोनों मिलकर मैनेज कर रहे हैं। मुझे हैरानी होती है कि मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी चीजों के दाम बढ़ाकर आम आदमी का जीना दूभर क्यों किया जा रहा है। सरकार चाहे तो इलेक्टि्रक आइटस और लग्जरी चीजों के दाम बढ़ाए, ताकि आम आदमी पर असर नहीं पड़े।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मनोरंजन की छुट्टी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आर्थिक रूप से संपन्न होने का मतलब यह नहीं कि महंगाई बढ़ने से कुछ असर ही ना पड़े। सोसायटी के साथ खुद को अपडेट रखना जरूरी होता है, लेकिन महंगाई बढ़ने से मैनेज करना मुश्किल हो गया है। हाउसवाइफ रेणुका शर्मा बताती हैं कि रसोई महंगी हुई है, लेकिन छोटे बच्चे हैं और हेल्थ के साथ समझौता नहीं कर सकते, इसलिए खाने में कटौती नहीं की। पहल पूरी फैमिली हफ्ते में एक-दो मूवी देखती थी, वीकेंड पर घूमने निकलते थे, वहीं अब ऐसे मनोरंजन के खर्च कंट्रोल कर लिए हैं। पति बिजनेसमैन हैं। उनसे कहा है कि वे पॉकेटमनी बढ़ाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-3388655784572109872?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/3388655784572109872/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=3388655784572109872' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3388655784572109872'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3388655784572109872'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='हंगर ज़ीरो'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sx_XkPJ3hcI/AAAAAAAAANs/V2a3WDmA-BA/s72-c/76.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-8098645777308925946</id><published>2009-10-25T11:59:00.000-07:00</published><updated>2009-10-25T12:10:29.188-07:00</updated><title type='text'>मदद करें...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SuSh1riA8YI/AAAAAAAAANc/w5jqijAd1j4/s1600-h/1213270932_75154bb19c.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SuSh1riA8YI/AAAAAAAAANc/w5jqijAd1j4/s320/1213270932_75154bb19c.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396616197087228290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कुछ सवाल परेशान करते हैं। उन्हीं में से एक है कि भगवान हैं या नहीं? कोई कहेगा कि हां हैं तो कोई कहेगा नहीं हैं। इसी आधार पर इनसानों के दो हिस्से हो जाएंगे-आस्तिक और नास्तिक। काफी लोगों से यह सवाल पूछा। हां बोलने वाले ज्यादातर लोगों से मेरा अगला सवाल था कि भगवान कहां हैं? सभी से एक ही जवाब मिला-'हमारे मन में।' मेरा अगला सवाल कि भगवान हमारे मन में हैं तो फिर मन दुखी क्यों होता है? जहां भगवान हैं, वहां दुख तो होना ही नहीं चाहिए। जितने जवाब मिले, उनमें से एक जवाब था-'भगवान हमारे मन में हैं। जब हम भगवान से ज्यादा किसी को मानने लगते हैं तो भगवान को दुख होता है। भगवान को दुख होता है तो हमारा मन भी दुख पाता है, क्योंकि मन में भगवान हैं।'&lt;br /&gt;इस जवाब ने चेहरे पर हल्की मुस्कान तो ला दी, लेकिन संतुष्ट करने वाला जवाब अभी नहीं मिला। कुछ दिन भगवान के साथ बिताने की तमन्ना है। ऐसा हो सका तो कुछ दिन बाद शायद मैं इस सवाल का बेहतर जवाब दे सकूंगा। आपके पास इस सवाल का कारण सहित जवाब हो तो मदद करें...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-8098645777308925946?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/8098645777308925946/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=8098645777308925946' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8098645777308925946'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8098645777308925946'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='मदद करें...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SuSh1riA8YI/AAAAAAAAANc/w5jqijAd1j4/s72-c/1213270932_75154bb19c.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-1910577208757059949</id><published>2009-09-09T11:28:00.000-07:00</published><updated>2009-09-09T11:52:17.007-07:00</updated><title type='text'>बीवी बड़ी या ब्लॉग?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sqf5USg09KI/AAAAAAAAANU/TvAhEEiifMM/s1600-h/image001.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 218px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sqf5USg09KI/AAAAAAAAANU/TvAhEEiifMM/s320/image001.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379542406879573154" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;काफी वक्त पहले यूं ही हमसे किसी ने पूछा था कि अक्ल बड़ी या भैंस? मैंने भी वैसा ही जवाब दे दिया कि भैंस तो देखी है, जरा अपनी अक्ल के दर्शन करवा दें तो आपके सवाल को एकदम सही हल कर दूं। ...खैर, अब एक नई कहावत रचने का मन है-बीवी बड़ी या ब्लॉग? देखा तो सभी ने बीवी को भी है और ब्लॉग को भी, लेकिन जवाब सभी का अलग-अलग हो सकता है। इस पोस्ट को प्रकाशित करने की राजीव जैन जी ने सहर्ष अनुमति दे दी है। अपने राजीव जैन जी की 'शुरुआतं' (www.shuruwat.blogspot.com) कइयों को ब्लॉगिंग की दुनिया में लाने की प्रेरणा बनी है। ब्लॉगिंग की तकनीकी जानकारी के लिए आज भी राजीव जी का नाम ही सबसे पहले जुबां पर आता है। वैसे बात बीवी और ब्लॉग की हुई है तो इसका कारण भी अपने राजीव ही हैं। ब्लॉगिंग की दुनिया के चमकते सितारे होने के अलावा किसी जमाने में जी-टॉक पर भी वे चौबीस घंटे ऑनलाइन नजर आते थे। ऑरकुट मे 'अजब है जिंदगीं' टाइटल के साथ भी वे सक्रिय थे, लेकिन आजकल वे गायब-से रहने लगे हैं। स्कूलों में बच्चों का नया सेशन शुरू हुआ तो इन्होंने भी सोचा कि क्यों न अजब जिंदगी को सच्ची में अजब बनाने के लिए जिंदगी का नया सेशन शुरू कर लें। इस तरह एक जुलाई को राजीव जी बने दूल्हा और हो गई जिंदगी की नई शुरुआत। इस बीच छूट गया ब्लॉगर्स साथियों का साथ। कभी एक दिन में दो-दो पोस्ट लिखने वाले राजीव जी महीनेभर का गैप देने लगे हैं। तीस अगस्त को 'आज मैंने किराए पर दो रुपए ज्यादा दिए' लिखा। इससे ठीक एक महीना पहले उन्होंने तीस जुलाई को 'राजस्थान में हर आदमी आरक्षितं' पोस्ट लिखी थी और इससे पहले शादी के ठीक बीस दिन बाद ऑफिस लौटने पर कुछ लिखा तो नहीं पर एक मित्र के साथ हुई चैटिंग को ब्लॉगर्स से रूबरू करवाया था। अभी उनसे शादी की तारीख पूछी तो जवाब मिल गया, लेकिन सगाई की तारीख पूछी तो जरा सोचने के बाद वे बोले-याद नहीं, बीवी से पूछना पड़ेगा।&lt;br /&gt;ये वही राजीव जैन हैं, जिन्होंने सभी ब्लॉगर साथियों को एक मंच पर लाने के लिए 'लिंक रोड' बनाई है। पहले फिल्म समीक्षा और हर छोटी-बड़ी घटना पर लिखने वाले राजीव जी ने शायद शादी के बाद कोई फिल्म भी नहीं देखी है। एक फिल्म देखते हुए उन्हें अक्षय कुमार की गर्दन के सफेद बाल तक नजर आ गए थे। शादी के बाद शायद कोई फिल्म उन्होंने देखी भी हो, लेकिन अब सफेद बाल या किसी और चीज पर उनकी टिप्पणी 'शुरुआत' पर नजर नहीं आई। अभी दो दिन पहले हमने ब्लॉग से नाराजगी का कारण पूछा तो उनके मुंह खोलने से पहले जैसे उनकी आंखें हॉकिंग्स विज्ञापन के अंदाज में बोल पड़ीं-'जो बीवी से करे प्यार, वो ब्लॉगिंग से करें इनकार...।' चलिए, बहुत हुआ। राजीव जी को शादी की बधाई दीजिए। चलते-चलते 'शुरुआत' पर मार्च से अब तक लिखी गईं पोस्टों पर एक नजर। देखिए, घंटों का अंतर महीने में कैसे बढ़ा... &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;7 मार्च: &lt;/strong&gt;एक अच्छी हॉरर फिल्म है 13-बी&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;8 मार्च: &lt;/strong&gt;चल बसा एक गुमनाम सांसद&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;16 मार्च:&lt;/strong&gt; क्या किसी ने देखे हैं भूत?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;18 मार्च: &lt;/strong&gt;आमिर का नया गेटअप&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;21 मार्च:&lt;/strong&gt; बाप रे, सत्तर हजार की जगह सात लाख रुपए&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;22 मार्च:&lt;/strong&gt; सरेआम फांसी की सजा सुनाने वाले जज विदा&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;24 मार्च&lt;/strong&gt;:&lt;/strong&gt; बीमा एजेंटों के काम का सबूत हैं अखबार&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;1 अप्रेल:&lt;/strong&gt; आज तो सही में गार्ड ने भगा दिया&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;1 अप्रेल:&lt;/strong&gt; मुझे नहीं बनना टीवी पत्रकार&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;4 अप्रेल:&lt;/strong&gt; एकदम पकाऊ तस्वीर, गले नहीं उतरती कहानी (समीक्षा)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;9 अप्रेल:&lt;/strong&gt; सिर्फ तस्वीरें और कैप्शन&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;12 अप्रेल:&lt;/strong&gt; बाप रे, एक और मंदिर&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;14 अप्रेल:&lt;/strong&gt; इतने डे क्या कम थे, जो मेट्रीमोनी-डे भी आ गया&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;18 अप्रेल:&lt;/strong&gt; सर्किल नहीं, मौत का कुआं है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;23 अप्रेल:&lt;/strong&gt; असमंजस, क्या हम सही हैं?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;27 अप्रेल:&lt;/strong&gt; काश, ऑनलाइन मिलता खाना&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;6 मई:&lt;/strong&gt; जयपुर की सड़क पर ये स्टंट&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;13 मई:&lt;/strong&gt; जयपुर में विस्फोट के एक बरस बाद&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;15 मई:&lt;/strong&gt; हर गलती सजा मांगती है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;3 जून:&lt;/strong&gt; आखिर बेच डाली छह सौ किलो रद्दी&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;21 जुलाई:&lt;/strong&gt; शादी के बाद...(इस पोस्ट में सिर्फ चैटिंग को कॉपी-पेस्ट किया गया)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;30 जुलाई:&lt;/strong&gt; राजस्थान में हर आदमी आरक्षित&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;30 अगस्त:&lt;/strong&gt; आज मैंने किराए पर दो रुपए ज्यादा दिए&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-1910577208757059949?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/1910577208757059949/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=1910577208757059949' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/1910577208757059949'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/1910577208757059949'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/09/blog-post_09.html' title='बीवी बड़ी या ब्लॉग?'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sqf5USg09KI/AAAAAAAAANU/TvAhEEiifMM/s72-c/image001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-1115079936920920950</id><published>2009-09-03T00:53:00.000-07:00</published><updated>2009-09-03T00:58:44.264-07:00</updated><title type='text'>श्यामलाल को घर जाना है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sp922NQ20BI/AAAAAAAAANE/68MIdZU1YEg/s1600-h/image011.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 214px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sp922NQ20BI/AAAAAAAAANE/68MIdZU1YEg/s320/image011.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377147153749037074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जब भी कोई किस्सा-कहानी किसी को सुनाता हूं तो अक्सर सामने से आवाज आती है कि ऐसा तुम्हारे साथ ही क्यों होता है...सभी लोग तुम्हे ही क्यों मिलते हैं? हर बार की तरह मेरा एक ही जवाब कि छोटी-छोटी बातों में कुछ बड़ा छिपा होता है। जरा-सा कुरेदकर देखो तो सब ओर कुछ किस्सा-कहानी है। इस कहानी का पात्र श्यामलाल है। श्यामलाल एक पेइंग गेस्ट हाउस में काम करता है। सभी को खाना सर्व करता है। हंसी-मजाक के साथ डांट भी सहन करता है। सब्जी में नमक कम-ज्यादा हो तो गलती कुक की, बर्तन पर परत जमी हो तो गलती बाई की, लेकिन सभी के हिस्से की डांट श्यामलाल के हिस्से में आती है। बावजूद इसके कभी चेहरे पर शिकन नहीं। वही फुर्ती  और मुस्कुराहट बरकरार। अब मैं वह पेइंग गेस्ट हाउस छोड़ चुका हूं, लेकिन सुबह उठते ही श्यामलाल की आवाज 'भैया, नाश्ता कर लीजिए...' बहुत मिस करता हूं।&lt;br /&gt;कुछ ही दिन पहले की बात है। एक साथी रिपोर्टर को कुछ लड़कियों के इंटरव्यू करने थे। अपने साथ पेइंग गेस्ट हाउस में ले गया। श्यामलाल को बुलाया गया। वह रिपोर्टर को लड़कियों के पास ले गया। रिपोर्टर को छोड़कर श्यामलाल मेरे पास आया और बोला-भैया, एक फोटो मेरा भी खींच दो।&lt;br /&gt;मेरा जवाब-अभी सिर्फ लड़कियों के फोटो चाहिए। बाद में कभी देखेंगे।&lt;br /&gt;श्यामलाल-नहीं, अखबार में फोटो नहीं छपवाना। घर भिजवाना है। सालों हो गए, घर गए। फोन आता है तो कहते हैं एक फोटो भेज दे।&lt;br /&gt;मेरा जवाब-तो घर क्यों नहीं जा आते।&lt;br /&gt;श्यामलाल-जाना है पर अभी कुछ पैसा और कमा लूं, फिर एक ही बार जाऊंगा।&lt;br /&gt;श्यामलाल की ख्वाहिश पूरी हो, इससे पहले रिपोर्टर आती हैं। उन्हें जल्दी है और शायद कैमरे की बैटरी भी खत्म हो गई है। बाहर निकलते हुए दुखी महसूस करता हूं कि श्यामलाल की फोटो नहीं हो पाई। उसे आश्वासन देता हूं कि अगली बार जल्दी तुम्हारी फोटो करेंगे। &lt;br /&gt;बड़ी-सी मुस्कुराहट के साथ श्यामलाल का जवाब-कोई बात नहीं भैया, जब कैमरा लाओ, तब फोटो कर देना...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(श्यामलाल हमेशा मुस्कुराता रहता है। फोटो का यह चेहरा श्यामलाल का नहीं, लेकिन शायद इसे भी घर जाना है...)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-1115079936920920950?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/1115079936920920950/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=1115079936920920950' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/1115079936920920950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/1115079936920920950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='श्यामलाल को घर जाना है...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sp922NQ20BI/AAAAAAAAANE/68MIdZU1YEg/s72-c/image011.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-8638424145426389156</id><published>2009-07-29T03:46:00.000-07:00</published><updated>2009-07-29T04:05:57.724-07:00</updated><title type='text'>जवाब मिल गया है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SnAs-xa1IsI/AAAAAAAAAM8/ipV_fa0tRsU/s1600-h/friendship_wallpaper_4_800x600.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 274px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SnAs-xa1IsI/AAAAAAAAAM8/ipV_fa0tRsU/s320/friendship_wallpaper_4_800x600.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5363836613127643842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कुछ सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। स्वयं का अनुभव है कि कोई सवाल परेशान कर रहा हो तो भगवान से उसका जवाब मांगें। देर हो सकती है, लेकिन खुली या बंद आंखों में ख्वाब बनकर ऊपर वाला जवाब जरूर देता है। ...खैर, यह ख्वाब से जवाब का अनुभव कुछ व्यक्तिगत है, इसलिए नहीं बता सकता। हां, एक बहुत पुराने सवाल का हल शायद मिल गया है। लगभग दो महीने पहले बेस्ट फ्रेंड था तो एक छोटी-सी पोस्ट के जरिए सभी ब्लागर्स से यह जानने की कोशिश की कि दोस्ती है क्या? दुख हुआ कि बिना पढ़े टिपियाने की आदत से मजबूर बंधुओं ने ई-मेल और ब्लॉग पर टिपियाने की औपचारिकता पूरी की। नतीजतन, वह सवाल सिर्फ सवाल ही रह गया। अब इतवार को फ्रेंडशिप-डे है तो स्टोरी के लिए कुछ लोगों के इंटरव्यू किए। 'दोस्ती´ पर न जाने कितना कुछ सुनने के बाद भी यूं लगा कि जवाब नहीं मिल पा रहा है। डेली न्यूज की बुधवारीय पत्रिका 'खुशबू´ में संपादक वर्षा भंभाणी मिर्जा की पाती की कुछ पंक्तियों से जैसे जवाब मिल गया है। उस पाती का एक अंश कुछ यूं है...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;...दोस्ती ऐसा अनूठा भाव है जो इस दुनिया को जीने लायक बनाता है। दोस्ती वह कंधा है, जो हर मुश्किल में मजबूत सहारा देता है। एक ऐसा दिल है, जहां आपकी सारी परेशानियां गहरे कुएं में दफन हो जाती है। ऐसा दिमाग है जो आपको तकलीफों के हल यूं सुझाता है जैसे कोई जादूगर अपने रुमाल से सफेद कबूतर निकालता है। यकायक भीतर से आवाज आती है कि ऐसा दोस्त आजकल मिलता कहां है...सब किताबी बातें हैं... मतलब के यार हैं सब... लेकिन क्या आपने कभी ऐसे दोस्त बनाने की कोशिश की है? किसी के आगे इतना समर्पण किया है? दोस्ती ऐसा ही समर्पण चाहती है। भक्त का भगवान के सामने जो समर्पण है, वैसा ही। अहं को त्याग जिस तरह एक सच्चा भक्त मंदिर में दाखिल होता है, वैसा प्रवेश अगर सखा के सामने हो तो मित्रता की सूरत कुछ और होगी। बेशक यह चयन आपका है...।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक मिले जवाबों में मुझे यह बातें ज्यादा मन को छूने वाली लगी। किसी की राय इससे इतर भी हो सकती है। बिना पढ़े टिपियाने की बजाए कुछ और बेहतर बताएंगे तो अच्छा लगेगा। शुक्रिया...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-8638424145426389156?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/8638424145426389156/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=8638424145426389156' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8638424145426389156'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8638424145426389156'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html' title='जवाब मिल गया है...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SnAs-xa1IsI/AAAAAAAAAM8/ipV_fa0tRsU/s72-c/friendship_wallpaper_4_800x600.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-7962212473039810361</id><published>2009-07-02T07:29:00.000-07:00</published><updated>2009-07-02T12:19:09.820-07:00</updated><title type='text'>मैं सुधर गई हूं!</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SkzFxs8V4fI/AAAAAAAAAM0/IXJWHSmwBUY/s1600-h/ATT454.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 283px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SkzFxs8V4fI/AAAAAAAAAM0/IXJWHSmwBUY/s320/ATT454.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353871514705191410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मेरे एक सहकर्मी की कॉलर ट्यून सुनिए-'आज की ताजा खबर...आओ काका जी इधर, आओ मामाजी इधर...ले लो दुनिया की खबर...´&lt;br /&gt;'सन ऑफ इंडिया´ फिल्म का यह गाना पत्रकारों की कॉलर ट्यून के लिए एकदम फिट है। अखबार में काम करने वाला हर श�स (पत्रकार भी और गैर-पत्रकार भी) दुनिया की नजर में पत्रकार ही होता है। कोई मिलता है तो 'हाय-हैलो´ की जगह ताजा खबर पूछता ही दिखता है।&lt;br /&gt;वैसे आज की ताजा खबर तो सभी को मालूम ही है। भारत में समलैंगिकों को कोर्ट की मंजूरी से कुछ पत्रकारों को भी मुसीबत झेलनी पड़ी। मेट्रो सिटिज को छोड़ें तो छोटे शहरों में ऐसे विषयों पर खबर लिखने वाले को भी तीखी नजरों का सामना करना पड़ता है। लगभग दो साल पहले लेस्बियन पर स्टोरी के दौरान मैंने एक समलैंगिक लड़की का फोटो सहित इंटरव्यू किया था। आज जैसे ही इसी टॉपिक पर खबर के आदेश हुए, सभी की नजर अपन की ओर दौड़ी। 'यार, कोई समलैंगिक का नंबर दो...´ पहले तो मैं सकपकाया, फिर दो साल पुरानी बात भी याद आई। तब कोम्प्लिमेंट कम और कमेंट ज्यादा मिले थे। खैर...उसी लेस्बियन लड़की को फोन घुमाया, जिसका इंटरव्यू किया था। ताजा खबर सुनाई तो उसके मुंह से निकला-'वाउ...´। मैंने कहा, इंटरव्यू दोगी? जवाब मिला-नहीं, अब तो मैं सुधर चुकी हूं। लड़कों में इंट्रेस्ट लेना भी शुरू कर दिया है।&lt;br /&gt;'सुधर गई हूं´ जवाब सुनकर यह एहसास तो हुआ कि कहीं-न-कहीं ये लोग भी स्वीकार तो करते हैं कि समलैंगिता 'बिगड़ेपन´ की निशानी है। टाइम थोड़ा आगे बढ़ा। हमारी रिपोर्टर ने इसी टाइप की एक और लड़की को फोन घुमाया। उसने उलटे रिपोर्टर का इंटरव्यू ले डाला। आखिर में 'अब मैं वैसी नहीं रही हूं। चोटी भी बनाने लगी हूं...´ और सॉरी कहकर फोन रख दिया। रिपोर्टर ने जैसे-तैसे इसी मुद्दे पर एक अलग एंगल से स्टोरी तैयार की। विज्युअल के लिए डिजाइनर के पास गई तो वहां भी हंसते हुए मेरी ओर इशारा कर दिया गया। अपन को हंसी के साथ खूब गुस्सा भी आया। एक स्टोरी क्या लिख दी। अपन को समलैंगिक लोगों का स्पेशलिस्ट राइटर मान लिया गया कि फोटो, कॉन्टेक्ट, मैटर...सब मेरे पास उपलब्ध हो।&lt;br /&gt;कुछ देर बाद रिपोर्टर से पूछा-कैसी रही स्टोरी? जवाब मिला-पसीना आ गया। सवाल पूछने वाले को भी शक की नजर से देखते हैं।&lt;br /&gt;उनकी बात से महसूस हुआ कि ऐसे मुद्दे पर बायलाइन मिलना किसी पाप से कम नहीं। आज की खबर से मानवाधिकार दिवस पर छपी मेरी एक स्टोरी का भी खयाल आया। किन्नरों पर की वह स्टोरी 'खंडित वजूद´ जितनी पसंद की गई, उससे ज्यादा नेगटिव कमेंट भी मिले। 'हम हिजड़ों की स्टोरी नहीं पढ़ते...´ ऐसे कमेंट भी हुए। थोड़ा गुस्सा आया, लेकिन किन्नरों के इंटरव्यू के दौरान कही बात याद आई कि किन्नरों से नफरत करने वाले लोग भूलें नहीं कि लैंगिक विकलांग संतान तो किसी को भी पैदा हो सकती है। ऐसे कमेंट करने वालों को भी। तभी एक किन्नर ने दुख जताते हुए यह भी कहा था कि समलैंगिक लोगों के प्रति तो हमदर्दी जताई जा रही है, जबकि उन्हें भगवान ने स्त्री या पुरुष रूप में संपूर्ण भेजा है। उनकी विकृति तो मानसिक है। उन्हें इलाज की जरूरत है। किन्नरों की विकलांगता लैंगिक है और जन्म से भी, जिसमें उनका कोई दोष नहीं। क्यों सभी उनसे नफरत और भय का भाव रखते हैं। ...जवाब देंगे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-7962212473039810361?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/7962212473039810361/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=7962212473039810361' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7962212473039810361'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7962212473039810361'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='मैं सुधर गई हूं!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SkzFxs8V4fI/AAAAAAAAAM0/IXJWHSmwBUY/s72-c/ATT454.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-4518300102148172198</id><published>2009-06-26T12:35:00.000-07:00</published><updated>2009-06-26T12:54:35.197-07:00</updated><title type='text'>अमर प्रेम की गजब कहानी...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SkUm1HlOs6I/AAAAAAAAAMs/CNA5_RUqGfE/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 253px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SkUm1HlOs6I/AAAAAAAAAMs/CNA5_RUqGfE/s320/1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351726426209825698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मेरी पहचान का एक शख्स अपने प्रेम को 'अमर प्रेम´ कहता है। साथ पढ़ने वाली एक लड़की प्यार को सिर्फ टाइमपास बताती है। एक वरिष्ठ प्रेम को खुदा का दूजा रूप मानती हैं। ऐसे लोग भी देखे हैं, जो तू नहीं कोई और सही...पर चलते हैं। खुद की बात करूं तो अपने जीवन के तेइस बरसों में हर रोज प्रेम को अलग रूप में देखा है। अभी-अभी एक खबर सुनी कि मेरे शहर (श्रीगंगानगर) की उस लड़की ने दम तोड़ दिया, जिस पर कुछ रोज पहले उसके इकतरफे प्रेमी ने तेजाब फेंक दिया था। कितने ऐसे किस्से आए रोज सुनने को मिलते हैं। 'मैं तुम्हे भूल जाऊं, ये हो नहीं सकता और तुम मुझे भूल जाओ, ये मैं होने नहीं दूंगा...´ एक फिल्मी डायलॉग जबान पर है। क्यों भई, जबरदस्ती है क्या।&lt;br /&gt;बहुत छोटा था, तब यही मानता था कि मां-बाप के अलावा किसी से प्रेम हो ही नहीं सकता। कुछ बड़ा हुआ। फिल्मी प्रेम को महज काल्पनिक माना। फिल्में देख खूब हंसता था कि यूं भी भला कोई किसी एक के लिए दुनिया भुलाने की बात कर सकता है। कुछ और बड़ा हुआ तो प्रेमी परिंदों को देख महसूस हुआ कि फिल्मी किस्से हकीकत में भी होते हैं। खुद को पहला प्यार हुआ तो बहुत मीठा एहसास लगा। प्यार में असफल रहा तो यही प्यार जहर लगने लगा। सोच लिया कि अब किसी से दिल नहीं लगाना। कुछ मजबूरियां और जरूरतें घर से दूर बड़े शहरों में खींच लाई। यहां तो प्रेमी जोड़े इस तरह घूमते नजर आए, जैसे छोटे शहरों में इतवार को सब्जी मंडी में लगी भीड़। बड़े शहरों के लोगों से संपर्क हुआ। उनके प्रेम के किस्से सुने। 'अमर प्रेम´ कहने वाले शख्स का प्यार एक नहीं, दो नहीं, लंबी चेन के साथ बारी-बारी प्रेम रूपी पींगें झूल रहा था। प्रेमी-प्रेमिका का रोना-धोना, घूमना-फिरना, खाना-पीना सब तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार जारी था ही। अमर प्रेम की ऐसी गजब कहानियां देख अच्छा नहीं लगा। अब तक मैं पार्ट लाइम और फुल टाइम लवर का ट्रेंड भी देख चुका था। बहुत-से लोग लव मैरिज की ख्वाहिश रखते हैं। मैं भी उनमें एक था। हालत ये हुई कि किसी ने दो रोज हंसकर बात कर ली, मुझे उसी के ख्वाब आने लगते। किसी को आज तक कह नहीं सका और अब तक जिनसे हंसमुख बातचीत है, ऐसा लगता है कि उन्हें मुझसे प्यार है, लेकिन मेरे मुंह से कहलवाने की चाह है। इजहार का क्या है, मैं खुद ही कर दूं, लेकिन उनके दिल की बात जानूं कैसे! कई बार तो अपने बड़बोले व्यवहार के कारण भरी महफ़िल में साफ़-साफ़ कह भी दिया-'कोई भी मुझसे दो दिन ढंग से बात करे तो तीसरे दिन थोडा लडाई-झगडा कर मेरा भ्रम तोड़ दे कि ये मोहब्बत नहीं है...' &lt;br /&gt;प्यार क्या है, इस सवाल के जवाब में कई किताबें पढ़ डाली। बहुत लोगों से पूछ डाला। आखिर में इसी परिणाम पर पहुंचा कि जहां विश्वास टूटने की गुंजाइश नहीं, किसी के आंसुओं का कारण बनना नहीं, भरपूर समर्पण भाव...शायद यही प्यार है। फिर भी मैं तो अब तक कन्फ्यूज हूं। अब तक का निचोड़ यही कि अपने तो अपने होते हैं...बाकी आप यार-दोस्त, सगे-संबंधियों, जानने-पहचानने वालों के लिए लाख अपनापन दिखा दो, जान लुटा दो, मिलती ठोकर ही है...&lt;strong&gt;खैर, कोई बताने वाला हो तो बता दे कि ये प्रेम होती क्या बलां है...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;चलते-चलते कुछ लाईने अर्ज हैं...लिखने वाले का नाम नहीं जानता, लेकिन लिखा बहुत खूब इसलिए सलाम करता हूँ...&lt;br /&gt;&lt;em&gt;पता नहीं क्यूँ उसके वादे पर करार रहा,&lt;br /&gt;वो झूठा था पर उसपे मुझे ऐतबार रहा!&lt;br /&gt;दिन-भर मेहनत ने मुझे दम ना लेने दिया &lt;br /&gt;और फिर रात भर दर्द मुझसे बेहाल रहा!&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-4518300102148172198?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/4518300102148172198/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=4518300102148172198' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4518300102148172198'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4518300102148172198'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html' title='अमर प्रेम की गजब कहानी...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SkUm1HlOs6I/AAAAAAAAAMs/CNA5_RUqGfE/s72-c/1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-4819581753810566726</id><published>2009-06-18T11:54:00.000-07:00</published><updated>2009-06-18T12:06:42.686-07:00</updated><title type='text'>पापा कहते हैं...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SjqQCqV_flI/AAAAAAAAAMk/6t5Lfewsdm8/s1600-h/noname.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 270px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SjqQCqV_flI/AAAAAAAAAMk/6t5Lfewsdm8/s320/noname.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5348745882856554066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा...लेकिन जब वे ऐसा ज्यादा ही कहने लगते हैं (खास तौर पर मेरे सामने) तो जाने क्यों खीझ उठता हूं। किसी से भी मिलवाते वक्त मेरा परिचय देने का उनका अंदाज मुझे जरा भी नहीं भाता। बहुत बार तो कह भी जाता हूं-'पापा, मैं अभी इतना बड़ा नहीं हुआ।´ उनका जवाब होता है-'ऐसे कैसे नहीं हुआ। तेरे लेख पढ़कर सब मुझे बधाई देते हैं तो...'&lt;br /&gt;हमेशा उनकी बात बीच में ही काट देता हूं-'बस आप रहने दो। मुझे नहीं पसंद यह सब।'&lt;br /&gt;ऐसी नोक-झोंक आए दिन की बात है, लेकिन मुझे याद नहीं कि मैंने कोई काम कहा हो और उन्होंने ना बोला हो। बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि काम उनके बस की बात नहीं होता, फिर भी वे पुरजोर कोशिश तो करते ही हैं।&lt;br /&gt;कुछ रोज पहले फादर्स-डे पर स्टोरी तैयार करने के आदेश हुए। पहले से ही कुछ स्टोरीज पर काम कर रहा था। इतने बिजी शेडयुल में परेशान हो उठा। पापा को बताया कि ऐसे पिता ढूंढने हैं, जिन्होंने सब्जी बेची हो, रिक्शा चलाया हो ऐसा ही कुछ मेहनत-मजदूरी भरा काम कर अपने बच्चे को अफसर बना दिया हो। मेरा कहना था और उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया। दो दिन में ऐसे चार बाप-बेटों के इंटरव्यू उन्होंने करवा दिए। स्टोरी सब्मिट करवाने का आखिरी दिन आया। कुछ फोटोग्राफ पापा ने नहीं भेजे थे। उन्हें फोन कर रहा था, लेकिन वे रिसीव नहीं कर रहे थे। झुंझलाहट और गुस्से में मैंने घर फोन किया। मम्मी से पूछा-'पापा कहां हैं? मुझे डांट पड़ेगी। उन्होंने अब तक फोटो नहीं भेजे...'&lt;br /&gt;मैं बोलता जा रहा था। बमुश्किल सांस लेने को चुप हुआ तो मम्मी बोलीं-'फोन आया था कि खाना खाने नहीं आ पाएंगे। तेरी स्टोरी के फोटो खींचने गए हैं।'&lt;br /&gt;इतना सुनते ही मेरी बोलती बंद हो गई। इसी बुधवार को जब यह स्टोरी प्रकाशित हुई तो जबरदस्त रेस्पोंस मिला। कुछ सेलिब्रिटिज के इंटरव्यू भी मैंने फोन पर किए थे। मुझे उम्मीद थी कि इसका रेस्पोंस ज्यादा मिलेगा, लेकिन पापा की मेहनत से पूरी हुई स्टोरी को पत्रिका के कवर पर जगह मिली। बहुत खुश था। पापा को शुक्रिया कहने के लिए फोन किया। वे बोले-'कंप्यूटर से अपने आप कैसे तुहें फोटो पहुंच जाती है? जब घर आएगा तो मुझे भी ई-मेल करना सिखाना।' बात पूरी होती, इससे पहले पापा के कोई परिचित आ गए। ई-मेल भूलकर वे उनसे बतियाने लगे-'ये देखो, बेटे के दो लेख एकसाथ छपे हैं। बड़ा लेखक बन रहा है। फिल्म स्टार्स से भी बात करता है...'&lt;br /&gt;फोन चालू था। उनकी बातें सुनकर मुझे फिर गुस्सा आ रहा था। मन कर रहा था कि उन्हें कह दूं कि 'पापा, मैं अभी इतना बड़ा नहीं हुआ...´, लेकिन वे बहुत खुश थे, इसलिए कुछ कह न सका...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-4819581753810566726?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/4819581753810566726/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=4819581753810566726' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4819581753810566726'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4819581753810566726'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/06/blog-post_18.html' title='पापा कहते हैं...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SjqQCqV_flI/AAAAAAAAAMk/6t5Lfewsdm8/s72-c/noname.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-720880055784598404</id><published>2009-06-14T09:20:00.000-07:00</published><updated>2009-06-15T09:04:27.152-07:00</updated><title type='text'>सांभर वड़े और थोड़ा-सा प्यार</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SjUlR3lulLI/AAAAAAAAAMc/8crlJ2HsBE4/s1600-h/15"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SjUlR3lulLI/AAAAAAAAAMc/8crlJ2HsBE4/s320/15" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5347221121482527922" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पेइंग गेस्ट हाउस में शिफ्ट हुए अभी एक महीना ही हुआ है। अंकल-आंटी की कृपा से बढ़िया खाना तो नसीब हो ही रहा है, लेकिन साथ रहने वाले कुछ जवानों की बातों से दिल भी बाग-बाग रहने लगा है। टेलीफोनिक प्रेमी तो सुबह जगने से लेकर रात को सोने तक नजर आते ही हैं, लेकिन आज नाश्ते के वक्त तो यूं लगा जैसे किसी ने दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। डाइनिंग रूम में थे कि श्यामलाल (हमें खाना परोसने वाले साहब) सांभर वड़े और शेक के साथ हाजिर हुए। उन्होंने पांच-पांच वड़े परोसे1 अपन के छोटे-से पेट के लिए तो वो पांच वड़े काफी थे, लेकिन साथ बैठे एक जनाब बोल पड़े-'इससे क्या होगा?' कहते हैं कि सच्चे प्यार में दर्द की पुकार दूर तक जाती है। उन्होंने बोला और ये दर्द साथ के गर्ल्स पीजी हाउस में उनकी मित्र तक पहुंच गया। फोन की घंटी बजी। वे जनाब बाहर निकले और चेहरे पर प्यारी मुस्कान के साथ एक बड़ा प्याला लेकर तुरंत वापस आ गए। प्याले में बड़े ही खूबसूरत अंदाज में सांभर वड़े और ऊपर नारियल की चटनी सजी थी। उनकी खुशी और मुस्कराहट को जैसे मेरी बात ने कम कर दिया। मैंने पूछा-'श्यामलाल तो यहीं है फिर ये वड़े...?´ जवाब मिला-'वो...वो..वो...मेरी फ्रेंड इसी पीजी में रहती है। उसे वड़े पसंद नहीं, सो...´&lt;br /&gt;आगे उन्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं थी। खुद-ब-खुद उनकी भावना अपन समझ गए थे, फिर वड़ों पर प्यार-से सजाई नारियल चटनी भी तो इजहार कर रही थी। मैं सोच रहा था कि काश, कोई हमारे लिए भी यूं ही नारियल चटनी...&lt;br /&gt;आगे कुछ सोच पाता, इससे पहले भगवान ने मेरी भी सुन ली। श्यामलाल जी नारियल चटनी के साथ डाइनिंग रूम में प्रवेश लाए और मुस्कुराते हुए बोले-आपके लिए चटनी तो मैं भूल ही गया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-720880055784598404?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/720880055784598404/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=720880055784598404' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/720880055784598404'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/720880055784598404'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.html' title='सांभर वड़े और थोड़ा-सा प्यार'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SjUlR3lulLI/AAAAAAAAAMc/8crlJ2HsBE4/s72-c/15' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-4019307394555244329</id><published>2009-06-10T03:03:00.000-07:00</published><updated>2009-06-10T03:15:15.235-07:00</updated><title type='text'>नस्लभेद, नफरत या कुछ और...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Si-HoYmUDXI/AAAAAAAAAMU/I40LYdrmyKY/s1600-h/ATT00002.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 288px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Si-HoYmUDXI/AAAAAAAAAMU/I40LYdrmyKY/s320/ATT00002.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5345640410579733874" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इन दिनों सभी भारतीयों के दिल में ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए नफरत भड़क रही है। हम सोच रहे हैं कि वहां रह रहे भारतीयों पर अत्याचार हो रहा है। सच्चाई खैर जो भी हो, लेकिन हाथ की सभी उंगलियां एक-सी तो नहीं होतीं। डेली न्यूज की पत्रिका ´खुशबू´ के लिए मेलबर्न में रह रही भारतवंशी नवदीप कौर से बातचीत की तो इस मुद्दे का दूसरा पहलू सामने आया। इस पोस्ट के जरिए प्रस्तुत है नवदीप कौर के मन की बात, उन्हीं की जुबानी...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तकरीबन&lt;/strong&gt; चार साल पहले जब पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया जाना तय हुआ, बहुत खुश थी। माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण कभी ट्रेन में भी अकेले सफर नहीं किया था। पहली बार उनसे इतनी दूर जा रही थी, इस कारण थोड़ी दुखी थी। पहली बार हवाई जहाज में बैठना था, इसलिए कुछ-कुछ डरी हुई भी। मुझे होटल मैनेजमेंट का कोर्स करना था, इसलिए ऑस्ट्रेलिया जाने का निर्णय किया। &lt;br /&gt;जब यहां (मेलबर्न) आई तो सिर्फ अपने पहनावे में बदलाव करना पड़ा। खाने की भी थोड़ी समस्या आई, लेकिन यहां के लोगों से कभी कोई परेशानी नहीं हुई। एक बात अच्छी लगी कि इंडिया की तरह यहां कोई आपको घूर-घूर कर नहीं देखता। राह चलती लड़कियों को परेशान नहीं होना पड़ता। हालांकि ऑस्ट्रेलिया हो या इंडिया, अपराधिक प्रवृçत्त के लोग तो हर जगह होते हैं। मदद करने के मामले में ऑस्ट्रेलियंस कभी पीछे नहीं हटते। शुरुआत की एक बात याद आती है। बस से कॉलेज के लिए जा रही थी। एक विदेशी लड़के ने भद्दा कमेंट किया। मेरे साथ जो इंडियन फ्रेंड्स थे, वे इस पर हंस दिए। मुझे बहुत बुरा लगा, लेकिन बस में ही खड़े दूसरे विदेशी लड़के ने छेड़खानी करने वाले को खूब डांटा। इतने सालों से सब-कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। यहां के फ्रेंड्स से बहुत घुलमिल गई हूं, लेकिन पता नहीं अचानक क्या हो गया? इन दिनों बहुत बुरा महसूस कर रही हूं। पापा-मम्मी बहुत टेंशन में हैं। टीवी और अखबारों में जिस तरह से खबरें आ रही हैं, उससे शायद सभी भारतीयों के मन में ऑस्ट्रेलियंस के लिए नफरत पैदा हो रही है। इधर, उसी नफरत से पनप रहे विरोध-प्रदर्शनों से ऑस्ट्रेलियंस को भी ठेस पहुंच रही है। आज हर इंडियन यही सोच रहा है कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ भेदभाव होता है, जबकि यह सच नहीं है। पिछले चार सालों में मुझे याद नहीं कि सिर्फ इंडियन होने के कारण मुझे परेशान किया गया हो। अब जिस तरह से घटनाओं का प्रचार किया जा रहा है, उससे जरूर ऑस्ट्रेलियाई फ्रेंड्स हमसे डरने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि उनका मजाक भी हमें कहीं नस्लीय टिप्पणी ना लगने लगे। मैं सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी कि असामाजिक तत्वों का कोई धर्म नहीं होता। अपराधी कभी यह देखकर लूटपाट नहीं करता कि उसका शिकार भारतीय है। एक हिंदुस्तानी के साथ जरा भी ज्यादती हुई है तो उसे नस्लीय हमला कहकर न्याय की मांग की जा रही है। ऑस्टे्रलियाई पुलिस के रिकॉर्ड देखेंगे तो ऑस्ट्रेलियंस को भी ऐसी घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है। हमला करने वाले बेरोजगार, नशेड़ी या फिर कुछ मामलों में हिंदुस्तानियों से नफरत रखने वाले हो सकते हैं। यह पूरी तरह गलत है कि दो दोस्तों में हुए झगड़े को भी नस्लीय भेदभाव कहकर प्रचारित किया जा रहा है। इन चार सालों में कई ऑस्ट्रेलियाई फ्रेंड्स ऐसे भी बने, जिनके घर मेरा आना-जाना है। उन्हीं के घर जाकर जब भारतीय पकवान बनाकर उन्हें खिलाती हूं तो भरपूर स्नेह मिलता है। कुछ फ्रेंड्स को तो थोड़ी-बहुत हिंदी भी सिखा चुकी हूं। अब उन्हीं फ्रेंड्स के मन में डर पैदा हो गया है। वे हमसे डरते लगे हैं। ऐसा लगने लगा है कि इस दुष्प्रचार ने हमारे बीच संदेह पैदा कर दिया है। नस्लभेद के कारण दस प्रतिशत असुरक्षा हो सकती है, लेकिन भारतीयों को भी संयम बरतना होगा। यहां भारतीयों को शांत स्वभाव और मेहनती माना जाता है, लेकिन इंडिया घूमने जाने वाले विदेशी भी अपने साथ कुछ बुरे अनुभव लेकर  जरूर लौटते हैं। भारत में टूरिस्ट्स के साथ होने वाली घटनाओं को भी वे नस्लीय भेदभाव से जोड़कर देख सकते हैं, लेकिन नहीं। वे भी जानते हैं और हमें भी मानना होगा कि परदेस के माहौल के अनुसार थोड़ा-बहुत परिवर्तन तो खुद में लाना ही होगा। विदेशियों को पराया समझकर उनसे बातचीत नहीं करेंगे तो उन्हें जान भी नहीं पाएंगे। मेलजोल की भावना रखे बिना कुछ नहीं हो सकता। मुझे लगता कि भारतीयों को अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया करवाने के बजाए ऑस्ट्रेलियंस से उनका कयुनिकेशन गैप खत्म करने पर जोर देना चाहिए। अगर इसी तरह यह आग बढ़ती गई तो ऑस्ट्रेलियंस और हमारे बीच इतनी दूरियां आ जाएंगी कि उन्हें खत्म करना नामुमकिन हो जाएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-4019307394555244329?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/4019307394555244329/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=4019307394555244329' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4019307394555244329'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4019307394555244329'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/06/blog-post_10.html' title='नस्लभेद, नफरत या कुछ और...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Si-HoYmUDXI/AAAAAAAAAMU/I40LYdrmyKY/s72-c/ATT00002.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-5777211021561277621</id><published>2009-05-17T13:07:00.000-07:00</published><updated>2009-05-17T13:42:46.030-07:00</updated><title type='text'>जरा रुकिए, कपड़े बदल रही हूं...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/ShB1aSLR2JI/AAAAAAAAAL0/eg0dDAURbik/s1600-h/FG-6683C.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 237px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/ShB1aSLR2JI/AAAAAAAAAL0/eg0dDAURbik/s320/FG-6683C.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5336894652850231442" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दोपहर तीन बजे का वक्त होगा। किसी काम से एक परिचित के घर दाखिल हुआ ही था कि मियां-बीवी का जोरदार झगड़ा सुनाई देने लगा। यहां पति को शक है कि पत्नी को कम सुनता है और पत्नी को लगता है कि जब तक ऊंची आवाज में बात ना करे पति पर असर नहीं होता। इसी चक्कर में दोनों का वॉल्यूम हाई रहता है।&lt;br /&gt;आज झगड़े की वजह छोटी थी या बड़ी, इस बारे में सभी की राय अलग-अलग हो सकती है। घटना कुछ इस तरह है। इस घर के इकलौते कमरे की कुंडी ठीक से बंद नहीं होती। पत्नी जी कपड़े बदल रही थीं कि दोपहर भोज के लिए पधारे पति सीधे कमरे में प्रवेश कर गए। इससे पहले पूछा भी कि क्या कर रही हो? जवाब मिला-'जरा रुको, कपड़े बदल रही हूं।' पति को इस आदेश की पालना करना सही नहीं लगा और पति होने का हक जमाते हुए अंदर घुसते ही ऑर्डर दे डाला-'जल्दी करो, बहुत भूख लगी है। खाना गर्म करो।'&lt;br /&gt;पति की इस हरकत से पत्नी तिलमिला गई और युद्ध शुरू हो गया। दोनों में से सही कौन...इसके निर्णय के लिए जज बना डाला मुझे और घटना का ब्यौरा दोनों ने अपने-अपने तरीके से देने लगे। पत्नी की नजर में ये गलत था तो पति का कहना था कि पति से कैसा परदा...&lt;br /&gt;'अभी मेरी शादी नहीं हुईं, इसलिए मैं क्या बोलूं...' यह कहकर वहां से निकल लिया1 सभी की अपनी राय हो सकती हैं1 मुझे यहां पत्नी की बात ज्यादा सही लगी। कुछ लाइनें भी याद आ गईं, जो शायद निदा फाजली साहब की हैं...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगर तुम समझते हो बीवी घर की इज्जत होती है&lt;br /&gt;तो खुदा के लिए उस इज्जत की खातिर&lt;br /&gt;दरवाजा खुला हो या बंद&lt;br /&gt;हमेशा दस्तक देकर ही घर में दाखिल हुवा करो&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-5777211021561277621?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/5777211021561277621/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=5777211021561277621' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/5777211021561277621'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/5777211021561277621'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/05/blog-post_17.html' title='जरा रुकिए, कपड़े बदल रही हूं...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/ShB1aSLR2JI/AAAAAAAAAL0/eg0dDAURbik/s72-c/FG-6683C.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-154663708551821631</id><published>2009-05-13T13:08:00.000-07:00</published><updated>2009-05-13T13:21:19.004-07:00</updated><title type='text'>प्यार से प्यारी बात</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SgsrqgB0_VI/AAAAAAAAALs/R9y1Z_6f7uA/s1600-h/ATT00020.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 229px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SgsrqgB0_VI/AAAAAAAAALs/R9y1Z_6f7uA/s320/ATT00020.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5335406192702586194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पिछले साल आज ही के दिन यहां (जयपुर) बम धमाके हुए थे। आज के अखबार और न्यूज चैनल्स देख पुरानी यादों के जख्म ताजा हो उठे, लेकिन वो धमाके मुझे एक ऐसी सीख दे गए, जिसे समझ लिया जाए तो दोस्ती, प्यार और हर रिश्ता कभी दरकेगा नहीं।&lt;br /&gt;करीब दो साल होने को हैं। हर मंगलवार मैं और मेरा दोस्त हिमांशु हनुमानजी के मंदिर जाते हैं। मंगलवार को मेरा ऑफिस से ऑफ होता है पर पिछले साल 13 मई (मंगलवार) को मुझे ऑफिस आना पड़ा। हम साथ मंदिर नहीं जा सके। देर शाम काम खत्म करने के बाद मैं अपने एक कलीग के साथ पास ऑफिस के पास स्थित माँ दुर्गा के मंदिर गया। मंदिर से बाहर निकले ही थे कि मेरे कलीग के मोबाइल पर मैसेज मिला कि यहां बम ब्लास्ट हुआ है। ऑफिस पहुंचने तक ये धमाके एक से ज्यादा हो चुके थे। टीवी पर धमाकों वाली जगह का लाइव टेलीकास्ट देख रहा था कि ध्यान आया यह रास्ते कुछ वैसे ही हैं, जहां से मैं और हिमांशु मंदिर आते-जाते वक्त गुजरा करते थे। मन ने एक अजीब-सा डर महसूस किया। हिमांशु को फोन लगाया पर नेटवर्क व्यस्त होने से मोबाइल काम नहीं कर रहे थे। कुछ देर बाद उसके पापा से बात हुई तो उन्होंने बताया कि वो ठीक है और घर आने वाला है। मेरा मोबाइल भी थोड़ी-थोड़ी देर बाद बज रहा था। कुशलक्षेम पूछने के लिए कुछ ऐसे परिचितों के फोन भी आए, जिन्होंने इससे पहले कभी फोन नहीं किया। हाल-चाल पूछने के लिए आने वाली कॉल्स का दौर अगले कुछ देर तक चला।&lt;br /&gt;सभी भगवान का शुक्रिया अदा कर एक ही बात कह रहे थे कि हमें कुछ नहीं हुआ, लेकिन बावजूद इसके मेरा मन उदास था। कारण कुछ खास ना होकर भी दिल को परेशान करने वाला था। कुछ तीन-चार ऐसे अपने लोग थे, जिनका फोन नहीं आया था। मन में एक ही बात आ रही थी कि उनमें से किसी को भी मेरी परवाह नहीं है। जब दिल का उबाल बाहर आने लगा तो मैंने उन सभी को फोन कर एक ही राग अलापा-क्वमेरे मरने या जीने से शायद किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। इतने दिनों बाद ये पूछना भी मुनासिब नहीं समझा कि जिंदा हूं भी या नहीं...। गुस्से में काफी कुछ ऐसा भी कह गया, जो लिख नहीं सकता। इन्हीं अपनों में से एक का जवाब जैसे मेरे सारे सवालों पर भारी पड़ गया। उन्होंने कहा-&lt;strong&gt;तुम्हे कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि हमारी दुआएं हर पल तुम्हारे साथ हैं। इस विश्वास को हमेशा दिल में रखा है। भगवान पर भरोसा है, इसीलिए फोन कर कुछ नहीं पूछा।&lt;/strong&gt;सुख-दुख आते हैं पर बहुत बार रिश्तों में आई गलतफहमियां उनके दरकने का कारण बन जाती हैं। ...खैर यह छोटा-सा, प्यारा-सा जवाब जब भी मुझे याद आता है, मैं एक ही बात दोहराता हूं-मैंने सभी को माफ किया। मुनव्वर राणा ने भी क्या खूब कहा है...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अभी जिंदा है मां मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा...&lt;br /&gt;घर से निकलता हूं तो दुआ भी साथ चलती है...&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-154663708551821631?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/154663708551821631/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=154663708551821631' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/154663708551821631'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/154663708551821631'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/05/blog-post_13.html' title='प्यार से प्यारी बात'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SgsrqgB0_VI/AAAAAAAAALs/R9y1Z_6f7uA/s72-c/ATT00020.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-1629349307656754700</id><published>2009-05-04T06:12:00.000-07:00</published><updated>2009-05-04T06:22:40.074-07:00</updated><title type='text'>सिर्फ प्रेमियों के लिए...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sf7r_nV64UI/AAAAAAAAALk/pQuwto5-2WU/s1600-h/image005.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 249px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sf7r_nV64UI/AAAAAAAAALk/pQuwto5-2WU/s320/image005.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5331958486978453826" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ये है एक प्यारा-सा ई-मेल, पढिये और दिल में एक ख़ुशी के साथ थोडा मुस्कुराइए...ये पोस्ट सिर्फ प्रेमियों के लिए है...यानी सभी के लिए, क्यूंकि प्यार तो सभी को होता है...जरूरी नहीं की प्यार के लिए प्रेमिका का होना जरूरी हो...और भी बहुत-से रिश्ते है...माँ से बेहतर कोई हो सकता है क्या...खैर आप पढिये और कुछ महसूस कीजिये...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;u in love...check this&lt;br /&gt;12 signs you LOVE someone&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;TWELVE:&lt;br /&gt;When you're on the phone with them late at night and they hang up, you still miss them even when it was just two minutes ago.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ELEVEN:&lt;br /&gt;You walk really slow when you're with them.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;TEN:&lt;br /&gt;You feel shy whenever they're around.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;NINE:&lt;br /&gt;You smile when you hear their voice.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;EIGHT:&lt;br /&gt;When you look at them, you can't see the other people around you, you just see him/her.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;SIX:&lt;br /&gt;They're all you think about.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;FIVE:&lt;br /&gt;You realize you're always smiling when you're looking at them.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;FOUR:&lt;br /&gt;You would do anything for them, just to see them.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;THREE:&lt;br /&gt;While reading this, there was one person on your mind this whole time.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;TWO:&lt;br /&gt;You were so busy thinking about that person, you didn't notice number seven was missing&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ONE:&lt;br /&gt;You just scrolled up to check &amp; are now silently laughing at yourself.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;NOW REPLY ME WHO THAT PERSON WAS....? :)&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-1629349307656754700?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/1629349307656754700/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=1629349307656754700' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/1629349307656754700'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/1629349307656754700'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='सिर्फ प्रेमियों के लिए...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/Sf7r_nV64UI/AAAAAAAAALk/pQuwto5-2WU/s72-c/image005.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-8543619869116236373</id><published>2009-04-24T04:26:00.000-07:00</published><updated>2009-04-24T09:43:06.537-07:00</updated><title type='text'>मैं वोट नहीं डालूँगा!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SfGkKxrJf_I/AAAAAAAAALc/QLK-hRqMoOU/s1600-h/image0044.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 230px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SfGkKxrJf_I/AAAAAAAAALc/QLK-hRqMoOU/s320/image0044.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5328220339195969522" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रात करीब एक बजे का वक्त होगा। काम से फ्री हुआ ही था कि मेरे एक कलीग ने आवाज दी-`आओ, कहीं चलकर आते हैं।' बिना कुछ कहे मैं उनके साथ हो लिया। सुबह से ही किसी बात पर मैं बहुत दुखी महसूस कर रहा था। उनकी बाइक के पीछे बैठा भी सैड सॉन्ग गुनगुना रहा था। दस-पंद्रह मिनट बाद जब उन्होंने बाइक जेकेलोन अस्पताल (जयपुर में बच्चों का प्रसिद्ध अस्पताल) की तरफ मोड़ी, तब जाकर ध्यान आया कि मैंने तो उनसे पूछा तक नहीं कि जाना कहां है? &lt;br /&gt;अपनी धुन से बाहर आते हुए मैंने सवाल किया-`इतनी रात हम अस्पताल क्यों आए हैं...कौन एडमिट है?'&lt;br /&gt;जवाब मिला-`भांजी बीमार है?'&lt;br /&gt;मैंने फिर पूछा-`कितने साल की है और क्या हुआ?'&lt;br /&gt;जवाब था-`साल नहीं, बस दो महीने की है। हार्ट प्रोब्लम है।'&lt;br /&gt;इस जवाब के बाद भी मेरे मन में अपने दुख का खयाल चल रहा था। उनके पीछे-पीछे चलता रहा। जूते खोलकर हम आईसीयू रूम में दाखिल हुए। अंदर पहुंचते ही यूं महसूस हुआ कि यमराज यहां बैठे सोच रहे हैं कि पहले किसे अपने साथ ले जाएं। हर पलंग पर मशीनों से लैस बच्चे और उनके पास एक बड़ा। कुछ बच्चों के बैड के पास उनकी मां बैठी थी। मां बिना पलकें झपकाए एकटक अपने बच्चे को देख रही थी। हर सैकंड मशीनों की बीप की आवाज जैसे माहौल को और भी ज्यादा खौफनाक बना रही थी।&lt;br /&gt;मेरे कलीग ने भांजी के बैड पर बैठे अपने पिता से कुछ बात की। इस बीच बच्ची कराहने लगी। उसके मुंह पर मशीन लगी थी। हाथों और पैरों पर भी पट्टीनुमा कोई चीज चिपकी थी। शरीर के लगभग हर अंग से कोई ट्यूब लगी थी। इतनी चीजों के बोझ से बच्ची खुलकर रो भी नहीं पा रही थी। ये सब देखकर जाने क्यों मन से खुद का दुख काफूर हो गया। जिन बातों से दिनभर से मैं खुद को दुनिया का सबसे बड़ा दुखी इनसान मान रहा था। वह सब इन चंद पलों में मैं भूल गया। रूम से बाहर निकले तो साथी ने बताया कि यहां आए पांच दिन हुए हैं। हर दिन कुछ बच्चों की यहां मौत हो जाती है। भांजी के इलाज पर तीन-चार लाख का खर्च बता रहे हैं। दिल्ली ले जाना पड़ेगा। इतना पैसा नहीं है...।&lt;br /&gt;वो बोलते जा रहे थे और मैं आंखों से बह रहे आंसुओं को रोकने की असफल कोशिश कर रहा था। जूते पहने और हम बाहर आ गए। वापसी में रास्ते में आने वाली हर चीज से जैसे मैं बातें कर रहा था। चुनाव प्रचार के लिए लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स देख दुख हुआ। इन पर खर्च हुई मोटी रकम बहुत लोगों की जान बचा सकती थी। मन ही मन तय कि इस बार वोट नहीं डालूंगा। रुपए-पैसे न होने के कारण कोई अपने बच्चे की जान न बचाए पाए...। काश, कोई नेता ऐसा भी आता, जो वादा करता कि जीतने पर कम-से-कम चिकित्सा सुविधा को फ्री करेगा। अफसोस कि ऐसा झूठा वादा भी नेताओं की लिस्ट में नहीं है। चुनावों में जूते फेंकने का फैशन चल निकला है तो मन किया है कि राजनीति के हर आदमी पर जूता फेंकूं...अगले ही पल सोचने लगा कि इतने जूते लाऊंगा कहां से...। खैर...ईश्वर से प्रार्थना कि ऐसा दुख किसी को न दे। मन दुखी था और होर्डिंग्स  देख गुस्सा भी आ रहा था, इसलिए जो मन में आया लिख डाला। कुछ कम ज्यादा हुआ हो तो माफी। काश, भगवान् मुझ गंदे बच्चे को तीन-चार लाख दे दें...उस बच्ची को मैं बच्चा सकूँ...&lt;br /&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&lt;br /&gt;अभी कुछ देर पहले सूचना मिली कि वो बच्ची नहीं रही...&lt;br /&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-8543619869116236373?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/8543619869116236373/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=8543619869116236373' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8543619869116236373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8543619869116236373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html' title='मैं वोट नहीं डालूँगा!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SfGkKxrJf_I/AAAAAAAAALc/QLK-hRqMoOU/s72-c/image0044.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-3564812345045802145</id><published>2009-04-18T09:56:00.000-07:00</published><updated>2009-04-18T11:14:36.691-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मिसकॉल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टाइमपास'/><title type='text'>मिस कॉल गर्ल!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SeoYWygALGI/AAAAAAAAALU/ehArC91L7Qk/s1600-h/ATT00009.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 234px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SeoYWygALGI/AAAAAAAAALU/ehArC91L7Qk/s320/ATT00009.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5326096289111223394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों बहुत परेशान हूं। मोबाइल का बिल कुछ ज्यादा ही हो गया है। बहुत सारी मिस कॉल गर्ल का इसमें योगदान है। अरे भई, यहां शब्दों का स्पेस खत्म करने के चक्कर में भावना को गलत मत समझियेगा। मेरी भावना को समझेंगे, तभी तो भावना आपको समझेगी। क्यों...दरअसल, मैं किसी कॉलगर्ल की बात नहीं कर रहा हूं। मैं एक मिसकॉल गर्ल यानी हमेशा मिसकॉल करने वाली लड़कियों की बात कर रहा हूं। अभी परीक्षाएं खत्म हुई हैं। इस बीच महसूस हुआ कि अच्छे-अच्छे करोड़पति घरों की लड़कियों को भी मिसकॉल से बड़ा प्यार है। एक बार गलती से एक मिसकॉल गर्ल का फोन अटेंड कर लिया तो मुझ पर बरस पड़ी-अरे यार, मेरा फोन क्यों उठाया। काटकर दोबारा करना चाहिए। वाह भई, काम चाहे खुद का हो, लेकिन करेंगी मिसकॉल ही। इन मिसकॉल गर्ल जैसे लोग बहुत-से लोग आपके-हमारे सर्किल में हैं। मेरे सर्किल में तो कई ऐसे मिसकॉल पर्सन भी हैं, जिनके पास बीस-पच्चीस हजार की कीमत का मोबाइल सैट है और खुद का फोर व्हीलर भी। फोन पर कॉलर ट्यून का बिल भर सकते हैं, लेकिन कॉल करने में पसीने छूटते हैं। कुछ मिसकॉल प्रेमी तो ऐसे हैं, जिनकी मिसकॉल पर तुरंत फोन नहीं किया तो रौब से कहेंगे-यार तुम तो हमारा फोन ही नहीं उठाते। ...खैर अपन तो टाइमपास के लिए कुछ लिखने बैठे थे पर अगर भूले-भटके मिसकॉल प्रेमी भावना को समझ गए हों तो प्लीज मिस्ड कॉल से रिसीवड कॉल में आने की कृपा करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-3564812345045802145?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/3564812345045802145/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=3564812345045802145' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3564812345045802145'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3564812345045802145'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/04/blog-post_18.html' title='मिस कॉल गर्ल!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SeoYWygALGI/AAAAAAAAALU/ehArC91L7Qk/s72-c/ATT00009.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-6666530027849959697</id><published>2009-04-11T09:52:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T02:30:42.428-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रिक्शावाला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गरीब आदमी'/><title type='text'>रिटायरमेंट कब?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SeDQ84meGTI/AAAAAAAAALM/sNwHUNLljwg/s1600-h/Ph.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 258px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SeDQ84meGTI/AAAAAAAAALM/sNwHUNLljwg/s320/Ph.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5323484503956396338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी एक फोटो इतना कुछ कह जाता है, जितने हजार शब्द भी नहीं कह पाते। यह बात किसी किताब में पढ़ी थी, लेकिन कभी-कभी कुछ पल ऐसा महसूस करवाते हैं, जो हजार शब्द या फोटो भी नहीं कह पाते। काफी दिन पहले जवाहर कला केंद्र की सुरेख कला दीर्घा (जयपुर) में फोटो एग्जिबिशिन देखने का मौका मिला। `शहर बनाम संवेदनां नामक इस एग्जिबिशिन के रूप में राजस्थान विश्वविद्यालय के जर्नलिज्म स्टूडेंट्स का पहला प्रयास काफी अच्छा रहा था। एग्जिबिशिन में कुछ फोटो ऐसे भी थे, जो शायद सवाल कर रहे थे कि वे किसी नेता, लेखक या पत्रकार की नजर से दूर क्यों रहे। &lt;br /&gt;जाते हुए विजिटर बुक में टिप्पणी लिखी तो उन फोटोग्राफ्स की छोटी-छोटी कतरनों से सजा एक ब्रोशर भी साथ ले लिया। बाहर आकर रिक्शा किया। रास्ते में ब्रोशर देखते हुए नोट किया कि काफी फोटो उसी सड़क (जेएलएन मार्ग) से खींचे गए थे, जहां से मैं गुजर रहा था। `देवी मां की खंडित प्रतिमां, `खिलौने बेचते गरीब बच्चें, `सड़क किनारे का नजारां और भी बहुत कुछ जो एग्जिबिशिन में देखा था, उसी का लाइव टेलीकास्ट देख रहा था। रिक्शा अपनी गति से चल रहा था। घर पहुंचने में कुछ ही फासला था कि अचानक मेरी नजर रिक्शा चलाने वाले पर आकर ठहर गई। महज संयोग ही था कि जिस रिक्शा में मैं बैठा था, उसे चला रहे बूढ़े आदमी का फोटो भी एग्जिबिशिन में था। इसे क्लिक किया था सविता पारीक ने। ब्रोशर में फोटो छोटा था और पीछे से मैं उस आदमी की शक्ल भी ठीक से नहीं देख पा रहा था। रिक्शे से उतरा तो ब्रोशर दिखाते हुए पूछ ही लिया-`ये फोटो आपका है? जवाब मिला-`हां, काफी रोज पहले कुछ बच्चों ने खींचा तो था। यह फोटो था खूब बोझ ढोए हुए एक बूढ़े रिक्शा वाले का। कैप्शन लगा था-`रिटायरमेंट कब? मन हुआ कि उस बूढ़े आदमी से ही पूछ लूं कि उनका रिटायरमेंट कब, लेकिन मेरे किसी और सवाल का जवाब देने तक वे वहां से जा चुके थे। उन्होंने तो इस बात में भी दिलचस्पी नहीं दिखाई कि उनका फोटो कहां छपा है? दिलचस्पी होती भी क्यों, जहां पेट के लिए आदमी ही आदमी को ढोने पर मजबूर हो, वहां गरीब आदमी का रिटायरमेंट सांसें थमने पर ही होता है। &lt;br /&gt;अपनी यही फीलिंग्स कल एक परिचित के साथ बांट रहा था। उसने एक ऐसी बात बताई कि आंखें नम हो गई। दोनों घटनाओं का पात्र एक बुजुर्ग रिक्शाचालक ही है। मेरे परिचित ने बताया कि कुछ साल पहले बीच सड़क एक रिक्शाचालक का शव मिला। उसके हाथ में दस रुपए का नोट था। अपने रिक्शा में किसी सवारी को ढोते हुए अचानक गश खाकर गिरे उस बूढ़े की सुध किसी ने नहीं ली। रिक्शा पर सवार आदमी ने भी उस बूढ़े के हाथ में किराया थमाया और चलता बना। शायद वो किसी गरीब का हक नहीं रखना चाहता था। बूढ़ा मरा है या सिर्फ बेहोश हुआ है, ये देखने की जहमत कौन उठाता। उस रिक्शाचालक की सांसें थम गई थी। यही उनके रिटायरमेंट का वक्त था और हाथ में दस रुपए का नोट उनकी पेंशन...।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-6666530027849959697?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/6666530027849959697/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=6666530027849959697' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/6666530027849959697'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/6666530027849959697'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='रिटायरमेंट कब?'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SeDQ84meGTI/AAAAAAAAALM/sNwHUNLljwg/s72-c/Ph.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-5395789063627000828</id><published>2009-03-30T11:18:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T02:33:33.940-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='परदेसी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेडीज टेलर'/><title type='text'>लेडिज टेलर के सपने</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SdEUaK8pQ3I/AAAAAAAAALA/a_0CmSSaDJ8/s1600-h/image001.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 249px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SdEUaK8pQ3I/AAAAAAAAALA/a_0CmSSaDJ8/s320/image001.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5319055074749137778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;काफी वक्त पहले का एक धारावाहिक तो याद ही होगा। नाम था-`मुंगेरीलाल के हसीन सपनें। इन दिनों मैं बना हूं मुंगेरीलाल। सपनों में हसीनाएं आती हैं पर सपने जरा भी हसीन नहीं हैं। सुना था कि दिन के सपने सच होते हैं। अगर सच में ऐसा है तो फिर मुझ जैसे नाइट ड्यूटी करने वालों के तो सभी सपने सच होने चाहिए! वैसे नाइट ड्यूटी वालों की हालत बड़ी खस्ता होती है। कुछ दिन पहले एक सहकर्मी अपना रोना रो रहे थे। ड्यूटी से फ्री होकर घर जाते हैं। सोते-सोते घड़ी की सुइयां चार बजे को पार कर जाती हैं। पत्नी से प्यारभरी बात शुरू करें, इससे पहले घर के सामने वाले मंदिर की घंटियां माहौल भक्तिमय कर देती हैं। उन जनाब की बात सुनकर सभी के चेहरे पर उन्हें सांत्वना देने के भाव उमड़ रहे थे पर किसी को हम कुंवारों का दर्द नहीं दिखा। भई बीवी-बच्चे न सही, लेकिन हमारे सिरदर्द के कारण और हैं। दूसरों की छोड़ूं और अपना दुखड़ा बयान करूं। बात हंसने की नहीं, रोने की है पर समझे कौन!&lt;br /&gt;छोटे शहरों से आए मुझ जैसे लोगों को बड़े शहरों के घरों में तंग जगह बड़ी अखरती है। मेरे कमरे के पीछे वाले कमरे में एक लेडिज टेलर साहब रहते हैं। वैसे बहुत-से पुरुष लेडिज टेलर को देख आहें भरते हैं। बहुत-से पुरुषों का ड्रीम जॉब है लेडिज टेलर। बस किन्हीं कारणों से लेडिज टेलर नहीं बन पाए, लेकिन ख्वाहिशे पीछा छोड़ती हैं क्या! ऐसी ख्वाहिशे रखने वाले ये देख लें कि दूर के ढोल सुहावने ही होते हैं। बात लेडिज टेलर और सपनों से शुरू हुई थी। ड्यूटी से फ्री होकर घर जाता हूं। एफएम पर सुबह पांच बजे भजन आते हैं। उन्हें सुनते हुए ही अक्सर आंख लगती है। भक्ति में लीन हुई मेरी आंखें खुलती हैं सूट और ब्लाउज के झगड़ों से। दो-तीन घंटे की नींद के बाद कुछ हलचल-सी होती हैं। पीछे वाले लेडिज टेलर से कोई महिला लड़ने पहुंच जाती है। डायलॉग कुछ ऐसे होते हैं-&lt;br /&gt;&lt;em&gt;`बीस दिन हो गए, मेरा सूट नहीं सिला...परेशान हो गई चक्कर काटते-काटतें&lt;br /&gt;`एडवांस पैसा लिया और ये क्या किया। ब्लाउज इतना टाइट...सत्यानाश हो गया मेरी नई साड़ी कां&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;और भी ऐसे बहुत-से डायलॉग, जिन्हें सुनकर आंखों के साथ-साथ कानों से आंसू आने लगें। रोज सुबह सूट-ब्लाउज के इस वाकयुद्ध से परेशान मैं बेचारा कभी कानों पर तकिया रखता हूं तो कभी बिना नींद पूरी किए ही उठ जाता हूं। अब कुछ दिन से एक नई मुसीबत शुरू हो गई है। मुझे सपने भी लेडिज टेलर और सूट-ब्लाउज के आने लगे हैं। सपनों में कभी लेडिज टेलर ही मैं होता हूं तो सूट लेने आई महिला के साथ आया उसका पति भी मैं। अब सपने हैं तो इन पर किसी का जोर थोड़े है। पति और टेलर दोनों की हालत बहुत खराब होती है। चिल्लाना महिला का काम होता है। चुपचाप खड़े रहना टेलर और पति का काम। वैसे अब यकीन होने लगा है कि सुबह के सपने सच होते हैं। क्या कहते हैं आप!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-5395789063627000828?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/5395789063627000828/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=5395789063627000828' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/5395789063627000828'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/5395789063627000828'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/03/blog-post_30.html' title='लेडिज टेलर के सपने'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SdEUaK8pQ3I/AAAAAAAAALA/a_0CmSSaDJ8/s72-c/image001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-6803393808982156155</id><published>2009-03-22T09:32:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T02:35:12.537-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लड़की'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टाइमपास'/><title type='text'>लड़की होने का फायदा!</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/ScZp1Ir6arI/AAAAAAAAAKE/W_l0JZiSbWA/s1600-h/12.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 235px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/ScZp1Ir6arI/AAAAAAAAAKE/W_l0JZiSbWA/s320/12.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5316052771743099570" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक लड़की ने दूसरी से पूछा-तू अगले जन्म में लड़की होना चाहेगी या लड़का? जवाब मिला-लड़का। हम पर कितनी बंदिशें हैं। बाहर ना जाओ, ये ना पहनो, ये ना खाओ, ज्यादा मत हंसो, कम बोलो...उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। लड़का होने में बहुत मजा आता होगा ना?&lt;br /&gt;इन बातों को सुनकर या पढ़कर एक बार चाहे हंसी आए पर ये छोटी-छोटी बातें गहरा दर्द लिए हैं।&lt;br /&gt;लड़की होने का दर्द जो भी है पर कुछ रोज पहले मेरी क्लासमेट्स ने लड़की होने के खूब सारे फायदे गिना डाले। इन्हें सुनकर एक बार तो खुद पर तरस आने लगा। &lt;br /&gt;फाइनल एग्जाम के लिए हमें प्रेक्टिकल तैयार करना था। लास्ट डेट थी 28 फरवरी। रातें जाग-जागकर ढाई-तीन महीने की मेहनत से अपन ने 25 फरवरी तक फाइल तैयार कर ली। राहत की सांस लेते हुए अपनी क्लास की लड़कियों से पूछा तो उनमें से ज्यादातर ने फाइल अभी शुरू भी नहीं की थी। हैरान था कि जिस काम में मुझे ढाई-तीन महीने लग गए, वह ये लड़कियां दो दिन में कैसे कर लेंगी। उन्हीं से पूछा तो पहला जवाब मिला-बॉयफ्रेंड को जिम्मेदारी सौंप दी है, वह किस दिन काम आएगा? कुछ भी करेगा पर 27 शाम तक फाइल तैयार होकर ला देगा।&lt;br /&gt;दूसरी क्लासमेट का जवाब था-कैंटीन के कंप्यूटर सैंटर वाले से बात कर ली है। उसने टाइपिंग शुरू कर दी है। कल तक हो जाएगा।&lt;br /&gt;मैं एक बार फिर हैरान। उसी कंप्यूटर वाले ने हताभर पहले क्लास के लड़कों को यह कहकर मना कर दिया था कि काम ज्यादा है, वो फाइलें तैयार नहीं कर पाएगा।&lt;br /&gt;क्लासमेट को बताया तो जवाब मिला-तुम लड़कों को कंप्यूटर वाला मना कर सकता है पर मैं कहूं तो दो-चार फाइलें और तैयार करवा लाऊं।&lt;br /&gt;वो कैसे?&lt;br /&gt;लड़की होने का कुछ फायदा तो उठाना ही पड़ता है। जरा-सा हंसकर हिल-डुल कर बात करूंगी। वो समझेगा कि मुझ पर लट्टू हो रही है। काम हो जाएगा। उसके बाद तू कौन और मैं कौन? अपना काम बनता, ऐसी-तैसी करवाए जनता।&lt;br /&gt;मैं बोला-देख, लड़की होने का यूं फायदा उठाना गलत बात है।&lt;br /&gt;जवाब मिला-कुछ गलत नहीं है। कोई उल्टा काम थोड़े ना किया है। अगर हमारे हंसने, हिलने-डुलने से लड़के ज्यादा मेहनती और ज्यादा बेवकूफ बनते हैं तो फिर हंसने में कमी क्यों रखें।&lt;br /&gt;मैं क्या बोलता? बात में दम तो है। लड़कियों के हंसनेभर से लड़के बेवकूफ बनते हैं तो गलती लड़कों की ही है। इसे इमोशनल अत्याचार कहें या कुछ और...।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-6803393808982156155?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/6803393808982156155/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=6803393808982156155' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/6803393808982156155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/6803393808982156155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/03/blog-post_22.html' title='लड़की होने का फायदा!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/ScZp1Ir6arI/AAAAAAAAAKE/W_l0JZiSbWA/s72-c/12.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-8526651187858397669</id><published>2009-03-07T11:19:00.000-08:00</published><updated>2009-04-19T02:38:03.923-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लड़की'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>वो तो...रांड है!</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SbLJjy5JDZI/AAAAAAAAAJ8/Eu6k_bpKRzY/s1600-h/1169421939opr0z01dyi5.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 256px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SbLJjy5JDZI/AAAAAAAAAJ8/Eu6k_bpKRzY/s320/1169421939opr0z01dyi5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310528527417281938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;शीर्षक पढ़कर प्लीज यह मत सोचिएगा कि कुछ अश्लील लिखा है। दरअसल शीर्षक कुछ और भी हो सकता था, लेकिन इन चंद शब्दों का असर जिन साहब पर चाहता हूं, उन्हें ब्लॉग-व्लॉग पढ़ने का शौक नहीं है। ब्लू फिल्मों की तरह कभी-कभार ब्लॉग पर कुछ `ब्लू´ पढ़ने को मिल जाए तो वे नजरें वहीं जमा लेते हैं। इससे पहले की मेरी पोस्ट (गुलाब ज्यादा बिके या कंडोम) भी वे शीर्षक पढ़कर ही पूरी चट कर गए पर अफसोस जैसा मसाला वे चाहते थे, उन्हें नहीं मिला। पिछली पोस्ट लिखकर एक बात तो महसूस हुई कि कंडोम जैसे शब्द लिखनेभर से आपको बहादुर और आधुनिक मान लिया जाता है। पिछली पोस्ट पढ़कर कई परिचितों के फोन आए। `जयपुर जाकर तू बहुत बोल्ड (बहादुर) हो गया है...´ ऐसे कमेंट देने वाला और कोई नहीं, वे ही लोग थे जो दिनभर में अनगिनत बार कंडोम, रांड (वेश्या) और मां...बहन... बोलते हैं। भगवान की दया से अपन को बात करते वक्त मां...बहन... करने की आदत नहीं। अफसोस है कि इस बात की तारीफ कभी किसी ने नहीं की। इतना जरूर सुनने को मिला-ये तो मर्दों की निशानी है। ...खैर छोडि़ए, गाली देकर मर्द बनना अपन के तो आज तक समझ नहीं आया।&lt;br /&gt;बात शुरू हुई थी `वो तो...रांड है!´ अपन के पहचान वाले तो इस तकिया कलाम से ही समझ गए होंगे कि ये किन साहब की बात हो रही है। इन साहब को दुनिया की 99 प्रतिशत महिलाएं वेश्या नजर आती हैं। राह चलती 5 साल की बच्ची हो या 50 साल की महिला...इनकी आंखें बेशर्म होकर ही उठती हैं। करीब दो साल से मेरा इन साहब से परिचय है। इन दो साल में मुझे दो बार भी याद नहीं कि किसी महिला को देखकर इन्होंने उसे वेश्या ना बताया हो। महिला दिवस है तो उसकी तैयारियों में सभी व्यस्त थे। कई फोटोग्राफ सामने थे। मजदूर महिला, राजनीतिज्ञ, खिलाड़ी, ब्यूटिशियन...और भी न जाने कितने। परदे से लेकर खुले मुंह वाली महिलाओं सभी के लिए इन साहब का यही तकिया कलाम-ये तो रांड है...मैं जानता हूं इसे। &lt;br /&gt;मुझे याद है एक बार एक ऐसे लड़के का इंटरव्यू किया था, जो लड़की के वेश में डांस और मॉडलिंग करता है। उसकी एक लाइन चौंकाने वाली थी कि `लड़की होना अपने आपमें चुनौतीभरा है।´ पुरुषों को शिकायत रहती है कि पुरुष दिवस क्यों नहीं मनाया जाता। उस लड़के की बात सभी पुरुषों का जवाब है। महिला होना चुनौतीभरा है, इसलिए महिला दिवस भी है। वे चाहे परदे में रहें, उंगलियां उठाने वाले बाज नहीं आते। बेशर्म हो आंख तो घूंघट व्यर्थ है। महिला दिवस की बधाई। नारीशक्ति को प्रणाम के साथ उन साहब से एक गुजारिश कि अपना तकिया कलाम छोड़ दें, क्योंकि हर औरत वेश्या नहीं होती। औरत मां, बहन, बेटी, पत्नी और भी बहुत खूबसूरत रिश्तों का नाम होती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-8526651187858397669?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/8526651187858397669/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=8526651187858397669' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8526651187858397669'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8526651187858397669'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='वो तो...रांड है!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SbLJjy5JDZI/AAAAAAAAAJ8/Eu6k_bpKRzY/s72-c/1169421939opr0z01dyi5.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-7530069726272549741</id><published>2009-02-13T11:47:00.000-08:00</published><updated>2009-02-13T11:52:10.388-08:00</updated><title type='text'>गुलाब ज़्यादा बिके या कंडोम?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SZXPV2HrNUI/AAAAAAAAAJ0/SV_5LXwpjBI/s1600-h/31522389mb5.png"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SZXPV2HrNUI/AAAAAAAAAJ0/SV_5LXwpjBI/s320/31522389mb5.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5302372110510536002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वेलेंटाइन्स-डे है तो विरोध के स्वर भी गूंजने लगे हैं। वेलेंटाइन्स समर्थक प्यार के विरोधियों का विरोध कर रहे हैं तो विरोधी यह कहकर विरोध जारी रखे हैं कि इससे भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुंच रहा है। दोनों में कौन सही और कौन गलत...ये तो थोड़ी दूर की बात है। अभी कुछ दिन पहले एक अखबार में पढ़ा था कि वेलेंटाइन्स-डे पर सिर्फ जयपुर में करोड़ों रुपए के गुलाब बिकेंगे। इसी बीच किसी ब्लॉग पर लेखक की चिंता भी पढ़ी कि ज़्यादातर लड़के-लड़कियांे के लिए यह दिन फिजिकल रिलेशन बनाने का बहानाभर है। शुक्रवार को डिनर के बाद टहलने निकले। एक साथी के सिर में दर्द था। मेडिकल स्टोर पर डिसप्रिन लेने पहुंचे, तभी दो लड़के जल्दबाजी में वहीं आए- दो पैकेट `कोहिनूर´ देना। दुकानदार ने कंडोम के पैकेट दिए तो दोनों इस जुमले के साथ निकल लिए-`हो गई वेलेंटाइन की तैयारी।´ उम्र में बहुत छोटे दिख रहे इन प्रेमियों के जाने के बाद अपन ने दुकानदार की चुटकी ली-`अंकल, बच्चों को भी कंडोम बेच रहे हैं?´ जवाब मिला-`इन दो दिनों में सब बिक गए। कल वेलेंटाइन्स-डे है। कंडोम का सीजन।´ ...खैर क्या करें? कुछ नहीं तो सिर्फ इतना जरूर करें कि ऐसों को `प्रेमी´ तो ना कहें, क्योंकि इश्क, मोहब्बत, प्यार, चाहत इसे समझने में उम्र बीत जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सबमें रब दिखता है...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;प्यार के मौसम में एक गाना खूब बज रहा है-`तुझमें रब दिखता है यारा मैं क्या करूं...।´ बात वेलेंटाइन्स-डे की चली है तो लगभग हफ्तेभर पुराना एक वाकया भी बता दूं। किसी काम से यूनिवçर्सटी जाना हुआ। वहां एफएम पर यही गाना बज रहा था। एक सहेली ने दूसरी से पूछा-`तुझे किसमें रब दिखता है?´ जवाब आया-`मुझे तो सबमें रब दिखता है। कोई स्मार्ट लड़का श्रीकृष्ण तो कोई गुरुनानक, कोई रामजी तो कोई भोले बाबा... लिस्ट बहुत लंबी है।´&lt;br /&gt;...खैर यहां भी क्या कर सकते हैं। चमक-धमक टाइप लड़कियों के मुंह से और कुछ सुनें, इससे पहले अपुन ने मदर टेरेसा की लाइन पढ़ डाली-`हर इंसान में ईश्वर (रब) देखो, हर इनसान से प्यार करो।´ बशर्ते वो प्यार ही हो जनाब और कुछ नहीं। चलते-चलते इतना ही कि एक सर्वे भी करवा लिया जाए कि प्यार के महीने में गुलाब ज़्यादा बिके या फिर...।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-7530069726272549741?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/7530069726272549741/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=7530069726272549741' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7530069726272549741'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7530069726272549741'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/02/blog-post_13.html' title='गुलाब ज़्यादा बिके या कंडोम?'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SZXPV2HrNUI/AAAAAAAAAJ0/SV_5LXwpjBI/s72-c/31522389mb5.png' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-8028768278481953230</id><published>2009-02-07T08:45:00.000-08:00</published><updated>2009-02-07T08:48:28.004-08:00</updated><title type='text'>...वो तो काली है!</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SY27SCjHTWI/AAAAAAAAAJs/SW5jOPltFws/s1600-h/African-American-women.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 238px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SY27SCjHTWI/AAAAAAAAAJs/SW5jOPltFws/s320/African-American-women.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5300098255081131362" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भले ही ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बन गए हैं, लेकिन अपने इंडिया की हालत न जाने कब सुधरेगी। यहां काले-गोरे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तो बनते रहते हैं, लेकिन बात लड़कियों की हो तो न जाने क्यूं उनका काला होना अपराध माना जाता है। अपने बेटे के लिए बहू चुनते वक्त तो `काली´ को नापसंद करने की बात बहुत बार सुनी होगी। अब तो हद हो गई। काम वाली बाई की डिमांड भी `गोरी´ ही है। दो दिन पहले की बात है। अपनी बर्तन वाली ने रिजाइन देने की घोषणा कुछ इस तरह की-`भाई जी, दस तारीख से मैं नहीं आऊंगी। गांव जा रही हूं हमेशा के लिए। अपना इंतजाम और मेरा हिसाब कर देना।´&lt;br /&gt;कोई लंबा-चौड़ा हिसाब था नहीं, फिर ताजी-ताजी तनख्वाह भी मिली थी, इसलिए उसके हाथ में रुपए थमाते हुए मदद की भीख भी मैंने मांग ली-`हिसाब तो हो गया, अब नई काम वाली का इंतजाम भी करती जाओ।´&lt;br /&gt;जवाब मिला-`काली चलेगी?´&lt;br /&gt;मैं थोड़ा घबराते हुए बोला-`मुझे शादी थोड़े ही करनी है। काली-गोरी जैसी भी हो दौड़ेगी।´&lt;br /&gt;वो बोली-`पहले पूछना सही है भाई जी। डेयरी के साथ वाली पंडिताइन भी इंतजाम के लिए बोली थी। मैंने इंतजाम किया तो मुंह बनाते हुए बोली-`...ये तो काली है। कोई ढंग की ढूंढ कर दे।´&lt;br /&gt;बात सुनकर बड़ी हैरानी हुई कि कमबख्त बड़े शहर के रईसों को बर्तन धोने में भी ग्लैमर चाहिए। खैर, गुनगुनाते चलें-गोरे-गोरे मुखड़े दिल काले-काले...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-8028768278481953230?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/8028768278481953230/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=8028768278481953230' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8028768278481953230'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8028768278481953230'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='...वो तो काली है!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SY27SCjHTWI/AAAAAAAAAJs/SW5jOPltFws/s72-c/African-American-women.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-372657569843121317</id><published>2009-01-31T05:45:00.000-08:00</published><updated>2009-01-31T05:59:01.634-08:00</updated><title type='text'>हम पागल ही अच्छे हैं...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SYRZAL6SzbI/AAAAAAAAAJk/ev-UlERSs2M/s1600-h/kh2802cj.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 134px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SYRZAL6SzbI/AAAAAAAAAJk/ev-UlERSs2M/s320/kh2802cj.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5297456921426709938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;निर्धन परिवारों के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध करवाने का लक्ष्य लेकर चल रहे विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति के संस्थापक श्यामसुंदर माहेश्वरी के पद्मश्री पुरस्कार के लिए चयनित होने की खबर के बाद से ही उनके घर बधाई देने वालों का तांता लगा है। फोन की घंटी है कि बंद होने का नाम ही नहीं ले रही। बधाइयों और फोन की घंटियों के बीच रुक-रुक कर चले उनके इंटरव्यू में देखा कि उनके शुभचिंतक हर जाति, हर मजहब के हैं। उन्होंने हर गरीब बच्चे को अपना माना है। अब तक के उनके सफर पर एक नजर...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;घर जाकर बहुत रोये मां-बाप अकेले में,&lt;br /&gt;सस्ता नहीं था कोई खिलौना उस मेले में।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह दो लाइनें दर्दभरी हैं, लेकिन ज्यादा दुख होता है यह सोचकर कि हम ऐसे देश में जी रहे हैं, जहां खिलौनों से महंगी शिक्षा हो गई है। पिता स्वर्गीय खयालीराम जी गरीब बच्चों के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे। 1971 में जब मैंने अध्यापन कार्य शुरू किया, तब पिताजी ने आशीर्वाद देकर निर्धन बच्चों की हरसंभव सहायता करने का वचन लिया। मैंने संकल्प लिया कि हर साल कुछ बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाऊंगा। साल-दर-साल इन बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। मैंने महसूस किया कि जहां हाथ रखो, वहीं दर्द है। हम ढोल पीटते हैं कि समाज में शिक्षा का स्तर नहीं बढ़ रहा है, लेकिन सोचने की बात है कि जो लोग दो वक्त की रोटी का जुगाड़ बमुश्किल कर पाते हैं, वह शिक्षा का खर्च कैसे वहन कर पाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लोग मिलते गए और...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आठ-दस बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाना शुरू किया था। मेरे पास आने वाले बच्चे गरीब घरों से थे। धीरे-धीरे जब इन बच्चों की भीड़ बढ़ती गई तो कुछ लोगों ने मुझे `पागल´ और `सनकी´ तक कहना शुरू कर दिया। मेरे बच्चे तक मुझे कहने लगे थे कि पापा आप हमें छोड़कर इनके पास चले जाओगे। मेरे बेटों ने धीरे-धीरे मेरी भावना को समझा, लेकिन लोगों के ताने नहीं बदले। पिताजी को वादा कर चुका था, इसलिए हार नहीं मानी। बहुत मुश्किलें आई, लेकिन मेरे पढ़ाए बच्चों में से जब आईएएस, आईपीएस, बैंक मैनेजर और इंजीनियर जैसे पदों पर आसीन हुए तो लगा जैसे सारे जहां की खुशियां मिल गई हैं। धीरे-धीरे लोग साथ आते गए और कारवां बन गया। जो लोग मुझे पागल कहते थे, वे भी बधाई देने लगे। इनसान जब कुछ अलग करता है तो थोड़ा विद्रोह तो झेलना ही पड़ता है, इसलिए थोड़ा-बहुत मुझे भी झेलना पड़ा। भगतसिंह की दो लाइनें याद थीं...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,&lt;br /&gt;हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेरा पद्मश्री पत्नी के नाम...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मेरा मानना है कि आप किसी काम में तब तक सफल नहीं हो सकते, जब तक गृहलक्ष्मी उसमें सहयोग ना करे। मेरा यह पुरस्कार पूरी तरह मेरी पत्नी के नाम है। स्त्री को दुर्गा यूं ही नहीं कहा गया। वह अपने दो हाथों से दस हाथों जितने काम एकसाथ करने का सामर्थ्य रखती है। भूला नहीं हूं वो दिन। मेरी पत्नी पुष्पा कपड़े धो रही होती थी कि तभी किसी बच्चे की सहायता के लिए फोन बज उठता था। पत्नी फोन सुने, इससे पहले डोर बैल बज जाती थी। ऊपर से गैस पर चढ़ाए दूध का ध्यान भी रखना था। इन सभी चीजों को एकसाथ कैसे मैनेज करना है, यह स्त्री ही समझती है। पुष्पा ने यह सब किया। घर का राशन लाना हो या मेरी अनुपस्थिति में किसी जरूरतमंद बच्चे की मदद करनी हो...सभी काम पुष्पा ने किए। मुझे संगीत बहुत पसंद है। बहुत थका-हारा होने के बावजूद कभी रात को हारमोनियम बजाने का मन करता था। आवाज से कभी-कभी पड़ोसी जाग जाते थे पर दिनभर की थकी पत्नी ने उफ तक नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वो बचपन का जमाना था...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मेरे पिता आढ़ती थे। बचपन संपन्नता में गुजरा। कभी किसी चीज की कमी नहीं रही। बचपन के दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि आज के बच्चे अपना बचपन जी ही नहीं रहे। हम बड़ों का आदर करते थे, लेकिन आज बड़ों को बच्चों से डरकर रहना पड़ रहा है। खुद की मर्जी चलाकर तो उम्रभर जीना है। बड़ों की डांट और उनके डर के साथ बिताए बचपन का मजा ही अलग था। उस जमाने में अनुशासनहीन कोई-कोई होता था और आज अनुशासित कोई-कोई है। बस इसी अंतर के कारण ही युवा अपने लक्ष्य से भटक रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मोबाइल है या मुसीबत...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं मोबाइल नहीं रखता। कुछ लोग इस बात को झूठ समझते हैं, लेकिन मुझे बहुत-सी परेशानियों की जड़ तो मोबाइल लगता है। मैं खुद मोबाइल नहीं रखता, इसलिए कम-से-कम अपनी क्लास में तो स्टूडेंट्स को मोबाइल ऑफ रखने को कह सकता हूं। मेरा बड़ा बेटा मुम्बई में सीए है और छोटा यहीं लेक्चरर है। पद्मश्री की सूचना मिलने पर कुछ शुभचिंतकों ने बेटों से कहना शुरू कर दिया कि पापा को मोबाइल ले दो। मुझे मोबाइल नहीं रखना है, लेकिन बेटे की खुशी के लिए एक दिन के लिए उसका मोबाइल जेब में रख लिया है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुरस्कार के लिए काम नहीं...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैंने कभी किसी पुरस्कार की उम्मीद के साथ काम नहीं किया। हमारी समिति द्वारा शिक्षित बच्चे कुछ बनकर नाम कमा रहे हैं, वही हमारे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। दरअसल, पुरस्कार काम करने के लिए प्रेरणा तो प्रदान करते हैं, लेकिन किसी काम की सफलता को पुरस्कार के आधार पर आंकना सही नहीं है। हमारे देश में बुनियादी समस्या शिक्षा की है। अगर शिक्षा की समस्या खत्म हो जाए तो बहुत-सी समस्याएं स्वत: ही खत्म हो जाएंगी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(श्रीगंगानगर निवासी श्यामसुन्दर माहेश्वरी का जन्म 1 अगस्त, 1952 को श्रीकरणपुर में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा श्रीगंगानगर के श्री सनातन धर्म बड़ा मंदिर से हुई। इसके बाद एसडी बिहाणी स्कूल व कॉलेज से उन्होंने शिक्षा ग्रहण की। एसजीएन खालसा कॉलेज (श्रीगंगानगर) में कॉमर्स डिपार्टमेंट के एचओडी श्री माहेश्वरी डबल एमकॉम हैं। श्री माहेश्वरी ने 25 अक्तूबर, 1988 को विद्याथीü शिक्षा सहयोग समिति की स्थापना की। श्री माहेश्वरी के नेतृत्व में जनसहयोग से आज लगभग 4500 स्टूडेंट शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। श्री माहेश्वरी से पहले श्रीगंगानगर के कर्नल एएस चीमा (एवरेस्ट विजेता) को 1969 में पद्मश्री से नवाजा जा चुका है।)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-372657569843121317?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/372657569843121317/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=372657569843121317' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/372657569843121317'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/372657569843121317'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/01/blog-post_31.html' title='हम पागल ही अच्छे हैं...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SYRZAL6SzbI/AAAAAAAAAJk/ev-UlERSs2M/s72-c/kh2802cj.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-4832207018095915883</id><published>2009-01-20T12:26:00.000-08:00</published><updated>2009-01-20T12:31:33.856-08:00</updated><title type='text'>मम्मी, बहलाना-फुसलाना क्या होता है?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SXY0ifw9DcI/AAAAAAAAAJU/aQA0VvOQYus/s1600-h/question-mark_cartoon%5B1%5D.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 304px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SXY0ifw9DcI/AAAAAAAAAJU/aQA0VvOQYus/s320/question-mark_cartoon%5B1%5D.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5293476179267620290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं। वो एक गीत भी तो है-बच्चे मन के सच्चे...। भई बच्चों का मन तो सच्चा है, लेकिन वे भगवान का रूप सिर्फ तभी तक हैं, जब तक वे सही मायने में बच्चे ही रहते हैं। अब वो जमाना तो रहा नहीं कि पंद्रह-सोलह साल से पहले बच्चों को दुनियादारी की खबर नहीं होती थी। उम्र से पहले समझदार होते बच्चे कभी-कभी कुछ ऐसे सवाल पूछ लेते हैं कि सामने वाला टेंशन में आ जाए। अभी कल ही की बात लीजिए। मैं अपने एक मित्र के घर बैठा था कि उनका दस वर्षीय बेटा हाथ में अखबार उठाए वहां आया और पूछने लगा-`मम्मी, बहलाना-फुसलाना क्या होता है?´ भाभी ने पूछा-`तुम ये क्यों पूछ रहे हो?´ बच्चा बोला-`अखबार में छपा है कि चार बच्चों की मम्मी को एक आदमी बहला-फुसलाकर भगा ले गया।´ उसकी बात का भाभी को कोई जवाब नहीं सूझा। वे बोलीं-`आजकल टीवी पर बड़े बेकार प्रोग्राम आते हैं, इसलिए इसके पापा ने इसे टीवी देखने की बजाय अखबार पढ़नेे का शौक अपनाने को कहा है। अब लगता है कि इसके अजीब सवाल फिर सरदर्द बनेंगे।´ भाभी अपनी बात पूरी करतीं, इससे पहले बच्चा फिर बोला-`मम्मी, बताओ न, बहलाना-फुसलाना क्या होता है?´ भाभी ने खुद बचते हुए मेरी ओर इशारा किया-`अपने चाचा से पूछ लो।´ मैं संभलता इससे पहले बच्चा मेरे पास आकर वही सवाल दोहराने लगा। मैंने किसी तरह बच्चे के सवाल का जवाब दिया तो उसने तपाक से एक और सवाल दाग दिया-`जब मैं ही किसी के बहलाने-फुसलाने में नहीं आता तो मम्मी जितनी आंटी को कैसे किसी ने बहला-फुसला लिया।´ अब बच्चे की बात में सच्चाई तो थी पर उसके इस सवाल का जवाब मेरे पास भी नहीं था। `कल जाकर अपनी टीचर से पूछ लेना´ यह कहकर मैंने अपना पीछा छुड़ाया। घर लौटा तो बार-बार उस बच्चे की टीचर का खयाल आ रहा था, पता नहीं वे उस बच्चे के सवाल का जवाब दे पाएंगी या नहीं?&lt;br /&gt;यही बात मैंने अपने एक एडवोकेट मित्र को बताई तो वे हंसते हुए बोले-`हमारे पास तो आए दिन ऐसे केस आते हैं। हम भी फुरसत में बैठकर यही सोचते हैं कि कैसा कानून है हमारा। 5 साल की बच्ची से लेकर 50 साल की महिला को बहलाने-फुसलाने का मुकदमा दर्ज होता है। देखते नहीं हो, प्रेमी जोड़े घर से फरार होते हैं तो केस दर्ज होता है-लड़के ने लड़की को बहला-फुसलाकर भगा लिया। असली माजरा क्या है, ये तो हम वकील, कुर्सी पर बैठे जज और हर कोई जानता है, लेकिन क्या करें कानून स ऊपर कोई है क्या...´&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-4832207018095915883?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/4832207018095915883/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=4832207018095915883' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4832207018095915883'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4832207018095915883'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/01/blog-post_20.html' title='मम्मी, बहलाना-फुसलाना क्या होता है?'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SXY0ifw9DcI/AAAAAAAAAJU/aQA0VvOQYus/s72-c/question-mark_cartoon%5B1%5D.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-4019125783719468696</id><published>2009-01-14T11:38:00.001-08:00</published><updated>2009-01-14T11:40:43.359-08:00</updated><title type='text'>मेरा आना और उनका जाना...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SW4_XqcmVcI/AAAAAAAAAJI/7Escp7mtpUc/s1600-h/kamal+Nagpal.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 227px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SW4_XqcmVcI/AAAAAAAAAJI/7Escp7mtpUc/s320/kamal+Nagpal.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291236287970694594" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;(पुण्यतिथि-15 जनवरी)&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हर रोज न जाने हम कितने लोगों से मिलने की ख्वाहिश करते हैं, लेकिन मुलाकात सिर्फ उन्हीं से होती है, जहां दिल से पुकार होती है। पिछले साल लोहड़ी पर घर आने की कोई प्लानिंग नहीं थी। शायद कमल अंकल के अंतिम दर्शन नसीब में थे, जो बिना किसी तैयारी एकदम से श्रीगंगानगर आना हुआ। तीन दिन घर और दोस्तों के बीच कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। अच्छी तरह याद है मंगलवार का वो दिन। शाम 8.30 बजे की बस थी। करीब 6.30 बजे एक दोस्त का फोन आया-`कमल अंकल नहीं रहे, तू अपनी रिजेर्वेशन कैंसिल करवा दे।´ पापा टिकट कैंसिल करवाने जाने लगे तो मैंने मना कर दिया। पापा के साथ `प्रताप केसरी´ पहुंचा। जाली के दरवाजे में से कमल अंकल को देखा तो कुछ सेकंड आंखें बंद कर उन्हें नमस्कार किया। श्रीगंगानगर से जयपुर पहुंचने में लगी वो पूरी रात आंखें भीगी रही। यूं लग रहा था जैसे बहुत कुछ खो दिया है। बीच-बीच में कई परिचितों के फोन आ रहे थे-`उनके अंतिम संस्कार के लिए तुझे रुकना चाहिए था...।´ ऐसी ही बातें सुनने को मिल रही थी। मैं नहीं रुका, क्योंकि मुझे उनकी ही कही एक बाद याद थी।&lt;br /&gt;एक बार कमल अंकल ने किसी व्यक्ति के देहांत पर श्रद्धांजलि लिखकर कम्पोजिंग के लिए मुझे दी। मैंने मजाक किया-`हम इतने लोगों की श्रद्धांजलियां छापते हैं, हमारे लिए भी कोई श्रद्धांजलि लिखेगा क्या?´ बात काफी पुरानी है, लेकिन मुझे याद सिर्फ इसलिए है, क्योंकि मजाक में किए मेरे सवाल पर उनका जवाब काफी गहन था। जवाब था-`श्रद्धांजलि तो सिर्फ याद करने की औपचारिकता है। अंतिम संस्कार में शामिल भीड़ या अखबारों में छपी श्रद्धांजलियां व्यक्ति की अहमियत तय नहीं करती। खुशी और गम...मन में कितना है, ये बात अहम है, ना कि उसे व्यक्त करना।´&lt;br /&gt;आज भी जब सीनियर्स मेरी हिंदी की तारीफ करते हुए पूछते हैं `किसने सिखाया´ तो कमल अंकल का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। हर व्यक्ति अपने परिवार के सबसे ’यादा करीब होता है, लेकिन इसके बाद वे मेरे काफी करीबी रहे। कुछ महीने तक रोज 12 घंटे से ज्यादा उनके साथ रहा। मेरा सौभाग्य है कि उनके सान्निध्य में मुझे इतना कुछ सीखने को मिला। `प्रताप केसरी´ में उन्होंने मेरे लिए कॉलम शुरू किया-`बात-पर-बात´। उन्होंने ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने मुझे किताबों से प्यार करना सिखाया। जयपुर आने के बाद भी कभी कुछ समझ नहीं आता तो हमेशा उन्हें ही फोन करता था। इतनी व्यस्तता के बावजूद वे हमेशा मेरी समस्या का समाधान करते थे। आज हिंदी का कोई शब्द गलत लिख बैठता हूं तो सुधार से पहले उनकी डांट की कमी महसूस होती है। छोटी-सी बात पर जब मैं ऑफिस छोड़कर चला गया तो कुछ दिन बाद गाड़ी लेकर वे खुद मुझे लेने आ गए, फिर प्यार से समझाया कि बाप-बेटा हमेशा के लिए नहीं रूठ सकते। जयपुर में छपी मेरी स्टोरीज उनको दिखाता तो शाबाशी में वो मेरा मुंह मीठा करवाते...। उनके साथ मेरी अनगिनत यादें जुड़ी हैं। उनके लिए मेरी शब्दांजलि कभी खत्म होने वाली नहीं है। उन्हें जाना था, लेकिन न जाने क्यूं दिल कहता है कि उन्होंने याद किया, इसीलिए मुझे उनके आखिरी दर्शन नसीब हुए। वो चले गए हैं सभी को छोड़कर, लेकिन मेरे लेखन और यादों में आज भी वो जिंदा हैं मेरे लिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-4019125783719468696?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/4019125783719468696/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=4019125783719468696' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4019125783719468696'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4019125783719468696'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/01/blog-post_14.html' title='मेरा आना और उनका जाना...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SW4_XqcmVcI/AAAAAAAAAJI/7Escp7mtpUc/s72-c/kamal+Nagpal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-4972853851882593563</id><published>2009-01-05T08:27:00.000-08:00</published><updated>2009-04-19T02:41:38.717-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं और मौत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><title type='text'>माँ, मैं और मौत!</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SWT2RblNJYI/AAAAAAAAAI0/BLkBkbt06P4/s1600-h/MotherAndSonAbstracted.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 231px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SWT2RblNJYI/AAAAAAAAAI0/BLkBkbt06P4/s320/MotherAndSonAbstracted.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5288622641761822082" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी ज़िन्दगी में हम ऐसे दौर से गुज़रते हैं, जब सवाल तो बहुत सारे होते हैं, लेकिन उनका जवाब लाख कोशिशों बाद भी नही मिलता। ऐसा ही एक सवाल काफी वक्त से मुझे परेशान किए है। कुछ ख़ास लोगों को अपने दिल का हाल कहा तो जवाब में ख़ुद को पागल, सनकी और न जाने क्या-क्या सुनना पडा।&lt;br /&gt;दरअसल मेरी माँ और मेरे बीच मौत के ख्याल से में डरने लगा हूँ। ऐसा एकदम से नही हुआ, बल्कि पिछले डेढ़ साल में मेरी ज़िन्दगी में हुई दो अलग-अलग घटनाओ से हुआ। मार्च 2००६ की बात है। एक नए शख्स से मेरी दोस्ती हुई। मेरे इस दोस्त की मम्मी को गुज़रे काफ़ी वक्त हो चुका है। जयपुर में अकेला था, इसलिए कभी-कभी इसी दोस्त के घर जाने लगा। पहली बार जब में अपने इस दोस्त के घर गया तो वहां माँ की कमी को मैंने दिल से महसूस किया। सब-कुछ होने के बावजूद वहां जैसे कुछ नही था। रात भर सो नही पाया। इक अजीब सा डर मुझे खाए जा रहा था। पता नही क्यूँ मेरा मन मुझे उस दोस्त की जगह ख़ुद को रखने के बारे में सोचने के लिए मजबूर करने लगा था। मेरी माँ मुझसे दूर हो जाए ...ऐसा सोचना ही मेरी आँखों में पानी ला देता है। भगवान् कभी मुझे ऐसा दिन न दिखाए। अब तो बस हर रोज़ पूजा में भगवान् से यही मांगने लगा था। दुआ करता था की मेरी माँ से पहले मुझे मौत मिले ताकि मुझे अपने दोस्त की जगह कभी होना ही न पड़े। &lt;br /&gt;इसी डर के साथ ज़िन्दगी चल रही थी की मेरे मकान मालिक का ४० साल का बेटा चल बसा। उसके जाने का दुःख मुझे रत्ती भर भी नही था। आधी रात को उठकर अपनी माँ को गालियाँ देने वाले आदमी को तो मार देना चाहिये, लेकिन एक माँ के लिए उसकी औलाद कितनी अहमियत रखती है, ये दूसरो के लिए समझ पाना बहुत मुश्किल है। बेटा चला गया था लेकिन उसकी मौत वाली रात को भी दिए की कम होती लो उस माँ को बेचैन किए थी। उस माँ ने गरम दिया हाथ में लिया और उसे बुझने से बचा लिया। उस माँ की नज़र में एक अपशगुन होने से बच गया। कितनी अजीब बात है, मौत से बडा अपशगुन और क्या होगा? लेकिन ये माँ की भावना है और इसे एक माँ ही समझ सकती है। उस दिन के बाद मैंने एक माँ को रोज़ रोते हुए देखा। में भी आपका बेटा ही हूँ...जैसा दिलासा देने की हिम्मत भी में नही जुटा पाया।&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले में माँ के बिना ख़ुद के बारे में सोच कर डर जाता था, लेकिन बेटे के जाने के बाद उस माँ का हाल देखकर जैसे मैं ख़ुद से नफरत करने लगा था। मैं भगवान् से अपनी माँ से पहले ख़ुद की मौत मांगने लगा था, ताकि मुझे बिना माँ के होने वाली तकलीफ से न जूझना पड़े। ख़ुद के बारे में ही सोचा...भूल बैठा की उसके बाद माँ का क्या होगा? अब जब बेटे की मौत के बाद एक माँ का हाल देखा तो उस माँ की जगह अपनी माँ का ख्याल आते ही दिल कांप उठा।&lt;br /&gt;आज भी मन अजीब असमंजस में है। पहले मौत किसकी होगी-माँ या मेरी...? हालाँकि जो होना है वो तो होकर रहेगा। मौत एक दिन आयेगी ही, लेकिन चाहकर भी ये बुरा ख्याल मन से निकाल नही पा रहा हूँ। जाने क्या होगा...काश, ऐसा हो की मेरी माँ और मेरी मौत की घड़ी एक हो, ताकि दोनों उस दर्द से बच जायें, जिसकी कल्पना भी इतनी भयानक है। काश ऐसा हो जाए...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-4972853851882593563?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/4972853851882593563/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=4972853851882593563' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4972853851882593563'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4972853851882593563'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='माँ, मैं और मौत!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SWT2RblNJYI/AAAAAAAAAI0/BLkBkbt06P4/s72-c/MotherAndSonAbstracted.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-1113628428685352617</id><published>2008-12-26T11:29:00.000-08:00</published><updated>2008-12-26T11:48:08.400-08:00</updated><title type='text'>पंजाबन से पंगा!</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SVUz_sALBtI/AAAAAAAAAIs/ztkFVvhhk1M/s1600-h/1137686487-2633.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 267px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SVUz_sALBtI/AAAAAAAAAIs/ztkFVvhhk1M/s320/1137686487-2633.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5284186907025802962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी यूं लगता है कि ये जिंदगी बस एक पंगा ही है, जिसमें रोज कोई न कोई दंगा होता है, हर गली-चौराहे पर एक न एक भिखमंगा होता है और भला-चंगा हो और इसी कारण भीख ना मिल रही हो तो जानबूझकर नंगा होता है। भई ये तो सिर्फ मैंने दंगा, पंगा, भिखमंगा और नंगा आदि शब्दों की एक बेतुकी-सी तुकबंदी की है, लेकिन आज शाम को कुछ ऐसा हुआ कि ये सारे शब्दों का मिलन हो गया।&lt;br /&gt;पकौड़े लेकर घर लौट रहा था कि एक सजी-धजी लड़की टाइप आंटी स्कूटी स्टार्ट करती दिखीं। पास में ही दो बच्चे भीख मांगते हुए घूम रहे थे। आंटी के पास पहुंचने ही वाला था कि एक बच्ची ने आंटी से कहा-`ए बाई, एक रुपया दे दे...।´ अपने मेकअप पर ही एक टाइम में सौ-पचास रुपए खर्च कर निकली आंटी को उस बच्ची से हमदर्दी नजर आना तो दूर की बात है, उसका मजाक उड़ाने के लहजे में बोलीं-`अरे यार...तू मुझे कुछ दे दे।´ मेरी जेब में कुछ सिक्के थे। मैंने बच्ची को देते हुए कहा-`लो मुझसे ले लो (एक सेकंड रुककर)...और इन आंटी को दे दो।´ इतना कहते हुए मैंने अपनी स्पीड कुछ बढ़ा दी, क्योंकि अगर मैं वहां रुकता तो पांच-छह सेकंड में हुई इस घटना का एंड मेरी पिटाई या कुछ और भी हो सकता था। ऐसा इसलिए कि वो आंटी जिस घर से निकली थीं, वो पूरी गली पंजाबियों की है। वैसे तो मैं भी पंजाबी हूं, लेकिन वे एक हट्टी-कट्टी पंजाबन थीं और मैं एक दुबला-पतला पंजाबी। शुक्र है कि पंजाबन से पंगा भारी नहीं पड़ा। रब करे कि इस छोटे-से कमेंट से उन आंटी में इतना बदलाव आए कि वे किसी को भीख भले ही ना दें, लेकिन उनका मजाक भी ना बनाएं। चलते-चलते एक आधी-अधूरी याद आई गजल...&lt;br /&gt;ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझको संवारा ही न हो&lt;br /&gt;कुछ न कुछ हमने तेरा कर्ज़ उतारा ही न हो&lt;br /&gt;दिल को छू जाती है यूं रात की आवाज कभी&lt;br /&gt;चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो&lt;br /&gt;कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर&lt;br /&gt;सोचता हूं तेरे आंचल का किनारा ही न हो&lt;br /&gt;शर्म आती है कि उस शहर में हैं हम कि जहाँ&lt;br /&gt;न मिले भीख तो लाखों का गुजारा ही न हो&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-1113628428685352617?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/1113628428685352617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=1113628428685352617' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/1113628428685352617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/1113628428685352617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/12/blog-post_26.html' title='पंजाबन से पंगा!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SVUz_sALBtI/AAAAAAAAAIs/ztkFVvhhk1M/s72-c/1137686487-2633.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-4725450285925216048</id><published>2008-12-10T04:35:00.000-08:00</published><updated>2008-12-11T11:37:47.221-08:00</updated><title type='text'>खंडित वजूद</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SUFr9nY8J2I/AAAAAAAAAIc/GsfvPkXeDfc/s1600-h/38.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 192px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SUFr9nY8J2I/AAAAAAAAAIc/GsfvPkXeDfc/s320/38.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5278618944544712546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/ST_QVv-ah2I/AAAAAAAAAIU/-rhpTneMdQc/s1600-h/12.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 259px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/ST_QVv-ah2I/AAAAAAAAAIU/-rhpTneMdQc/s320/12.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5278166360375592802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;जब दृष्टिहीन, मूक-बधिर, अपंग, यहां तक कि मानसिक रूप से विकलांग को भी जीने का बुनियादी हक है तो फिर लैंगिक विकलांग को क्यों नहीं? क्यों पैदा होते ही वे अमानवीय परिस्थितियों में धकेल दिए जाते हैं? ब्रह्मचर्य का आदर करने वाले समाज में लिंग इतना महत्वपूर्ण क्यों? क्यों ये तबका खंडित वजूद के साथ जीने को मजबूर है।&lt;/strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक &lt;/strong&gt;ओर तो हम इनसे कन्नी काटते हैं, वहीं दूसरी ओर ये विश्वास भी करते हैं कि इनकी दुआओं और बद्दुआओं में गजब का असर है। मानो ये मनुष्य न होकर कोई दैवीय शक्ति हों। लैंगिक विकलांग (जिन्हें ज्यादातर&lt;br /&gt;लोग हिजड़ा या किन्नर कहते हैं) जन्म से लेकर मृत्यु तक संघर्षों का सामना करते हैं। समाज के उपेक्षित व्यवहार के साथ ही इन्हें अपनों की ज्यादती का शिकार भी होना पड़ता है। जाने-अनजाने हमारे मन में इनके प्रति घृणा और भय के अलावा कोई और भाव आता ही नहीं है। लैंगिक विकलांगों से रूबरू होना चाहा तो काफी मुश्किल हुई। कहीं इन्हें अपने गुरु की इजाजत नहीं मिली तो कहीं ऐसे जवाब सुनने को मिले-`इतने साल जिंदगी ढो ली, आगे भी ढो लेंगे। पढ़ना-लिखना नहीं जानते तो इंटरव्यू देकर क्या करेंगे? वर्षों पुरानी परंपराएं यूं टूटती हैं क्या?´ काफी मान-मनोव्वल करने पर बड़ी मुश्किल से दो मिलने को तैयार हुईं। इन्हें चाय पर आमंत्रित किया तो इन्हें विश्वास नहीं हुआ। लगा जैसे कोई मजाक कर रहा है। जवाब मिला-`आज तक हमें किसी ने चाय-पानी का आमंत्रण नहीं दिया। पहले अपने परिवार वालों से तो पूछिए। हम बधाई मांगने के अलावा कभी किसी के घर नहीं गए।´ मुलाकात हुई तो सबसे पहली विनती यही कि नाम और पहचान गोपनीय रखी जाए, क्योंकि वरिष्ठ की आज्ञा का उल्लंघन मतलब एक रुपए का गर्म सिक्का माथे पर...। अपने हर सवाल पर इनसे मिला जवाब जैसे अपने पीछे कई और सवाल छोड़ता चला गया...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मां का पहला दूध भी नसीब नहीं...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;`क्या नाम है आपका?´ जन्म से पहले शायद हमारे परिवार ने भी कई नाम सोचे होंगे, लेकिन हिजड़े पैदा हुए तो नाम तो दूर की बात है, मां पहला दूध दिए बिना ही अस्पताल में छोड़ गईं। नौ माह के गर्भकाल के दौरान सिर्फ मां ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार उत्सुकता से नए मेहमान की प्रतीक्षा करता है। बच्चा अगर अंधा, गूंगा, बहरा, लंगड़ा या अन्य किसी शारीरिक अथवा मानसिक विकलांगता के साथ जन्म लेता है तो भी माता-पिता अपनी अंतिम सांस तक उसका पालन-पोषण करते हैं, लेकिन यही ममता और प्रेम तब क्यों बौना हो जाता है, जब बच्चा लैंगिक विकलांग पैदा होता है? 40 वर्ष की हो चुकीं शबनम कहती हैं कि हम जैसे बच्चों में से ज्यादातर को तो ये कहकर जन्म प्रमाण-पत्र ही नहीं मिलता कि ये न लड़का है, न लड़की, फिर प्रमाण-पत्र का क्या करेंगे। नाम कुछ भी लिख दीजिए। पहले जहां बसंती, रामप्यारी ऐसे नाम होते थे, वहीं अब माधुरी, ऐश्वर्या नए नाम रखने लगे हैं। मैंने अपने जैसे कई बच्चों की परवरिश की है। उनके नाम तो रखे ही हैं। उंगली पकड़कर चलना और बोलना भी सिखाया है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;न जन्म की खुशी, न मौत का गम...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जरा सोचिए, आप बीच रास्ते हों और आपको शौच जाना हो। सामने सार्वजनिक शौचालय दिखाई दे। एक-एक क्षण भारी हो रहा हो। सभी शौचालय खाली हैं, लेकिन इमरजेंसी के बावजूद आपको कोई शौचालय में ना घुसने दे। कितनी विचित्र स्थिति होगी न? लैंगिक विकलागों को ऐसी समस्या का सामना भी करना पड़ता है। महिलाओं के शौचालय में जाएं तो वे झगड़ा करती हैं और पुरुषों में वे जाएं कैसे। मानवाधिकारों के दंभ भरने वाली संस्थाएं इनके लिए कितना कुछ कर पाई हैं, ये भी किसी से çछपा नहीं है। ऐसे लैंगिक विकलांग बच्चे बहुत कम होते हैं, जिन्हें अपने माता-पिता के बारे में मालूम होता है। जन्म लेते ही ऐसे बच्चों को किसी और के भरोसे छोड़ दिया जाता है। बच्चे के जन्म पर बधाई गाने वाले ये लोग उम्रभर इस दुख में जीते हैं कि इनके जन्म पर क्यों किसी को खुशी नहीं हुई? बचपन से लेकर बुढ़ापे तक ये एक ही माहौल में जीते हैं। इनके जीवन का दर्द इनकी मृत्यु के बाद होने वाली रस्मों से भी साफ झलकता है। इनका अंतिम संस्कार आधी रात को होता है। उससे पहले शव को जूते-चप्पलों से पीट-पीट कर दुआ मांगी जाती है कि ऐसा जन्म फिर ना मिले।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वो बचपन की उमराव जान...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मेघना बाई की उम्र है लगभग 33 साल। मेघना बताती हैं कि बचपन में `उमराव जान´ फिल्म देखी तो लगा कि मेरी जिंदगी भी रेखा की तरह है। उम्र इतनी कम थी कि आदमी-औरत और किन्नर का अंतर भी नहीं मालूम था। नाचना-गाना सीखती थी तो फिल्म देखकर खुद को रेखा की जगह रखने लगी। बड़ी हुई तो यह सच मालूम हुआ कि वेश्या और किन्नर दोनों अलग-अलग होते हैं। मेघना कहती हैं कि किसी के घर किन्नर पैदा होता है तो मां-बाप उसे लावारिस छोड़ देते हैं। ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि ऐसे बच्चों को हम जबरदस्ती ले आते हैं। इस बात में कितनी सच्चाई है, ये हम ही जानते हैं। परिवार वाले खुद हमें बुलावा भेजते हैं, तभी बच्चा लाते हैं। सोचकर देखिए, अगर किसी का बेटा या बेटी कोई जबरदस्ती उठा लाए तो मां-बाप थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाते हैं। एक भी किस्सा ऐसा बता दीजिए, जब किसी किन्नर बच्चे को ले जाने संबंधी रिपोर्ट दर्ज करवाई गई हो। दरअसल ऐसे बच्चों को कोई अपने पास रखना ही नहीं चाहता। सिर्फ दिखावे के लिए ये ढोल पीटा जाता है कि किन्नर जबरदस्ती बच्चा ले गए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हाशिए से बाहर की जिंदगी...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;स्त्री-पुरुष में विभाजित समाज के पास इन दोनों से परे थर्डजेंडर के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं है। शिक्षा हो या नौकरी...कहीं इन्हें अधिकार मिले भी हैं तो वे सिर्फ कागजों में सिमटकर रह गए हैं। समाज के साथ ये कदम मिलाकर चलें, ये किसी को मंजूर नहीं है। जैसे कोई शिशु अपनी मर्जी से शारीरिक अथवा मानसिक विकलांग पैदा नहीं होता, उसी तरह लैंगिक विकलांगता का दोष भी किसी का नहीं है। फिर इन्हें असामान्य या अपराधी क्यों समझा जाए? तालियां बजाने वाले हाथ अगर कलम थामकर पढ़ना चाहें, डॉक्टर, वकील या इंजीनियर बनना चाहें तो इनके स्वागत के लिए कोई तो हो। ऐसा संभव हो भी तो कैसे? स्त्री-पुरुषों का हमारा यह समाज शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों में इन्हें स्वीकार्यता नहीं देता और वोट बैंक की राजनीति में उलझे नेताओं के तो वायदा पत्रों तक में `थर्डजेंडर´ का जिक्र ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;देखी है वहशीपन की हद...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मोहिनी बताती हैं कि मेरे माता-पिता ने मुझे लावारिस नहीं छोड़ा। समाज से छिपाकर लड़की की तरह पाला, स्कूल में दाखिला करवाया। एक रोज मेरे सगे फूफा ने मुझे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा। इसी दौरान वे जान गए कि मैं लैंगिक विकलांग हूं। पूरे गांव में मेरी सच्चाई बता दी। माता-पिता से मुझे किन्नरों को सौंपने की बात कही। मना किया तो पूरे परिवार को मारने की धमकियां मिलने लगी। मुझे किन्नर समूह में धकेल दिया गया। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आखिर कब बनेगा कारवां...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लैंगिक विकलांगों के प्रति समाज की सोच बदलने का लक्ष्य लेकर चल रही हैं मनीषा नारायण। लैंगिक विकलांग होने के बावजूद मनीषा ने खुद को सिर्फ नाच-गाने तक सीमित नहीं रखा। कलम उठाई और लिखना शुरू किया। हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, तेलगू, मराठी और गुजराती भाषाओं की जानकार मनीषा एशिया की पहली लैंगिक विकलांग ब्लॉगर हैं। ग्रेजुएट मनीषा की उम्र 28 वर्ष है। मनीषा कहती हैं कि दिन में भी ऐसे ख्वाब देखने लगती हूं जब लैंगिक विकलांग संतान को भी माता-पिता अपना मानेंगे। फॉर्म में स्त्री/पुरुष के साथ तीसरा कॉलम थर्डजेंडर के लिए भी होगा। हमारे लिए भी अलग से सार्वजनिक शौचालय होंगे। ट्रेन, बसों के साथ हर क्षेत्र में हमारे लिए कुछ सीटें रिजर्व रखी जाएंगी। लैंगिक विकलांग बच्चे सभी के साथ स्कूल-कॉलेज में पढ़ेंगे। हमारे भी दोस्त होंगे। हमसे भी सभी प्यार करेंगे। हमें भी दैवीय शक्ति, अपराधी, असामान्य ना मानकर, एक इंसान माना जाएगा...। हर बार ऐसा ख्वाब भीड़ में किसी पुरुष की चिकोटी या `ओए हिजड़े...´ जैसी भद्दी टिप्पणी से टूटकर बिखर जाता है। इसके बावजूद मैं हार मानने वाली नहीं हूं। लैंगिक विकलांगों के हित के लिए मुझे राजनीति में आने की भी जरूरत नहीं है। कई किन्नर चुनाव लड़ते हैं, जीतते भी हैं, लेकिन मुझे याद नहीं कि किसी किन्नर नेता ने भी लैंगिक विकलांगों को इंसाफ दिलाने के लिए कुछ किया हो। मनीषा कहती हैं कि लोगों को शिकायत रहती है कि हम ट्रेनों, बसों में भीख मांगकर उन्हें परेशान करते हैं, मुंहमांगी बधाई ना मिलने पर कपड़े खोलने, अपशब्द बोलने की शिकायतें भी समाज को हमसे हैं। जरा सोचिए कि जिन्हें कभी यह बताया ही नहीं गया कि शर्म क्या होती है, वे शर्म करना कैसे जानेंगे? लैंगिक विकलांग बधाई और भीख नहीं मांगेंगे तो उनका पेट कैसे भरेगा, क्योंकि और किसी भी कार्य में समाज उनके प्रवेश को स्वीकार्यता ही नहीं देता। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन जब दोहरा व्यवहार बंद होगा और हम भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो जाएंगे, तब समाज की ये शिकायतें दूर हो जाएंगी। एक बात और कहूंगी कि असली व नकली किन्नरों की पहचान के लिए कोई कदम उठाया जाए। बहुत-से समलैंगिक पुरुष किन्नरों के वेश में लोगों से पैसा मांगकर परेशान करते हैं। इनकी बद्तमीजी का दोष भी लैंगिक विकलांगों के सिर ही आता है। कई समाजों में हम जैसे लोगों को सम्मान प्राप्त है, लेकिन भारतीय समाज में अभी यह बदलाव आना बाकी है। मैं लैंगिक विकलांगों को सिर्फ कागजी अधिकार दिलाने के लिए नहीं लड़ रही हूं। कानूनी मान्यता के साथ-साथ जब तक समाज का नजरिया हमारे प्रति नहीं बदलेगा, तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-4725450285925216048?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/4725450285925216048/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=4725450285925216048' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4725450285925216048'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/4725450285925216048'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='खंडित वजूद'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SUFr9nY8J2I/AAAAAAAAAIc/GsfvPkXeDfc/s72-c/38.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-8861642981819534532</id><published>2008-11-14T07:53:00.000-08:00</published><updated>2008-11-14T07:56:00.744-08:00</updated><title type='text'>पागल</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SR2fgAKcD0I/AAAAAAAAAH8/NRVUS7MtDpc/s1600-h/SadBoy.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 283px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SR2fgAKcD0I/AAAAAAAAAH8/NRVUS7MtDpc/s320/SadBoy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268542511241760578" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(कहानी)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;`अगर आज के बाद मुझे किसी ने फिर से पागल कहा तो मैं कभी तुम्हारे पास नहीं आऊंगा।´ ऐसा कहकर भगवान के चरणों में सिर रखकर रोशन जोर-जोर से रोने लगा।&lt;br /&gt;ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। इससे पहले भी कई बार जब-जब उसे किसी ने `पागल´ कहा, वह मंदिर में बैठकर भगवान से इसी तरह की बातें करता था। रोशन पागल नहीं था, लेकिन कुछ बातें उसे सामान्य लोगों से अलग करती थी। हाथ धोते वक्त कोई चींटी पानी में चली जाती तो वह पहले उसे सूखी जगह पहुंचाता, फिर हाथ धोता। बीच रास्ते बैठे भिखारियों से बातें करना उसे अच्छा लगता था। बहुत भावुक था वो1 अपने हर दोस्त आर जरा-सी भी जान-पहचान वाले व्यक्ति से वो अपनापन दिखाता था। ये बात अलग है कि इस अपनेपन का दूसरे मजाक बनाते थे।&lt;br /&gt;पांच साल पहले उसका बड़ा भाई एक सड़क दुर्घटना में चल बसा था, तब से रोशन बुझा-बुझा रहता थ। आज रोशन अपने कुछ दोस्तों के साथ रेस्तरां गया तो वहां किसी बात पर उसके एक दोस्त ने उसे `पागल´ कह दिया, तब वह कुछ नहीं बोला पर घर आते ही `पागल´ शब्द उसके कानों में गूंजने लगा और हर बार की तरह वो अपने कमरे से उठकर मंदिर में जाकर रोते हुए भगवान से बातें करने लगा। कुछ देर बाद जब मां ने उसे मंदिर में देखा तो उसने उसे वहां से उठाकर कमरे में लेटा था। रोशन को नींद नहीं आ रही थी। लेटे-लेटे वो सोचने लगा कि इससे पहले जब वो अपने एक दोस्त के बड़े भाई की शादी में गया था, तब बारात देखकर अपने भाई की शादी के बारे में सोचकर वो रो पड़ा था। इसी बात पर वहां खड़े एक बुजुर्ग ने उसे `पागल´ कहा था। कुछ देर रोशन लेटा-लेटा सोचता रहा, फिर उठकर डायरी लिखने बैठ गया। डायरी लिखते-लिखते उसकी आंख लग गई और वो टेबल पर ही सो गया। सुबह मां ने जब यह देखा तो उसने रोशन के हाथ से डायरी ली और उसे पलंग पर लेटा दिया। वह डायरी पढ़ने लगी। जैसे-जैसे वह डायरी के पन्ने पलटती जा रही थी, उसकी आंखों से आंसू बहते जा रहे थे। मां के रोने की आवाज सुनकर रोशन की नींद खुली तो उसने झट-से डायरी ले ली। मां की गोद में सिर रखकर वह सुबकने लगा। मां ने आंसू पोंछे, फिर बेटे को चुप करवाकर समझाने लगीं-`रोशन, तुम्हें कितनी बार समझाया है कि हर किसी को अपने दिल का हाल मत बताया करो। यहां दूसरों की भावनाओं को समझने वाले कम और मजाक बनाने वाले लोग ’यादा हैं। तुम्हें भैया की याद आती है तो भी तुम रोया मत करो। इससे उन्हें दुख पहुंचेगा। याद है न, तुम्हारे भैया हमेशा तुम्हें कहते थे कि रोने वाले कमजोर होते हैं और तुम तो बहादुर हो।´&lt;br /&gt;मां की बात सुनते ही रोशन ने आंसू पोंछ लिए। उसने घड़ी में टाइम देखा तो पांच बजने वाले थे। उसने जल्दी से हाथ-मुंह धोए और बस स्टैंड के लिए रिक्शा लिया। आज उसका दोस्त राकेश एक सप्ताह के लिए बाहर जा रहा था। रिक्शे पर बैठे-बैठे उसने जैसे ही अपने गालों पर हाथ फेरा, दाढ़ी के कच्चे बालों की हल्की चुभन से उसे अपने भैया की वो बात याद आ गई, जब उसने पूछा था-`भैया, मैं बड़ा कब होऊंगा और पापा मुझे अकेले बाहर जाने देंगे?´ भैया ने जवाब दिया था-`जब तुम्हारे दाढ़ी-मूंछें आएंगी और शेव बनवाने लगोगे, तब समझना कि तुम बड़े हो गए हो।´&lt;br /&gt;भैया की याद आते ही उसकी आंखें फिर से भीग गई पर उसे मां की बात याद आई तो उसने आंखें पोंछी और खुद से बातें करने लगा-`अब मैं कभी नहीं रोऊंगा, नहीं तो भैया को दुख होगा। अब तो मैं बड़ा हो चुका हूं और बड़े कभी रोते नहीं।´&lt;br /&gt;बस स्टैंड पहुंचकर वो अपने दोस्त राकेश का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद राकेश वहां आ गया। कुछ देर दोनों बतियाते रहे। राकेश बस में सवार हुआ। वापिस जाने के लिए रोशन मुड़ा ही था कि उसे मयंक मिल गया। मयंक स्कूल के समय से रोशन का दोस्त था। उसने रोशन से बस स्टैंड आने का कारण पूछा तो जवाब सुनकर जोर-जोर से हंसते हुए बोला-`अभी कल ही तो हम राकेश से मिले थे और तुम हो कि इतनी सदीü में सुबह-सुबह नींद खराब कर स्पेशल उसे सीऑफ करने आए हो। मुझे अपने पापा को छोड़ने आना था। मम्मी के बीस बार कहने पर जबरदस्ती आया हूं और तुम राकेश को अलविदा कहने...सच में तुम बिलकुल पागल हो।´&lt;br /&gt;मयंक के जाने के बाद रोशन घर की ओर हो लिया। घर पहुंचते ही वो मंदिर में जाकर रोते हुए भगवान से बातें करने लगा। कुछ देर बाद मां ने देखा कि रोशन अचेत पड़ा था। मां ने उसे बहुत हिलाया-डुलाया, पानी डाला पर वह नहीं उठा। डॉक्टर को बुलाया गया। चेक करने के बाद डॉक्टर बोला-`आय एम सॉरी, आपका बेटा नहीं रहा।´&lt;br /&gt;डॉक्टर की बात सुनते ही मां दहाड़ मारकर रो पड़ी। रोती भी क्यों न, उसका बेटा चला गया था। वो उसे गोद में लेकर रोने लगी-`उठ रोशन बेटा। तू पागल नहीं है। जो तुझे पागल कहते हैं, वो खुद पागल हैं। उठ रोशन...उठ बेटा...।´&lt;br /&gt;मां बार-बार कह रही थी, उठ बेटा...उठ बेटा... पर वो कैसे उठता। वो चला गया था हमेशा के लिए। उसके भावुक और विनम्र स्वभाव को किसी ने समझा ही नहीं। अंतिम संस्कार के वक्त रोशन के पिता ने उसकी डायरी चिता में जलानी चाही तो उसके मामा ने डायरी पकड़ ली। घर लौटकर मामा ने डायरी पढ़ी तो वे रो पड़े। बोले-`अगर रोशन पागल था वो नॉर्मल लोगों से कहीं अच्छा था। उसे किसी ने नहीं समझा। उसे यूं ही `पागल´ नाम दे दिया और इसी नाम ने उसकी जान ले ली। लौट आओ रोशन, तुम पागल नहीं हो...लौट आओ...।´&lt;br /&gt;वे कहते रहे-रोशन लौट आओ...पर अब रोशन चला गया था हमेशा-हमेशा के लिए। वो चला गया था अपने भैया के पास, लेकिन वो पागल नहीं था...नहीं था वो पागल।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-8861642981819534532?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/8861642981819534532/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=8861642981819534532' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8861642981819534532'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/8861642981819534532'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/11/blog-post_14.html' title='पागल'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SR2fgAKcD0I/AAAAAAAAAH8/NRVUS7MtDpc/s72-c/SadBoy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-6314157346024930276</id><published>2008-11-10T05:38:00.000-08:00</published><updated>2008-11-10T05:49:38.786-08:00</updated><title type='text'>बहू और बेटी!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SRg7CsIb3rI/AAAAAAAAAH0/SYwDgeUJCLo/s1600-h/friends-kingdom__08.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 224px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SRg7CsIb3rI/AAAAAAAAAH0/SYwDgeUJCLo/s320/friends-kingdom__08.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267024681602113202" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(लघु कथा)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;एक महिला अपनी बहू और बेटी के साथ मंदिर पहुंची। पंडित जी को अपनी व्यथा सुनाई कि बेटी ससुराल में सुखी नहीं है। ससुराल वाले उसे मारते-पीटते हैं, कई-कई दिन भूखा रखते हैं। दहेज भी बहुत दिया, बेटी में भी कोई कमी नहीं, नित्य पूजा-पाठ भी करती है, फिर भी आखिर सुखी क्यों नहीं है? वह आशंकित थी कि कहीं ये किसी के टोने-टोटके का नतीजा तो नहीं? पंडित जी से यज्ञ-अनुष्ठान या कोई अन्य उपाय पूछा कि ससुराल वाले इसे अपनी बेटी समान समझें। पंडित जी ने लड़की का हाथ देखा और कुछ फूल देकर समस्या-समाधान के लिए पूजन सामग्री लाने भेज दिया। फूल लेकर महिला का मन कुछ आश्वस्त हुआ कि पूजा के बाद बेटी को ससुराल में मायके जैसा सुख मिलेगा।&lt;br /&gt;तीनों मंदिर से बाहर निकलीं तो बेटी की चप्पल गायब थी। काफी देर ढूंढने पर भी चप्पल नहीं मिली तो महिला अपनी बहू से बोली-`बेटी, अपनी चप्पल इसे दे दो, कुछ ही देर में घर पहुंच जाएंगे। रास्ते में पत्थर बहुत हैं, कहीं चुभ न जाए।´ बहू ने चुपचाप अपनी चप्पल उतारी और तीनों वहां से चल दीं। &lt;br /&gt;रास्ते में महिला सोच रही थी कि पूजन से बेटी के दुख का कारण जरूर पता चलेगा। बेटी सोच रही थी कि मंदिर से मिले फूल उसके दांपत्य जीवन की चुभन दूर करेंगे, लेकिन बहू के मन में कुछ भी खयाल नहीं थे। वो सिर्फ संभलकर चल रही थी कि कहीं कोई कांटा या पत्थर उसके पांवों में न चुभ जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-6314157346024930276?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/6314157346024930276/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=6314157346024930276' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/6314157346024930276'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/6314157346024930276'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/11/blog-post_10.html' title='बहू और बेटी!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SRg7CsIb3rI/AAAAAAAAAH0/SYwDgeUJCLo/s72-c/friends-kingdom__08.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-5328494033485772362</id><published>2008-11-05T10:30:00.001-08:00</published><updated>2008-11-05T10:31:29.716-08:00</updated><title type='text'>गधी और सहेली!</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SRHmcB6VeKI/AAAAAAAAAHM/B4-4Xx-wxn4/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 273px; height: 310px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SRHmcB6VeKI/AAAAAAAAAHM/B4-4Xx-wxn4/s320/1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5265242808596658338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दीवाली थी तो चौकीदार, सफाईकर्मी जैसे बहुत-से ऐसे लोगों के दर्शन होने भी लाजिमी थे, जो सालभर नजर नहीं आते। सुबह-सुबह कूड़ा इकट्ठा करने वाली गधागाड़ी गली में आई। (उस गाड़ी को जोतने वाली गधी थी, इसलिए उसे गधीगाड़ी भी कह सकते हैं।) मैं कूड़े से भरी बाल्टी लेकर बाहर गया तो पड़ोस की आंटी कूड़ा डालकर गधी पर हाथ फेरकर बोलीं-`हाय सहेली, कैसी है?´ मैंने भी पूछ लिया-`ये गधी आपकी सहेली कैसे?´आंटी जी भी तपाक से बोलीं-`...और क्या। ये बेचारी दिनभर गलियों में जुतती है और हम घर के कामकाज में। हुई न हमारी सहेली।´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि आंटी अपनी बात कहकर मुस्कुरा दीं, लेकिन उनके जवाब में हंसी के साथ दर्द भी छुपा था। उनका चेहरा जैसे कह रहा था कि गृहिणी सुबह से लेकर देर रात तक चाहे कितना भी काम क्यों न कर ले पर वर्किंग वीमन की तुलना में उन्हें कम ही आंका जाता है। ...खैर जाने दीजिए, क्योंकि छोटे-छोटे शहरों की ऐसी बहुत-सी छोटी-छोटी बातें बड़े-बड़े सवालों के जवाब तलाशती नजर आती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-5328494033485772362?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/5328494033485772362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=5328494033485772362' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/5328494033485772362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/5328494033485772362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='गधी और सहेली!'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SRHmcB6VeKI/AAAAAAAAAHM/B4-4Xx-wxn4/s72-c/1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-7349886932335517185</id><published>2008-10-26T09:38:00.000-07:00</published><updated>2008-10-26T09:50:43.535-07:00</updated><title type='text'>धर्मेन्द्र को याद आता है बचपन</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SQSfRmxfo8I/AAAAAAAAAHE/qGpjN6F8NTo/s1600-h/1.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 270px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SQSfRmxfo8I/AAAAAAAAAHE/qGpjN6F8NTo/s320/1.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5261505389490316226" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(पिछले दिनों `हम लोग´ मैग्जीन के `मेरा संडे´ कॉलम के लिए फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र से रूबरू होने का मौका मिला। हम दोनों ही पंजाबी थे, शायद इसलिए या फिर उनके बिंदासपन के कारण उनसे बात करके काफी मजा आया। धर्मेन्द्र संडे के बारे में बताते हुए अपने बचपन की यादों में किस तरह खो गए, जानते हैं खुद उन्हीं की जुबानी...)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संडे है तो देर तक सोया जाए, बाहर खाना खाया जाए, घूमा-फिरा ज़्यादा जाए, ऐसा मेरी आदत में बिलकुल भी शुमार नहीं है इसलिए मुझे इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता कि संडे है या कोई और दिन और जब घूमने का मन हो, बाहर खाने का मन हो, तब मैं संडे का इंतजार नहीं करता। छुट्टी का दिन है तो इस रोज आराम थोड़ा ज़्यादा होता है। मैं सिर्फ संडे ही नहीं, बल्कि हर पल को पूरे दिल से जीता हूं। मेरे पास जब कोई काम नहीं होता तो उन पलों को मैं संडे के आनंद की तरह सेलिब्रेट करता हूं।&lt;br /&gt;सबसे यादगार संडे की बात करूं तो बचपन के दिन ताजा हो जाते हैं। बचपन का संडे वाकई बहुत मजेदार होता था। स्कूल की छुट्टी होती थी तो दोस्तों के साथ मिलकर खूब मस्ती करता था। वो गांव, वो खेत सब याद आता है,स्कूल से छुट्टी का ये दिन फिर खेतों में ही बीतता था। और फिर इस बात पे मां का डांटना कि बिना खाये-पिये घूमते रहते हो। वैसे भी फेस्टिव सीजन है तो इन दिनों बचपन की यादें जैसे मेरी आंखों में ही तैरती रहती हैं। माता-पिता का प्यार और बचपन में मिलकर मनाया जाने वाला हर त्यौहार मैं आज भी बहुत मिस करता हूं। बचपन की दीवाली का जिक्र हो तो सबसे पहले मां की याद आती है। घर के हर सदस्य की दीवाली खुशनुमा होने के पीछे मां की कड़ी मेहनत होती थी। अब तो दीवाली पर बिजली की लडि़यों और मोमबत्तियों से रोशनी होने लगी है। एक दिन पहले ही मां कोरी मिट्टी के दीये पानी में भिगोकर रख देती थीं। पूरे घर को हम भाई-बहन मिलकर दीयों से रोशन करते थे। दीये मुझे हमेशा से ही आत्मविश्वास के प्रतीक लगते हैं। अंधेरे में रोशनी बिखेरते दीयों की खूबसूरती का मैं बचपन से लेकर आज तक कायल हूं।&lt;br /&gt;कुछ लोगों के लिए संडे लेजी-डे से ज़्यादा कुछ नहीं है। इतना आलस कि देखने वाले को भी जम्हाई आने लगे। मुझे कोई जरूरी काम करना हो तो ये सोचकर कभी इंतजार नहीं करता कि आज संडे है, कल करेंगे। दिन चाहे कोई भी हो, हर दिन ईश्वर का है। हम रोज किसी कमजोर शख्स की हिम्मत बनें। सभी को प्यार दें तो सिर्फ संडे ही नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी और भी ज़्यादा खूबसूरत हो जाएगी या ये करें कि संडे को ज़्यादा प्यार दें, ज़्यादा भले काम करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-7349886932335517185?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/7349886932335517185/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=7349886932335517185' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7349886932335517185'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7349886932335517185'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/10/blog-post_26.html' title='धर्मेन्द्र को याद आता है बचपन'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SQSfRmxfo8I/AAAAAAAAAHE/qGpjN6F8NTo/s72-c/1.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-9071642275352706269</id><published>2008-10-22T10:55:00.000-07:00</published><updated>2008-10-22T12:05:53.582-07:00</updated><title type='text'>मन की आंखें, उजला संसार</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SP95hGkMvmI/AAAAAAAAAG8/ptnDSfeo6wA/s1600-h/Ramleela+Karte+Bacce.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SP95hGkMvmI/AAAAAAAAAG8/ptnDSfeo6wA/s320/Ramleela+Karte+Bacce.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5260056499397115490" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;जरा-सी देर के लिए बिजली चली जाए तो हम बेचैन हो उठते हैं। किसी को अंधेरे से डर लगता है तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अंधेरे को अशुभ मानते हैं। बात दीपावली की हो तो इस उत्सव को मनाने के लिए पहली जरूरी चीज नजर आती है रोशनी। दीपावली में कुछ ही दिन बाकी हैं। बिजली की लडि़यों, दीयों, मोमबत्तियों आदि से इस दिन को रोशन करने की तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं। आपने कभी बिना रोशनी दीपावली की कल्पना की है? जरा सोचिए, इस दिन चारों ओर अंधेरा हो, कुछ भी दिखाई न दे। ...उफ, ऐसी कल्पना भी कितनी भयानक है, लेकिन बहुत-से बच्चे ऐसे भी हैं, जिनकी जिंदगी में अंधेरा पसरा है। हम लोग भले ही इन नेत्रहीन बच्चों से हमदर्दी का भाव रखें, लेकिन इन्हें ईश्वर से कोई शिकायत नहीं। ये बच्चे कहते हैं-`हमारे पास ऐसे बहुत-से कारण हैं, जिनसे हमारी दीपावली दिल से रोशन है। हम महसूस करते हैं दीयों की महक, फुलझडि़यों की आवाज और अपनों का प्यार।´आइए, आपको ले चलते हैं इन बच्चों की खास दुनिया में। इनका जहां आंखों से न सही, लेकिन दिल से इतना रोशन है कि हर तरफ सिर्फ मुस्कुराते चेहरे ही नजर आते हैं...&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;दीपावली यानी दीयों की कतार। चहुं ओर रोशनी का साम्राज्य। दीपावली एक ऐसा त्यौहार है, जब हर गली, हर घर, हर कोना रोशनी से जगमगाता नजर आता है। दीपावली त्यौहार है रोशनी का, लेकिन उनका क्या जिन्होंने कभी रोशनी नहीं देखी? नेत्रहीन बच्चों की दीपावली से जुड़ी भावनाएं साझा करने जब श्री जगदम्बा अंधविद्यालय (श्रीगंगानगर) पहुंचे तो महसूस किया कि इनकी आंखों में रोशनी नहीं, लेकिन सपने बहुत हैं। साथ ही उन सपनों को पूरा करने का ज़ज्बा भी भरपूर है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हॉल में प्रवेश करते ही हारमोनियम और ढोलक का मधुर संगीत सुनाई देने लगा। यहां रामलीला की रिहर्सल हो रही थी। एक वक्त ऐसा भी था जब नेत्रहीन बच्चे रामलीला में सिर्फ संवाद बोलते थे। पिछले कुछ सालों से इन बच्चों ने कड़ी मेहनत कर न केवल रामलीला में अभिनय करना शुरू किया, बल्कि हारमोनियम व ढोलक जैसे वाद्ययंत्र बजाना सीखकर रामलीला को और अधिक प्रभावी भी बनाया।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नेत्रहीन बच्चों के प्रति दयादृष्टि रखने का भ्रम इन बच्चों से मिले जवाबों से जैसे टूटता चला गया। `रोशनी के बिना कैसी है आपकी दीपावली?´ 14 वर्षीय विजय ने इस पहले सवाल का जो जवाब दिया, उसे सुनकर इन बच्चों के प्रति किसी की भी सोच बदल जाए। मूलत: पिलानी निवासी विजय का पूरा नाम विजयकुमार ओला है। विजय का जवाब था-`हमारी दीपावली दिल से रोशन है। सभी लोग आंखें बंद कर भगवान के दर्शन करते हैं। ऐसा है तो फिर हम भगवान को हर पल निहार रहे हैं। एक प्रसंग सुनाता हूं। न्यूयॉर्क की एक प्रार्थना सभा में किसी ने स्वामी विवेकानंद से पूछा कि प्रकाश और अंधकार कहां हैं? स्वामीजी ने उत्तर दिया-आप बाहर जो भी देख रहे हैं, वो सारा अंधकार है। प्रकाश देखना चाहते हैं तो अपने भीतर देखो।´विजय का इतना गंभीर जवाब सुनकर जैसे कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं हुई, तभी विजय जोर से हंसा तो माहौल थोड़ा दोस्ताना हुआ। विजय ने पिछले साल रामलीला में हारमोनियम बजाया था, लेकिन मेहनत की तो इस साल उसे महामंत्री का किरदार मिला। विजय का भाई बिट्स का स्टूडेंट है। विजय को दीपावली का बेसब्री से इंतजार है। विजय कहता है-`सरसों के तेल से जलते दीयों की महक मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझे पटाखे छोड़ने का ज्यादा शौक नहीं है, लेकिन भाई के साथ शगुन के तौर पर कुछ पटाखे तो छोड़ता ही हूं।´&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;विजय के साथ बातचीत जारी थी कि तभी एक अट्टहास गूंजा-`हा...हा...हा...हे राम, तू मुझे क्या मारेगा।´ ये आवाज थी रामलीला में रावण का किरदार निभा रहे रामसिंह की। सूरतगढ़ निवासी रामसिंह की उम्र है सिर्फ 13 साल, लेकिन उसकी आवाज में इतना दम है कि बिना माइक के एक अट्टहास से पूरा हॉल गूंज उठा। रामसिंह का कहना है-`मुझे दीपावली से ज्यादा रक्षाबंधन का त्यौहार पसंद है। अपनी बहन से बहुत प्यार करता हूं। मेरी छोटी बहन को फुलझडि़यां बहुत अच्छी लगती हैं, इसीलिए दीपावली पर उसके लिए खूब सारी फुलझडि़यां खरीदूंगा। वो बताती है कि जलती फुलझडि़यों से निकलते सितारे बहुत खूबसूरत लगते हैं। मैंने कभी इन्हें देखा नहीं, लेकिन अपनी बहन की बातों से महसूस जरूर किया है।´`नाम रामसिंह, लेकिन किरदार रावण का क्यों?´ पूछने पर रामसिंह बोला-`सभी कहते हैं कि मैं रावण की तरह अट्टहास बहुत अच्छा करता हूं। वैसे ही ओमप्रकाश भगवान श्रीराम के संवाद बढ़िया बोलता है।´ रामसिंह की बात सुनकर पास में खड़े ओमप्रकाश ने मजाक किया-`देखा आपने, रावण पहली बार भगवान श्रीराम की तारीफ कर रहा है।´ (दोनों हंसने लगते हैं।) &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ओमप्रकाश मेघवाल से जब दीपावली के मायने पूछे तो जवाब मिला-`प्लीज, हमारी दीपावली में दर्द न ढूँढिये। हम इस दिन खूब एंजॉय करते हैं। मेरा घर रावतसर में हैं। दीपावली की छुटि्टयों में वहां जाऊंगा तो अपने दोस्तों की बहुत याद आएगी। खास तौर पर सुरेन्द्र की। सुरेन्द्र मेरे छोटे भाई जैसा है और रामलीला में भी छोटे भाई लक्ष्मण का रोल कर रहा है।´ओमप्रकाश ने सुरेन्द्र से मिलवाया। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;14 साल के सुरेन्द्र स्वामी ने पिछली बार रामलीला में सेनापति का किरदार निभाया था, लेकिन इस बार लक्ष्मण का रोल मिलने से वो बहुत खुश है। मूलत: सूरतगढ़ निवासी सुरेन्द्र को दीपावली पर होने वाला पटाखों का शोर बिलकुल पसंद नहीं है। सुरेन्द्र का कहना है- `दीपावली पर बमों की आवाज काफी डराने वाली होती है। दीपावली मुझे सिर्फ एक कारण से ही अच्छी लगती है। इस दिन नये-नये पकवान बनते हैं तो पूरे घर में खुशबू फैल जाती है। अगले दिन रामनवमी पर सभी रिश्तेदारों से मुलाकात होती है दिल खुश हो जाता है।´सुरेन्द्र से बातचीत जारी थी कि रामसिंह ने कुलवंत सिंह को आवाज दी। रामसिंह ने कुलवंत का परिचय कुछ यूं दिया-`आप भगवान श्रीराम के भाई से तो मिल लिए। अब मेरे यानी रावण के भाई से भी मिलिए।´&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;`रावण के भाई का किरदार निभाकर कैसा लग रहा है?´ गांव 9एमएल के निवासी कुलवंत का जवाब था-`शुक्र है मुझे कुंभकरण नहीं बनना पड़ा, वरना सोने के अलावा और कुछ नहीं कर पाता। मैं पिछली बार की तरह इस बार भी मेघनाद का रोल कर रहा हूँ। मेरा अट्टहास थोड़ा कमजोर है, वरना मैं भी रावण का रोल करता। कहते हैं कि अपने हाथों की लकीरों को क्या देखते हो, नसीब तो उनके भी होते हैं, जिनके हाथ नहीं होते। इसी तरह हमारे लिए भी दीपावली का अर्थ है। सभी लोग पूजा की शुरुआत ज्योति जगाकर करते हैं। हमारी जिंदगी में ज्योति नहीं तो क्या हुआ, पूजा तो हम भी पूरे श्रद्धा भाव से करते हैं।´&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कुलवंत सिंह की बात जारी थी कि उसे रिहर्सल के लिए बुलावा आ गया। थोड़ी देर में आने का कहकर वो चला गया, लेकिन इन बच्चों की बातें सुनकर भावनाओं का ’वार कुछ ऐसा उठा कि आंसुओं की धार भी जैसे आंखों तक आकर रुक गई। इन बच्चों के मुस्कुराते चेहरे देख यूं लगा जैसे ये सभी पूरे सकारात्मक भाव से जीने का संदेश दे रहे हों। यहां बिताए कुछ घंटों से जैसे सीख मिली कि किस तरह अपनी कमजोरी पर जीत पाई जाती है। उन बच्चों के खयाल ताजा थे कि तभी कुछ बच्चे वहां आए और बोले-`चलिए, आपको फाइनल रिहर्सल दिखाते हैं।´जिसने भी रामलीला देखी, इन बच्चों की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। वाकई रामलीला में इन बच्चों की मेहनत की झलक साफ देखने को मिली। रिहर्सल खत्म हुई तो सभी बच्चों ने एक स्वर में दीपावली की शुभकामनाएं कुछ यूं दी-&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली आई रे...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;खुशी-खुशी सब हंसते आओ, आज दीवाली आई रे...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;हाथ जोड़कर पूजा कर लो, खूब मिठाई खाओ रे...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;आज पटाखे खूब छुड़ाओ, आज दीवाली आई रे...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-9071642275352706269?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/9071642275352706269/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=9071642275352706269' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/9071642275352706269'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/9071642275352706269'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/10/blog-post_22.html' title='मन की आंखें, उजला संसार'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SP95hGkMvmI/AAAAAAAAAG8/ptnDSfeo6wA/s72-c/Ramleela+Karte+Bacce.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-78314094163723739</id><published>2008-10-17T09:24:00.000-07:00</published><updated>2008-10-17T09:39:32.897-07:00</updated><title type='text'>बंदा ये बिंदास है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SPi-u7ZABGI/AAAAAAAAAGY/K8rZMQcaFxY/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5258162278380864610" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SPi-u7ZABGI/AAAAAAAAAGY/K8rZMQcaFxY/s320/1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आज ऑफिस आ रहा था कि एक बाइक मेरे पास आकर रुकी। बाइक पर सवार लड़के ने हेल्मेट उतारकर `हैलो´ बोला तो उसे फौरन पहचान गया। थोड़ी देर बातचीत के बाद मैं रवाना हुआ तो उससे पहली मुलाकात ताजा हो उठी। पिछली फस्र्ट अप्रेल की सुबह नेट ओपन किया तो अपने ऑरकुट अकाउंट में मैसेज पाया-वुड यू लाइक टु एड मी इन योर फ्रेंडशिप लिस्ट? मैसेंजर का प्रोफाइल चैक किया तो कुछ स्मार्ट-सी फोटो के साथ पैशन, फेवरेट मूवी, बुक, टीवी शो आदि हर कॉलम में मॉडलिंग से जुड़ी बातें ही पाईं। नकुल नाम के इस शख्स से शुरू में हाय-हैलो से ’यादा चैटिंग नहीं होती थी पर कुछ दिन बाद जब नकुल ने मोबाइल नंबर दिया तो डेली एसएमएस होने लगे। चार जून को नकुल का बर्थडे था। विश करने के लिए फोन लगाया तो उसने अटेंड नहीं किया और रिप्लाई मैसेज किया-सॉरी, आय एम डेफ एंड डंब। मुझे लगा, नकुल सिर्फ एसएमएस फ्रेंड ही रहना चाहता है, इसलिए झूठ बोल रहा है। कुछ दिन तक मोबाइल के अलावा लैंडलाइन से भी नकुल का नंबर ट्राई करता रहा पर उसने कभी फोन अटेंड नहीं किया। हैरानी की बात तो ये थी कि पांच महीने तक एसएमएस फ्रेंड रहने के बावजूद हम एक-दूसरे के बारे में ’यादा कुछ नहीं जानते थे। जब मैंने नकुल को बताया कि मैं मीडिया से हूं तो उसने मिलने की इच्छा जाहिर की। मैं भी यही चाहता था। बिड़ला मंदिर (जयपुर) मिलना तय हुआ। लगभग साढ़े सात बजे जब नकुल आया तो मुझे देखते ही पहचान गया और मोबाइल में एसएमएस टाइप किया-`हाय, आय एम नकुल।´ मैंने मंदिर के अंदर चलने को कहा तो उसने मना कर दिया, लेकिन बार-बार कहने पर वो राजी हो गया। मंदिर से बाहर निकले तो सीçढ़यों पर बैठ गए। उसने बताया कि उसके पापा और सिस्टर दोनों डॉक्टर हैं पर वह मॉडल बनना चाहता है। कभी-कभी उसकी बात समझने में मुश्किल होती तो वो झट-से मैसेज टाइप करता-`तुम मुझे समझ रहे हो?´ मैं हां कहता तो मुस्कुराकर अपने सिर पर हल्की-सी चपत लगाता। मैं मैसेज टाइप करने लगा-`नाइस मीटिंग यू, मैं भगवान से आपके लिए प्रार्थना करूंगा...´ मैसेज पूरा होता, इससे पहले उसने मेरा हाथ रोक दिया और थैंक्स कहकर उठ गया। चेहरे से लगा कि मेरी दुआ को उसने दया समझा और उसे अच्छा नहीं लगा। मैं कुछ कह पाता, इससे पहले ही मेरा फ्रेंड मुझे रिसीव करने पहुंच गया। हम बाहर निकले और `फिर मिलेंगे´ कहकर चल दिए।नकुल से मिलने के बाद रातभर सोचता रहा उन लोगों के बारे में, जो किसी न किसी रूप में नि:शक्त हैं। इनमें नकुल जैसे बहुत-से लोग ऐसे भी हैं, जो जी रहे हैं पूरी जिंदादिली से। एक हम हैं जो थोड़ा-सा दुख-दर्द आने पर बड़ी-बड़ी शिकायतें करने लगते हैं भगवान से...। सचमुच मूक-बधिर होने के बावजूद नकुल बहुत बिंदास बंदा है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-78314094163723739?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/78314094163723739/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=78314094163723739' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/78314094163723739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/78314094163723739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/10/blog-post_17.html' title='बंदा ये बिंदास है...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SPi-u7ZABGI/AAAAAAAAAGY/K8rZMQcaFxY/s72-c/1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-138590598394285995</id><published>2008-10-08T06:46:00.000-07:00</published><updated>2008-10-08T07:02:27.258-07:00</updated><title type='text'>यकीन मानिए, ये लड़का है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SOy8SLCQQUI/AAAAAAAAAGQ/bUfg1_jOr_0/s1600-h/4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5254781885620437314" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SOy8SLCQQUI/AAAAAAAAAGQ/bUfg1_jOr_0/s320/4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;वो है तो लड़का, लेकिन जब लड़की बनकर स्टेज पर आता है तो तमाम प्रतिद्वंद्वी लड़कियों को भी पीछे छोड़ देता है। जब हम उसके घर पहुंचे तो कमरे में हर तरफ मोमेन्टो सजे हुए थे, दीवारें मैडल्स और सटिüफिकेट्स से अटी हुईं थीं। लगभग पांच मिनट बाद गगनदीप अरोरा कमरे में आया तो एक बार आंखों को उसके लड़की होने का धोखा हुआ। तभी उसने कुछ एलबम सामने रख दिए। एलबम में एक से बढ़कर एक फोटो थे। ट्रेडिशनल लुक से लेकर वेस्टनü लुक तक में गगन एकदम परफेक्ट दिख रहा था। इंटरव्यू शुरू करते इससे पहले गगन की मम्मी चाय लेकर आ गईं। चाय रखकर उन्होंने अलमारी से कुछ ड्रेसेज और ’वैलरी निकाली और बताया कि ये गगन ने खुद डिजाइन की हैं। गगन की फाइल में न्यूज पेपर्स की बहुत-सी कटिंग्स देखी। सिंगर गुरदास मान, शान, कॉमेडियन जसपाल भट्टी, ख्याली सहारण, एक्ट्रेस रवीना टंडन, उमिüला मातोंडकर, एक्टर आर्यन वैद्य, प्रियांशु जैसी बहुत-सी सेलिब्रिटीज के साथ वो शो कर चुका है। मिस फोटोजेनिक, बेस्ट कैटवॉक, बेस्ट मेकअप, बेस्ट एक्ट्रेस जैसे कई अवॉर्ड उसके हिस्से में आ चुके हैं। आखिर एक लड़के का एक लड़की के रूप में कैसा है सफर। जानते हैं खुद गगन से...&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भूल गया मैं लड़की हूं...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मुझे अच्छी तरह याद है, तब मेरी उम्र करीब सात-आठ साल रही होगी। स्कूल के वार्षिकोत्सव की तैयारियां लगभग पूरी थी कि क्लास की गल्र्स ने टीचर से कहा कि वे किसी कल्चरल एçक्टविटीज में हिस्सा नहीं लेंगी। कारण हर बार की तरह इस बार भी वही था। स्कूल के लड़के उन पर फçब्तयां कसते थे, मजाक उड़ाते थे और हद तो तब हो जाती, जब छोटी लड़कियों से भी छेड़छाड़ होती। मुझे कल्चरल प्रोग्राम्स का बहुत शौक था, इसलिए मैं चाहता था कि फंक्शन जरूर हो और लड़कियां भी इसमें पाटिüसिपेट जरूर करें। किसी तरह अपनी क्लास की आठ लड़कियों को मैंने प्रोग्राम के लिए राजी किया। लड़कियां कम थीं, इसलिए मैंने भी उनके साथ एक डांस में लड़की बनने का फैसला किया। डांस के बाद सभी लड़कियों के साथ स्टेज पर प्राइज लेने जा रहा था कि लड़कों ने उल्टी-सीधी हरकतें शुरू कर दीं। मैंने देखा, हमारे ग्रुप की लड़की का हाथ एक लड़के ने पकड़ रखा था। पता नहीं उस समय मुझे क्या हुआ और मैंने जाकर उस लड़के की जबरदस्त धुनाई कर दी। गुस्से में मैं यह भी भूल गया कि मैं लड़की के गेटअप में हूं। टीचर ने हमें छुड़वाया और वे मुझे एक तरफ ले गईं। अगले कई दिन तक वो लड़का स्कूल नहीं आया। लड़कियां बहुत खुश थीं, क्योंकि उनसे बेहूदा हरकतें करने वाले लड़के अब उनसे डरने लगे थे।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मां से हिम्मत, पिता से आशीर्वाद...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मैं डर रहा था कि यह बात घर पर मालूम चली तो बहुत पिटाई होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डांस में मुझे फस्र्ट प्राइज मिला। प्रिंसीपल ने मेरी मम्मी के सामने मेरी तारीफ की तो उन्हें बहुत खुशी हुई। पापा ने भी आशीर्वाद दिया। हमारी फैमिली छोटे शहर में रहती आई है। बचपन में कई बार देखा कि गली की कोई बहू अपने ससुरालियों से पिट रही होती तो मम्मी मोहल्ले वालों की तरह तमाशबीन नहीं बनती थीं। बहुत बार उन्होंने ऐसे लोगों को सबक भी सिखाया। जब पुरुष खड़े तमाशा देखते रहते थे, तब मम्मी की हिम्मत देख मेरी हिम्मत भी बढ़ी।लोगों का काम है कहना...लगभग 15 साल से मैं लड़की बनकर परफॉमेZस दे रहा हूं। जहां लोगों को मालूम होता है कि मैं लड़का हूं, वहां तरह-तरह की बातें की जाती हैं, सोचा जाता है कि मैं होमो (समलैंगिक) हूं, लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं। मैं जानता हूं कि मैं जो कर रहा हूं, उसमें कुछ भी गलत नहीं। मुझमें टैलेंट है कि मैं ड्रेस डिजाइनिंग, ’वैलरी डिजाइनिंग, डांस, मॉडलिंग सब कर सकता हूं, फिर लड़की बनकर ये सब करना हर किसी के बस की बात नहीं। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;लड़की बनकर जुटाई चैरिटी...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;चैरिटी शो की शुरुआत मैंने कब की, मुझे खुद याद नहीं। गुजरात भूकंप, सुनामी जैसी आपदाओं के समय मैंने ग्रुप के साथ शो कर सहायता राशि इकट्ठी कर सरकारी राहत कोष में जमा करवाई है। राजस्थान ही नहीं, पंजाब, हरियाणा व यूपी में भी चैरिटी शो कर चुका हूं। कई बार हम लड़के मिलकर सहायता राशि इकट्ठी करने जाते तो कुछ खास नहीं जुटा पाते, वहीं जब भी लड़की बनकर मैंने राखी सावंत जैसे लटके-झटके वाले आइटम डांस किए तो सहायता राशि उम्मीद से कहीं गुना बढ़ जाती थी।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बेस्ट फोटोजेनिक अवॉर्ड...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मुझे कभी मेकअपमैन की जरूरत महसूस नहीं हुई। अभी दिसम्बर में चंडीगढ़ में मैंने 80 लड़कियों में से टॉप-10 में आकर मिस फोटोजेनिक और बेस्ट मेकअप का अवॉर्ड जीता। रोहतक में बेस्ट आइज, बेस्ट लुक अवॉर्ड मुझे मिल चुके हैं। दरअसल, किसी दूसरे से मेकअप करवाकर मैं सेटिस्फाई नहीं हो पाता। कभी-कभी तो दूसरी मॉडल्स मेकअपमैन से मेकअप करवाने के बाद मुझसे ही पूछती हैं-टि्रपल कलर लिपçस्टक कैसे लगाई, डॉलफिन टैटू कैसे बनाया...। मुझे पालüर जाना पसंद नहीं है। यहां तक कि अपनी थ्रेडिंग तक भी मैं खुद ही बना लेता हूं।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नहीं बनना ऐसा मर्द...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बहुत बार लोगों को मालूम नहीं होता कि मैं लड़का हूं। ऐसे में मैंने लड़कियों को होने वाली परेशानियां महसूस की हैं। मैं लड़की तो नहीं हूं पर इतना कह सकता हूं कि लड़की होना अपने आप में चुनौती भरा है। हर वक्त कोई न कोई नजर आपको घूरती रहती है। चौबिसों घंटे आप इनसिक्योर फील करते हैं। लड़कियों में चाहे जितनी भी प्रतिभा हो, उन्हें काçस्टंग काउच जैसी समस्याओं से रूबरू होना ही पड़ता है। बहुत दुख होता है कि खुद को मर्द कहलाने के लिए वे भद्दे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, लड़कियों पर फçब्तयां कसी जाती हैं और उन्हें छूने का मौका ढूंढा जाता है। अगर मर्द होने के लिए यही गुण होने चाहिएं तो मुझे ऐसा मर्द नहीं बनना। महिलाएं पुरुषों से कहीं बेहतर हैं। उनमें इमोशन हैं, वे सेंसेटिव हैं और खुद से पहले दूसरों के बारे में सोचती हैं। पुरुषों को भी चाहिए कि ऐसे विनम्र वे भी बनें।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;और उसे प्यार हो गया...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;डांस मेरा पैशन है और मॉडलिंग प्रोफेशन। पिछले दो साल से मैं चंडीगढ़ में रह रहा हूं। कई म्यूजिक एलबम्स में मॉडलिंग कर चुका हूं। कई धामिüक एलबम्स में भी काम किया है। लिटिल चैम्प्स फेम पावनी पांडे को भी डांस सिखा चुका हूं और टेली फिल्मों के लिए कोरियोग्राफी भी की है। शो के लिए अब तक बहुत-से शहरों में गया। इस दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए। एक बार शो के बाद पैकिंग की तैयारी में था कि एक लड़का हाथ में फूल और बॉक्स लेकर आया और बोला-`आय लव यू, शादी करूंगा तो सिर्फ तुमसे।´ मैं कुछ कहता, इससे पहले सिक्योरिटी ने उस बाहर निकाल दिया। उस वक्त मेरी जो हालत हुई, मैं बता नहीं सकता। शो के दौरान फें्रडशिप के प्रपोजल तो बहुत मिलते हैं, लेकिन ऐसी दीवानगी मैंने पहली बार देखी थी। अब भी बहुत-से कॉल्स और लेटर्स आते हैं पर क्या करूं, मुझे कुछ समझ नहीं आता।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बेगम की क्या मजाल...&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;बहुत दुख होता है जब इतनी खूबियां होने के बाद भी आगे बढ़ने में रुकावटें आती हैं। पिछले काफी दिनों से मीडिया की नजरें पाकिस्तानी कलाकार बेगम नवाजिश अली पर टिकी हैं। बहुत बार मुझे सिर्फ इस कारण शो नहीं मिले, क्योंकि ऑगेüनाइजर जानते थे कि मैं लड़का हूं। विदेशी प्रतिभा को सभी सर-आंखों पर बिठाने को तैयार हैं, फिर ऐसा क्यों? बेगम की क्या मजाल कि वो डांस, मॉडलिंग, एçक्टंग, डिजायनिंग सब-कुछ एकसाथ कर सकें। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मौका मिले तो मैं उनसे कई गुना बेहतर परफॉमेZस दे सकता हूं। आखिर कब तक मैं घर की मुगीü दाल बराबर बना रहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;em&gt;(30 जनवरी-2008 को जब डेली न्यूज की बुधवारीय पत्रिका `खुशबू´ में मेरी ये स्टोरी प्रकाशित हुई तो दिनभर फोन की घंटी बजती रही। हर कोई गगन से मिलना चाहता था। जब मैंने गगन का इंटरव्यू किया, तब गगन से ’यादा उसकी मम्मी उत्साहित नजर आ रही थीं। कुछ टीवी चैनल्स वालों के भी फोन आए, लेकिन गगन को इंटरव्यू छपने की कोई खुशी नहीं थी। बुधवार को इंटरव्यू प्रकाशित हुआ और उससे ठीक एक रात पहले (29 जनवरी) को एक सड़क दुर्घटना में गगन की मम्मी का देहांत हो गया। ताउम्र दुख रहेगा कि वो ये इंटरव्यू नहीं देख सकीं।)&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-138590598394285995?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/138590598394285995/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=138590598394285995' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/138590598394285995'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/138590598394285995'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/10/blog-post_08.html' title='यकीन मानिए, ये लड़का है...'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SOy8SLCQQUI/AAAAAAAAAGQ/bUfg1_jOr_0/s72-c/4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-3177714216207002435</id><published>2008-10-01T06:06:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T02:43:43.396-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ताने'/><title type='text'>दर्द से दहशत तक</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SOZukiW_DBI/AAAAAAAAAFg/pQJKTF4JwEo/s1600-h/Untitled-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5253007589351820306" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SOZukiW_DBI/AAAAAAAAAFg/pQJKTF4JwEo/s320/Untitled-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गुरुवार शाम एक मित्र का ई-मेल मिला। मेल में भेजे फोटोग्राफ को देख काफी हैरानी हुई। नवरात्र की बधाई के साथ `ये है मां की शक्ति´ लिखे मैसेज के साथ मिले इस मेल में अपने बच्चे को बचाने के लिए एक कुत्ते से गिलहरी की लड़ाई दिखाई गई है। सचमुच ये मां की शक्ति ही है कि बहुत भोले स्वभाव की मानी जाने वाली गिलहरी अपने बच्चे की जान बचाने के लिए एक खूंखार कुत्ते से जा भिड़ी और अपने बच्चे को सुरक्षित बचा भी लाई।&lt;br /&gt;पिछले मंगलवार तड़के पुलिस ने एक ऐसी महिला को धर दबोचा, जो घरों और वाहनों में आग लगाकर दहशत फैला रही थी। उस घटना को भी ’यादा दिन नहीं हुए, जब जयपुर की ही एक महिला बलि देने के लिए अपनी ही रिश्तेदार के बच्चे का अपहरण करने के जुर्म में पकड़ी गई थी। इन दोनों ही घटनाओं में एक बात समान थी। वो यह कि मां बनने की चाह में दोनों महिलाएं जुनून की इस हद तक उतर गईं कि वे अपराध के गर्त में जा पहंुचीं।&lt;br /&gt;`मां की शक्ति´ नामक उस मेल और इन दोनों घटनाओं से मन में कई सवाल उठे। शायद एक औरत के लिए मां बनना बहुत मायने रखता है। मातृत्व से जहां कमजोर शरीर में भी शक्ति आ गई, वहीं मां बनने की चाह में चूल्हा-चौका करने वाली इन साधारण-सी महिलाओं में अपहरण करने और 50 की उम्र में सुबह चार बजे दीवारें फांदने की हिम्मत पैदा कर दी। इन महिलाओं का राज खुलने के बाद सभी ने चैन की सांस ली। जिनका बच्चा मिला, वो मां-बाप अब तक मंदिरों की चौखट चूम रहे हैं। सभी पुलिस और भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे हैं। बच्चे की चाह में तांत्रिकों के जाल में फंसी औरतें अपराध की राह चुन रही हैं। इनमें से कुछ पकड़ी जा चुकी हैं तो कुछ आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी बांध अपनी गोद हरी होने का इंतजार कर रही हैं। ऐसी महिलाओं के लिए हर किसी की आंखों में नफरत है। बच्चे की चाह में इन महिलाओं ने जो राह चुनी, निस्संदेह वो अपराध है, लेकिन परदे के पीछे झांकने की एक कोशिश तो होनी ही चाहिए। क्या सिर्फ बेऔलाद होना ही इन्हें जुनून की हद तक ले गया?&lt;br /&gt;इनमें से एक महिला की परिचित मीनू से मुलाकात हुई तो उनकी बातें आंखें नम कर देने वाली थीं। मीनू बताती हैं, मेरे बच्चे जब पेंसिल से घर की दीवारें खराब करते हैं तो कई बार गुस्से में उनकी पिटाई भी कर देती हूं, लेकिन जब वो हमारे घर आती थी तो उन खराब दीवारों पर हाथ फेरकर खुश होती रहती थी। उसका चेहरा बयां करता था कि काश, उसके घर भी दीवारें खराब करने वाला कोई हो। बेऔलाद होना ही बहुत बड़ा दुख है, लेकिन जब खुद के सगे-संबंधी ही `बांझ´ और `मनहूस´ कहकर किसी शुभ काम में उन्हें शामिल नहीं करें। अपने बच्चों पर उनकी छाया तक न पड़ने दें तो ऐसा व्यवहार उन्हें महसूस करवाता है कि जैसे मां ना बन पाना कोई पाप हो। इसी पाप से मुक्ति के लिए वो जुनून की हद तक पहुंच जाती हैं। एक दर्द है, जो उन्हें दहशत के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर देता है। इस दर्द को समझना जरूरी है। संतान सुख के लिए अपनाया गया उनका रास्ता गलत है, लेकिन उपेक्षित व्यवहार कर उन्हें निसंतान होने पर अपराधबोध का अहसास करवाने वाले भी तो इस बड़े पाप के भागी ही हैं।&lt;br /&gt;नवरात्र हैं तो सिर्फ देवी का पूजन करना ही काफी नहीं है। हर स्त्री के सम्मान का संकल्प लें, चाहे वे मां हो या नहीं भी। साथ ही बेटियों का अर्चन भी सिर्फ इन्हीं दिनों नहीं, बल्कि हर पल हो तो आदिशक्ति अवश्य प्रसन्न होंगी।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-3177714216207002435?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/3177714216207002435/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=3177714216207002435' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3177714216207002435'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3177714216207002435'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='दर्द से दहशत तक'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SOZukiW_DBI/AAAAAAAAAFg/pQJKTF4JwEo/s72-c/Untitled-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-7837754274714774211</id><published>2008-09-18T13:05:00.000-07:00</published><updated>2008-09-18T13:20:03.946-07:00</updated><title type='text'>दोस्ती का `आईफ्लू´</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNK3Hk3M_DI/AAAAAAAAAE0/h39Ogse4diE/s1600-h/20.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5247457856622230578" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNK3Hk3M_DI/AAAAAAAAAE0/h39Ogse4diE/s320/20.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;दोस्ती में आई लव यू हो तो बात हजम हो जाए, लेकिन दोस्ती में आईफ्लू...ये बात तो हाजमोला भी हजम ना कर सके! दरअसल ये अनोखा करिश्मा मेरे साथ हो गया। दो दिनों में कुछ ऐसा हुआ कि मैं किसी से नजर मिलाने के काबिल नहीं रहा। अरे भई...गलत मत &lt;span class=""&gt;समझिये। &lt;/span&gt;ऐसा कोई काला काम मैंने नहीं किया कि नजरों में गिर जाऊं। हुआ यूं कि एक दोस्त मंगलवार को मेरे पास जयपुर आया। करोड़पति पिता के इकलौते बेटे (वैसे अमीरी-गरीबी हमारी दोस्ती में कभी आड़े नहीं आई) ने जयपुर भ्रमण के बाद शॉपिंग का मन बनाया तो मैं भी उसके साथ हो लिया। जयपुरी जूतियां, कपड़े लेने के बाद जनाब को एक चश्मा लेने की सूझी। कुछ दुकानों पर उसे चश्मे दिखाए, लेकिन साहब किसी अच्छे ब्रांड का चश्मा खरीदना चाहते थे। बापू बाजार में अपने किसी परिचित से मिलने गए तो उन्हें अपनी इच्छा बताई। बस फिर क्या था। उन्होंने गाड़ी निकाली और हम पहुंच गए चश्मों के शोरूम में। दर्जनभर चश्मे देखने के बाद मित्र महोदय को बत्तीस सौ रुपए का एक चश्मा पसंद आया। वैसे तो वो चश्मा मुझे भी ठीक लगा, लेकिन दिल इतना भी उस पर नहीं आया कि बत्तीस सौ रुपए खर्च किए जाएं। दोस्त को समझाया कि एक चश्मे के लिए इतने रुपए खर्च क्यों करते हो? जनाब बोले, पापा ने शॉपिंग के लिए पैसे दिए हैं, कहां खर्च करूं। बड़ी विचित्र स्थिति थी- रुपए हैं, लेकिन खर्च कहां किए जाएं! &lt;em&gt;(दुखद है, लेकिन सच है कि किसी के पास जरूरी सामान खरीदने के लिए कुछ रुपए नहीं हैं तो किसी के पास इतने रुपए हैं कि कहां खर्च किए जाएं, समझ नहीं आता। दो लाइनें याद आ गई...घर जाकर बहुत रोये मां-बाप अकेले में, सस्ता नहीं था कोई खिलौना उस मेले में।) &lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोस्त का जवाब सुनकर मैं बोला-नहीं खर्च हो रहे तो सेविंग कर लो। जवाब मिला-अकाउंट में खूब रुपए हैं। ...खैर उन्होंने वो चश्मा खरीद लिया। जाने लगे तो एक चश्मा हमारी आंखों पर भी चढ़ा दिया। मैंने बोला कि मैं कभी चश्मा पहनता ही नहीं। दोस्त बोला-अगले महीने तेरा बर्थडे है, बस उसी का तोहफा है। दोस्त से तोहफा लेने में कोई हर्ज नहीं पर इतना महंगा...! मैंने बोला-मैं चश्मा पहनता ही नहीं तो फिर मेरे किस काम का। बच्चे की तरह जिद करके उसने वो चश्मा भी पैक करवा लिया और बोला-देखना एक हफ्ते में तू इसे जरूर पहनेगा और सभी को खूब पसंद भी आएगा। चश्मा लिया और घर आ गए। अगली सुबह दोस्त रवाना हो गया। मैंने चश्मा लगाया और बार-बार आइने में खुद को निहारा। सच कहूं तो खुद की शक्ल से ’यादा मैं उस महंगे चश्मे को ही देखता रहा था। थोड़ी देर बाद चश्मे को वापस पैक किया और संभालकर रख दिया। सुबह उठा तो आंखों में जबरदस्त खुजली होने लगी। आई ड्रॉप्स डाली, लेकिन कुछ असर नहीं हुआ। दूसरे दिन हालत ज्यादा बिगड़ी तो डॉक्टर को दिखाया। स्लिप पर कुछ दवाइयां लिखकर हिदायत मिली-आईफ्लू की शुरुआत है। आंखों पर चश्मा लगाइए, वरना दूसरों को भी नुकसान हो सकता है। स्लिप लेकर घर आया तो अपने दोस्त की बात याद आई कि एक हफ्ते में चश्मा मेरी आंखों पर होगा। कहते हैं कि दिन में एक बार हमारी जुबान पर `मां सरस्वती´ विराजमान होती हैं और तब कहे शब्द सच हो जाते हैं। शायद उस दोस्त के लिए वो वक्त तभी था। जो भी हो, दोस्ती के आईफ्लू ने आंखों पर चश्मा लगवा ही दिया...!&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-7837754274714774211?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/7837754274714774211/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=7837754274714774211' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7837754274714774211'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7837754274714774211'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/09/blog-post_18.html' title='दोस्ती का `आईफ्लू´'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNK3Hk3M_DI/AAAAAAAAAE0/h39Ogse4diE/s72-c/20.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-3791429970457176171</id><published>2008-09-13T12:31:00.000-07:00</published><updated>2008-09-19T08:58:52.321-07:00</updated><title type='text'>दिल्ली धमाकों में हिन्दी को 'शान्ति'</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNPJS5Fw7MI/AAAAAAAAAFE/vNdBhwjY_7E/s1600-h/Tree+Hugger+c2008[1].JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5247759317216586946" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNPJS5Fw7MI/AAAAAAAAAFE/vNdBhwjY_7E/s320/Tree+Hugger+c2008%5B1%5D.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शनिवार दोपहर को अपनी किताबें सम्भाल रहा था की एक पुरानी डायरी हाथ लग गयी। धूल झाडी तो एक सूखा गुलाब उसमे से नीचे गिर गया। आमतोर पर ऐसा फिल्मो में होता है लेकिन आज मेरे साथ भी हो गया। ग़ज़ल तो नही बजी पर उस गुलाब को देने वाले का नाम सोचने के लिए दिमाग पर जोर डाला तो स्कूल के दिन ही याद आए। फिर सोचा की शायेद रात को सपने में ही गुलाब देने वाले का चेहरा नज़र आ जाए। ऐसी फिल्मी प्लानिंग शायेद दिमाग ने उस ग़ज़ल के शब्द सोचकर ही की - अब के बिछडे तो कभी ख्वाबों में मिले...कुछ सूखे हुए फूल किताबों में मिले...&lt;br /&gt;शायेद रात को गुलाब देने वाले का हसीं ख्वाब आ भी जाता&lt;span class=""&gt; पर रात और उस ख्वाब से पहले तो अपनी दिल्ली को बुरी नज़र लग गयी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;em&gt;{अभी मेरे पास भी एक बम फूटा। आधी रात को सब क्रिकेट खेलने में व्यस्त हैं। एक बिग बॉस (वो ख़ुद को समझते हैं) आए और बोले- भगवान् ने हाथ सिर्फ़ लिखने के लिए ही थोड़े दिए हैं, जाओ जाकर क्रिकेट खेलो। जी तो किया की उन्हें बोल दूँ की भगवान् ने मुंह दूसरो पर बेवजह टीका-&lt;/em&gt;&lt;em&gt; टिप्पणी करने के लिए थोड़े दिया है, जिसका जो मन हो वो करे। खैर जाने दीजिये। क्रिकेट से तो अपनी दुश्मनी काफ़ी पुरानी है और वैसे भी कुछ लोग आदत से मजबूर होते हैं। }&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;बेवजह आए इस ब्रेक के लिए माफ़ी। बात हो रही थी गुलाब, ख्वाब और दिल्ली की। अब ये तो नींद के बाद ही पता चलेगा की ख्वाब किसका आता है? दिल्ली का या फिर&lt;span class=""&gt; गुलाब का... हो सकता है की हिन्दी का भी&lt;span class=""&gt; आ जाए, हिन्दी दिवस जो है। गुलाब वाली इस डायरी में लिखी एक कविता पढ़ी तो हँसी आ गयी। बचपन में हिन्दी दिवस पर हुई प्रतियोगिता में ये मैंने लिखी थी। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;हिन्दी दिवस पर एक अखबार के ऑफिस में निर्णय हुआ की आज के दिन किसी ख़बर में कोई इंग्लिश का शब्द नही छापेगा । हालत ये हुई की लिखने वाले ज्यदटर रिपोर्टर शब्दकोष डॉट कोम खोलकर हिन्दी के शब्द खोजते नज़र आए। &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;जो भी हो, यहाँ भी सब सजा के डर से हुआ और स्कूल में हमारे ज़माने में भी होता था और आज भी हो रहा है-हिन्दी में बात की तो मिलेगा डंडा... ये बात और है की इन स्कूलों में भी हिन्दी दिवस तो मनाया ही जाता है। हिन्दी की हालत ऐसे शायेद थी भी नही, साल में एक दिन श्रधा के फूल चढा- चढा &lt;span class=""&gt;केर, &lt;/span&gt;उस पर&lt;span class=""&gt; तरस&lt;span class=""&gt; दिलाते भाषण दे-देकर ये हालत कर दी गयी है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;खैर इस बार तो हिन्दी सभी के तरस की भागी बन्ने से बच &lt;span class=""&gt;गयी। हिन्दी दिवस से एक दिन पहले हुए दिल्ली धमाकों में हिन्दी को 'शान्ति' मिल गयी। वो ऐसे की &lt;/span&gt;अब अखबार और सभी लोग दिल्ली धमाकों के निंदा प्रस्तावों में व्यस्त हो जायेंगे और इस कागजी (या फिर छपने की चाह ) संवेदनाओं में हिन्दी दिवस का मर्म कुछ दब जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-3791429970457176171?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/3791429970457176171/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=3791429970457176171' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3791429970457176171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/3791429970457176171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/09/blog-post_13.html' title='दिल्ली धमाकों में हिन्दी को &apos;शान्ति&apos;'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNPJS5Fw7MI/AAAAAAAAAFE/vNdBhwjY_7E/s72-c/Tree+Hugger+c2008%5B1%5D.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-7226664328199515167</id><published>2008-09-07T11:54:00.000-07:00</published><updated>2008-09-18T12:59:30.754-07:00</updated><title type='text'>माँ, मैं और मौत</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNKtNqbPTFI/AAAAAAAAAEs/ry7bnE8cyTA/s1600-h/18.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5247446966078491730" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNKtNqbPTFI/AAAAAAAAAEs/ry7bnE8cyTA/s320/18.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SM6O2mpKAmI/AAAAAAAAADU/7ZWALt62V90/s1600-h/kn0711ca.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div&gt;कभी-कभी ज़िन्दगी में हम ऐसे दौर से गुज़रते हैं, जब सवाल तो बहुत सारे होते हैं, लेकिन उनका जवाब लाख कोशिशों बाद भी नही मिलता। ऐसा ही एक सवाल काफी वक्त से मुझे परेशान किए है। कुछ ख़ास लोगों को अपने दिल का हाल कहा तो जवाब में ख़ुद को पागल, सनकी और न जाने क्या-क्या सुनना पडा।&lt;br /&gt;दरअसल मेरी माँ और मेरे बीच&lt;span class=""&gt; मौत के ख्याल से में डरने लगा हूँ। ऐसा एकदम से नही हुआ, बल्कि पिछले डेढ़ साल में मेरी ज़िन्दगी में हुई दो अलग-अलग घटनाओ से हुआ। मार्च 2००६ की बात है। एक नए शख्स से मेरी दोस्ती हुई। मेरे इस दोस्त की मम्मी को गुज़रे काफ़ी वक्त हो चुका है। जयपुर में अकेला था, इसलिए कभी-कभी इसी दोस्त के घर जाने लगा। पहली बार जब में अपने इस दोस्त के घर गया तो वहां माँ की कमी को मैंने दिल से महसूस किया। सब-कुछ होने के बावजूद वहां जैसे कुछ नही था। रात भर सो नही पाया। इक अजीब सा डर मुझे खाए जा रहा था। पता नही क्यूँ मेरा मन मुझे उस दोस्त की जगह ख़ुद को रखने के बारे में सोचने के लिए मजबूर करने लगा था। मेरी माँ मुझसे दूर हो जाए ...ऐसा सोचना ही मेरी आँखों में पानी ला देता है। भगवान् कभी मुझे ऐसा दिन न दिखाए। अब तो बस हर रोज़ पूजा में भगवान् से यही मांगने लगा था। दुआ करता था की मेरी माँ से पहले मुझे मौत मिले ताकि मुझे अपने दोस्त की जगह कभी होना ही न पड़े। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;इसी डर के साथ ज़िन्दगी चल रही थी की मेरे मकान मालिक का ४० साल&lt;span class=""&gt; का बेटा चल बसा। उसके जाने का दुःख मुझे रत्ती भर भी नही था। आधी रात को उठकर अपनी माँ को गालियाँ देने वाले आदमी को तो मार देना चाहिये, लेकिन एक माँ के लिए उसकी औलाद&lt;span class=""&gt; कितनी अहमियत रखती है, ये दूसरो के लिए समझ पाना बहुत मुश्किल है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;बेटा चला गया था लेकिन उसकी मौत वाली रात को भी दिए की कम होती लो उस माँ को बेचैन किए थी। उस माँ ने गरम दिया हाथ में लिया और उसे बुझने से बचा लिया। उस माँ की &lt;span class=""&gt;नज़र में एक अपशगुन होने&lt;span class=""&gt; से बच &lt;/span&gt;गया। कितनी अजीब बात है, मौत से बडा अपशगुन और क्या होगा? लेकिन ये माँ की भावना है और इसे एक माँ ही समझ सकती है। उस दिन के बाद मैंने एक माँ को रोज़ रोते हुए देखा। में भी आपका बेटा ही हूँ...जैसा दिलासा देने की हिम्मत भी में नही जुटा पाया।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;कुछ दिन पहले में माँ के बिना ख़ुद के बारे में सोच कर &lt;span class=""&gt;डर जाता था, लेकिन बेटे के जाने के बाद उस माँ का हाल देखकर जैसे मैं ख़ुद से नफरत करने लगा था। मैं भगवान् से अपनी माँ से पहले ख़ुद की मौत मांगने लगा था, ताकि मुझे बिना माँ के होने वाली तकलीफ से न जूझना पड़े। ख़ुद के बारे में ही सोचा...भूल बैठा की उसके बाद माँ का क्या होगा? अब जब बेटे की मौत के बाद एक माँ का हाल देखा तो उस माँ की जगह अपनी माँ का ख्याल आते ही दिल कांप उठा।&lt;br /&gt;आज भी मन अजीब असमंजस में है। पहले मौत किसकी होगी-माँ या मेरी...? हालाँकि जो होना है वो तो होकर रहेगा। मौत एक दिन आयेगी ही, लेकिन चाहकर भी ये बुरा ख्याल मन से निकाल नही पा रहा हूँ। जाने क्या होगा...काश, ऐसा हो की मेरी माँ और मेरी मौत की घड़ी एक हो, ताकि दोनों उस दर्द से बच जायें, जिसकी कल्पना भी इतनी भयानक है। काश ऐसा हो जाए... &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-7226664328199515167?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/7226664328199515167/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=7226664328199515167' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7226664328199515167'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7226664328199515167'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/09/blog-post_07.html' title='माँ, मैं और मौत'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='28' src='http://1.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/S1CFd-A3PVI/AAAAAAAAAOI/N3V-HdWdizg/S220/a..jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNKtNqbPTFI/AAAAAAAAAEs/ry7bnE8cyTA/s72-c/18.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3329049389558392489.post-7317488413443030053</id><published>2008-09-06T12:31:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T02:44:58.890-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कब आओगे बबलू?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNKlt-IkJwI/AAAAAAAAAEk/JqEDkFRAoQk/s1600-h/19.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5247438725031667458" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_6H_bGaE8gWc/SNKlt-IkJwI/AAAAAAAAAEk/JqEDkFRAoQk/s320/19.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;बेटे की बाट जोहती एक मां की सच्ची कहानी, जिसे हालात ने पेटजाए से इतना दूर कर दिया कि अब उन आंखों में इंतजार कम आंसू ज्यादा हैं।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;जसप्रीत कौर। उम्र 32 साल। उन अभागी बहुओं में से एक, जिन्हें ससुराल में सुख नसीब नहीं होता। 2 जुलाई, 1999 शुक्रवार के दिन मैंने एक बेटे को जन्म दिया। वैसे तो शादी के बाद का कोई दिन मुझे याद नहीं, जो बिना रोए गुजरा हो पर इस दिन मेरी आंखों में खुशी के आंसू थे। कुछ लोग सोचते हैं कि गरीब की बेटियों के भाग्य में ही दुख होते हैं पर शादी में एक करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी मेरे हिस्से में खुशी नहीं आई।बेटा होने के बाद जिंदगी में खुशी की उम्मीद जागी थी पर यह सिर्फ उम्मीद ही रही। पापा भी मेरे दुख में ही चल बसे। बेशुमार पैसा होने के बावजूद मेरा बेटा बबलू छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसता रहता। मायके से आए खिलौने, कपड़े भी ससुराल वाले यह कहकर उसे नहीं देते थे कि इनमें टोना-टोटका है। चार साल गुजर गए। बबलू का एडमिशन सरकारी स्कूल में करवा दिया गया। किसी अच्छे स्कूल में एडमिशन के लिए जब मैंने बात की तो यही कहा गया कि पढ़-लिख कर कौन-सा डॉक्टर बनना है, संभालनी तो खेतीबाड़ी ही है। उसके भविष्य की परवाह किसी को भी नहीं थी। शराब-कबाब पर घर में रोज काफी पैसा खर्च होता पर बबलू और मेरे लिए दो वक्त की रोटी के अलावा कुछ नहीं था। पांच साल से ज्यादा का हो चुका बबलू पढ़ने-लिखने के नाम पर कुछ भी नहीं सीख पाया था। दूसरे बच्चे जब अपनी मां को अंग्रेजी में कविता सुनाते तो मन में एक डर-सा उठता कि कल जब बबलू अपने दोस्तों से पिछड़ जाएगा तो मैं उसे क्या जवाब दूंगी। बबलू के भविष्य के बारे में सोचकर मैं मायके आ गई और एक कॉन्वेंट स्कूल में उसका एडमिशन करवा दिया। दिन हफ्ते और हफ्ते महीनों में बदल गए पर ससुराल से कोई फोन, कोई संदेशा नहीं आया। हालांकि मायके रहने में कोई दिक्कत नहीं थी पर लोग जब मेरी मां से पूछते कि दो महीने हो गए, बेटी मायके क्यों बैठी है...वो परेशान हो जाती थीं। मुझे मायके आए छह महीने होने को थे कि एक दिन अचानक ये आए। बीती बातें भूलकर मेरी मां, भाभी और मैंने इनका सत्कार किया। बबलू कुछ देर बाद स्कूल से आया तो `डैडी´ कहकर इनके गले लग गया। बबलू के `डैडी´ बोलते ही वह भड़क गए-`बना दिया मेरे बेटे को अंग्रेज। मैं अपने बच्चे को लेने आया हूं।´ यह सुनकर मैं सुन्न खड़ी रह गई। मन में जो खुशी थी कि इन्हें मेरी याद आई, सब आंसुओं में बह गई। सवाल बबलू के भविष्य का था। दिल पर पत्थर रखकर मैंने अपना फैसला सुना दिया-`बबलू तभी जाएगा, अगर अच्छे स्कूल में पढ़ेगा।´मेरी बात सुनकर वह बोले-`बबलू वहीं पढ़ेगा, जहां मैं पढ़ा हूं।´ शादी के इतने सालों में मैंने पहली बार इनसे ऊंची आवाज में बात की-`यही बात है तो ना बबलू आपके साथ जाएगा और ना मैं।´इतना सुनना था कि इन्होंने बबलू को गोद से नीचे उतारा और बोले-`ठीक है तो संभाल मेरे बिना ही बबलू को।´ अपनी बात कहकर वह बाहर की ओर चल दिए। कोई कुछ सोचता इससे पहले वह वापस आए और चारपाई पर लेट गए। कुछ पूछने-बताने का मौका किसी को नहीं मिला। सब-कुछ खत्म हो चुका था। इन्होंने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी। जिस आदमी के दिल में मेरे लिए प्यार या रहम नाम की कोई चीज नहीं थी, पता नहीं क्यों उसकी मौत ने मुझे बेसुध कर दिया। कुछ घंटे बाद जब मैं होश में आई तो माहौल और भी ज्यादा भयावह हो चुका था। मेरे ससुराल वाले पुलिस के साथ पहुंच चुके थे। मेरी मां, भैया-भाभी और मुझ पर उनके कत्ल का इल्जाम लगाया गया था। पुलिस स्टेशन में मेरे परिवार ने एक रात काटी। अपने पति के अंतिम संस्कार में भी मैं शामिल नहीं हो सकी। सुबह तक काफी रिश्तेदार कोर्ट पहुंच गए। बच्चों को देखते हुए मेरी भाभी और मुझे जमानत मिल गई। तारीख पर तारीख पड़ने लगी। मां को भी जमानत मिल गई पर भाई अभी हिरासत में था। बडे़-बूढों ने पंचायत में मेरे ससुराल वालों पर केस वापस लेने के लिए दबाव डाला। बहुत समझाइश के बाद वो लोग केस वापस लेने के लिए राजी तो हो गए, लेकिन इसके लिए उन्होंने एक शर्त रखी। यही वह शर्त थी, जिसने मुझे उम्रभर के लिए आंसू दे दिए। ससुराल वाले केस वापस लेने के लिए इस बात पर राजी हुए कि बबलू हमेशा के लिए उन्हें सौंप दिया जाए। साथ ही उन्होंने मेरे दस्तख्त भी चाहे कि मैं कभी बबलू से मिलने की कोशिश नहीं करूंगी। शर्त सुनकर मैं कांप गई थी। मैं अपने बबलू को खुद से दूर करने के लिए कतई राजी नहीं थी। मुझे केस लड़ना मंजूर था, क्योंकि जो जुर्म हमने किया ही नहीं था, उसकी इतनी बड़ी सजा क्यों...। मैं अपने फैसले पर कायम थी कि भाभी मेरी बाजू पकड़कर कमरे में ले गई। उसने मेरा हाथ बबलू के सिर पर रखकर कसम दी कि कुछ भी कर अपने भाई को जल्दी रिहा करवाऊं। अब तक बहन से बढ़कर साथ निभाने वाली भाभी मेरे आगे हाथ जोड़ रही थी। वो रोती हुई चीख-चीख कर कह रही थी-`तेरी जिंदगी तो बरबाद हो गई, अब मेरी जिंदगी बरबाद ना कर। अगर मेरे पति को सजा हो गई तो मेरी और मेरे बच्चों की जिंदगी बिखर जाएगी...।´ आंसू मेरी आंखों से भी नहीं रुक रहे थे। क्या करूं और क्या नहीं...कुछ तय कर पाती, इससे पहले भाभी ने मेरे पैर पकड़ लिए। भाभी का रोना मुझसे देखा नहीं गया। मैंने भाभी को वचन दे दिया कि जैसा वो चाहेंगी, वैसा ही होगा। बस फिर कुछ ही घंटे बाद वो लोग बबलू को लेने आ गए। मेरे आगे कुछ कागज किए गए, जो बिना पढ़े ही मैंने दस्तख्त कर दिए। बबलू मुझसे दूर हो रहा था, फिर उन कागजों में मैं क्या देखती। उस दिन के बाद कई बार मन किया कि मैं भी मर जाऊं पर बबलू के मिलने की एक उम्मीद अब भी मन के किसी कोने में जिंदा थी। हर वक्त बबलू के बारे में ही सोचती रहती। क्या उसे भी मां याद आती होगी। इसी तरह लगभग दो साल और बीत गए। एक दिन मां की तबियत बहुत खराब हो गई। पापा के जाने के बाद मां कभी ठीक नहीं रही पर अब मेरा दुख भी उसे अंदर ही अंदर जैसे खा रहा था। `पूरी उम्र अकेली कैसे काटेगी बेटी´, `वक्त बीत रहा है कुछ सोचते क्यों नहीं बेटी के बारे में...´ ऐसे सवालों के साथ कुछ रिश्तेदार मेरे लिए रिश्ते भी लेकर आने लगे। दोबारा शादी के बारे में मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। मां ने इस बारे में कहा पर मैंने साफ मना कर दिया।`मेरे बाद अकेली कहां जाएगी, पूरी उम्र भाई के पास रहना आसान नहीं है, ये दुनिया तुझे जीने नहीं देगी...´ मां बोलती जा रही थी। मैं वहां से उठकर अपने कमरे में आ गई। उस दिन खूब रोई। दो दिन बाद मुझे देखने कुछ लोग भी आ गए। मेरे चाचा मुझसे 22 साल बड़े आदमी का रिश्ता मेरे लिए लेकर आए थे। सब कुछ तय हो गया पर बलजीत (जिसका रिश्ता आया था) ने कहा-`एक बार लड़की से पूछ लो।´ बलजीत ने अकेले में मुझसे बात करने की इच्छा जताई। बलजीत जब कमरे में आए तो बोले-`मैं तुम्हारे बारे में सब-कुछ जानता हूं। मेरा यकीन करो मैं तुम्हें खुश रखूंगा। मेरे तीनों बच्चे विदेश में सैटल हैं। पहली दो पçत्नयों में से एक कैंसर और एक हार्ट अटैक से चल बसी। मैं पंजाब में अच्छे प्रशासनिक पद पर हूं। किसी चीज की कमी नहीं है पर अकेलापन दूर करने के लिए एक साथी की जरूरत है। जहां तक तुम्हारे बेटे बबलू का सवाल है...´बलजीत आगे कुछ कहते मैं रो पड़ी-`मेरे बबलू से एक बार मिलवा दो।´मेरी बात सुनकर बलजीत बोले-`मेरी बहुत पहुंच है, पैसा है, मैं वादा तो नहीं करता पर इतना यकीन दिला सकता हूं कि बबलू और तुम्हें मिलवाने की पूरी कोशिश कर सकता हूं। मुझमें भी दिल है और मैं तुम्हारा दर्द अच्छी तरह समझ सकता हूं।´चाचा जी अंदर आ गए। उन्होंने मुझे कहा-`बलजीत जी बहुत अच्छे आदमी है। तुझे बहुत खुश रखेंगे।´मैं हां तो नहीं करना चाहती थी पर उस वक्त ऐसा लगा, जैसे बबलू से मिलने की यही राह है। मैंने चाचा जी से सिर्फ इतना कहा-`जैसा आप ठीक समझें।´हफ्तेभर बाद एक सादे समारोह में मेरी शादी बलजीत से हो गई। आज सालभर से ज्यादा हो गया है बलजीत के साथ रहते हुए। बलजीत मेरी खुशी के लिए हर कोशिश करते हैं, लेकिन मेरा मन हमेशा बबलू के बारे में ही सोचता रहता है। एक बार बलजीत ने अपने कुछ आदमियों को बबलू के स्कूल भेजा था। उन्होंने बबलू से उसकी मां के बारे में पूछा तो बबलू का जवाब था-`मुझे नहीं मिलना मम्मी से। वो गंदी है। उसने नानी और मामा के साथ मिलकर मेरे पापा को मार दिया।´बबलू के मन में मेरे ससुराल वालों ने मेरे लिए इतनी नफरत भर दी कि वो मेरी शक्ल भी नहीं देखना चाहता। अब बस दिल में यही ख्वाहिश बची है कि बबलू से एक बार मिलकर उसकी सारी गलतफहमियां दूर कर दूं। कभी-कभी बहुत डर भी लगता है कि कहीं ये जिंदगी बबलू से मिले बिना ही खत्म ना हो जाए पर ईश्वर पर भरोसा भी है कि कोई ना कोई चमत्कार जरूर होगा। आज नहीं तो 20-25 साल बाद ही सही, जब बबलू मेरे सामने होगा, मेरी ममता उसे हर बात सच-सच समझा देगी। मैं उसे वो सारे तोहफे दिखाऊंगी, जो मैंने उसके हर जन्मदिन पर खरीदे हैं। उसे बता दूंगी कि मुझे विश्वास था कि मेरा बबलू एक न एक दिन मुझसे जरूर मिलेगा। जब वो मुझसे मिलेगा, उस खुशी के सामने जिंदगीभर के दुख छोटे पड़ जाएंगे। भगवान के आगे हाथ जोड़कर यही विनती है कि एक मां का विश्वास टूटने ना देना। बस एक बार मैं बबलू को गले से लगाकर जी-भरकर रो सकूं। उसे बता सकूं कि उसकी मां उसे कितना प्यार करती है...।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3329049389558392489-7317488413443030053?l=deepraaj.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://deepraaj.blogspot.com/feeds/7317488413443030053/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3329049389558392489&amp;postID=7317488413443030053' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7317488413443030053'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3329049389558392489/posts/default/7317488413443030053'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://deepraaj.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='कब आओगे बबलू?'/><author><name>Dileepraaj Nagpal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15936510510123199146</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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