Wednesday, June 10, 2009

नस्लभेद, नफरत या कुछ और...


इन दिनों सभी भारतीयों के दिल में ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए नफरत भड़क रही है। हम सोच रहे हैं कि वहां रह रहे भारतीयों पर अत्याचार हो रहा है। सच्चाई खैर जो भी हो, लेकिन हाथ की सभी उंगलियां एक-सी तो नहीं होतीं। डेली न्यूज की पत्रिका ´खुशबू´ के लिए मेलबर्न में रह रही भारतवंशी नवदीप कौर से बातचीत की तो इस मुद्दे का दूसरा पहलू सामने आया। इस पोस्ट के जरिए प्रस्तुत है नवदीप कौर के मन की बात, उन्हीं की जुबानी...
तकरीबन चार साल पहले जब पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया जाना तय हुआ, बहुत खुश थी। माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण कभी ट्रेन में भी अकेले सफर नहीं किया था। पहली बार उनसे इतनी दूर जा रही थी, इस कारण थोड़ी दुखी थी। पहली बार हवाई जहाज में बैठना था, इसलिए कुछ-कुछ डरी हुई भी। मुझे होटल मैनेजमेंट का कोर्स करना था, इसलिए ऑस्ट्रेलिया जाने का निर्णय किया।
जब यहां (मेलबर्न) आई तो सिर्फ अपने पहनावे में बदलाव करना पड़ा। खाने की भी थोड़ी समस्या आई, लेकिन यहां के लोगों से कभी कोई परेशानी नहीं हुई। एक बात अच्छी लगी कि इंडिया की तरह यहां कोई आपको घूर-घूर कर नहीं देखता। राह चलती लड़कियों को परेशान नहीं होना पड़ता। हालांकि ऑस्ट्रेलिया हो या इंडिया, अपराधिक प्रवृçत्त के लोग तो हर जगह होते हैं। मदद करने के मामले में ऑस्ट्रेलियंस कभी पीछे नहीं हटते। शुरुआत की एक बात याद आती है। बस से कॉलेज के लिए जा रही थी। एक विदेशी लड़के ने भद्दा कमेंट किया। मेरे साथ जो इंडियन फ्रेंड्स थे, वे इस पर हंस दिए। मुझे बहुत बुरा लगा, लेकिन बस में ही खड़े दूसरे विदेशी लड़के ने छेड़खानी करने वाले को खूब डांटा। इतने सालों से सब-कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। यहां के फ्रेंड्स से बहुत घुलमिल गई हूं, लेकिन पता नहीं अचानक क्या हो गया? इन दिनों बहुत बुरा महसूस कर रही हूं। पापा-मम्मी बहुत टेंशन में हैं। टीवी और अखबारों में जिस तरह से खबरें आ रही हैं, उससे शायद सभी भारतीयों के मन में ऑस्ट्रेलियंस के लिए नफरत पैदा हो रही है। इधर, उसी नफरत से पनप रहे विरोध-प्रदर्शनों से ऑस्ट्रेलियंस को भी ठेस पहुंच रही है। आज हर इंडियन यही सोच रहा है कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ भेदभाव होता है, जबकि यह सच नहीं है। पिछले चार सालों में मुझे याद नहीं कि सिर्फ इंडियन होने के कारण मुझे परेशान किया गया हो। अब जिस तरह से घटनाओं का प्रचार किया जा रहा है, उससे जरूर ऑस्ट्रेलियाई फ्रेंड्स हमसे डरने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि उनका मजाक भी हमें कहीं नस्लीय टिप्पणी ना लगने लगे। मैं सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी कि असामाजिक तत्वों का कोई धर्म नहीं होता। अपराधी कभी यह देखकर लूटपाट नहीं करता कि उसका शिकार भारतीय है। एक हिंदुस्तानी के साथ जरा भी ज्यादती हुई है तो उसे नस्लीय हमला कहकर न्याय की मांग की जा रही है। ऑस्टे्रलियाई पुलिस के रिकॉर्ड देखेंगे तो ऑस्ट्रेलियंस को भी ऐसी घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है। हमला करने वाले बेरोजगार, नशेड़ी या फिर कुछ मामलों में हिंदुस्तानियों से नफरत रखने वाले हो सकते हैं। यह पूरी तरह गलत है कि दो दोस्तों में हुए झगड़े को भी नस्लीय भेदभाव कहकर प्रचारित किया जा रहा है। इन चार सालों में कई ऑस्ट्रेलियाई फ्रेंड्स ऐसे भी बने, जिनके घर मेरा आना-जाना है। उन्हीं के घर जाकर जब भारतीय पकवान बनाकर उन्हें खिलाती हूं तो भरपूर स्नेह मिलता है। कुछ फ्रेंड्स को तो थोड़ी-बहुत हिंदी भी सिखा चुकी हूं। अब उन्हीं फ्रेंड्स के मन में डर पैदा हो गया है। वे हमसे डरते लगे हैं। ऐसा लगने लगा है कि इस दुष्प्रचार ने हमारे बीच संदेह पैदा कर दिया है। नस्लभेद के कारण दस प्रतिशत असुरक्षा हो सकती है, लेकिन भारतीयों को भी संयम बरतना होगा। यहां भारतीयों को शांत स्वभाव और मेहनती माना जाता है, लेकिन इंडिया घूमने जाने वाले विदेशी भी अपने साथ कुछ बुरे अनुभव लेकर जरूर लौटते हैं। भारत में टूरिस्ट्स के साथ होने वाली घटनाओं को भी वे नस्लीय भेदभाव से जोड़कर देख सकते हैं, लेकिन नहीं। वे भी जानते हैं और हमें भी मानना होगा कि परदेस के माहौल के अनुसार थोड़ा-बहुत परिवर्तन तो खुद में लाना ही होगा। विदेशियों को पराया समझकर उनसे बातचीत नहीं करेंगे तो उन्हें जान भी नहीं पाएंगे। मेलजोल की भावना रखे बिना कुछ नहीं हो सकता। मुझे लगता कि भारतीयों को अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया करवाने के बजाए ऑस्ट्रेलियंस से उनका कयुनिकेशन गैप खत्म करने पर जोर देना चाहिए। अगर इसी तरह यह आग बढ़ती गई तो ऑस्ट्रेलियंस और हमारे बीच इतनी दूरियां आ जाएंगी कि उन्हें खत्म करना नामुमकिन हो जाएगा।

Sunday, May 17, 2009

जरा रुकिए, कपड़े बदल रही हूं...


दोपहर तीन बजे का वक्त होगा। किसी काम से एक परिचित के घर दाखिल हुआ ही था कि मियां-बीवी का जोरदार झगड़ा सुनाई देने लगा। यहां पति को शक है कि पत्नी को कम सुनता है और पत्नी को लगता है कि जब तक ऊंची आवाज में बात ना करे पति पर असर नहीं होता। इसी चक्कर में दोनों का वॉल्यूम हाई रहता है।
आज झगड़े की वजह छोटी थी या बड़ी, इस बारे में सभी की राय अलग-अलग हो सकती है। घटना कुछ इस तरह है। इस घर के इकलौते कमरे की कुंडी ठीक से बंद नहीं होती। पत्नी जी कपड़े बदल रही थीं कि दोपहर भोज के लिए पधारे पति सीधे कमरे में प्रवेश कर गए। इससे पहले पूछा भी कि क्या कर रही हो? जवाब मिला-'जरा रुको, कपड़े बदल रही हूं।' पति को इस आदेश की पालना करना सही नहीं लगा और पति होने का हक जमाते हुए अंदर घुसते ही ऑर्डर दे डाला-'जल्दी करो, बहुत भूख लगी है। खाना गर्म करो।'
पति की इस हरकत से पत्नी तिलमिला गई और युद्ध शुरू हो गया। दोनों में से सही कौन...इसके निर्णय के लिए जज बना डाला मुझे और घटना का ब्यौरा दोनों ने अपने-अपने तरीके से देने लगे। पत्नी की नजर में ये गलत था तो पति का कहना था कि पति से कैसा परदा...
'अभी मेरी शादी नहीं हुईं, इसलिए मैं क्या बोलूं...' यह कहकर वहां से निकल लिया1 सभी की अपनी राय हो सकती हैं1 मुझे यहां पत्नी की बात ज्यादा सही लगी। कुछ लाइनें भी याद आ गईं, जो शायद निदा फाजली साहब की हैं...
अगर तुम समझते हो बीवी घर की इज्जत होती है
तो खुदा के लिए उस इज्जत की खातिर
दरवाजा खुला हो या बंद
हमेशा दस्तक देकर ही घर में दाखिल हुवा करो

Wednesday, May 13, 2009

प्यार से प्यारी बात


पिछले साल आज ही के दिन यहां (जयपुर) बम धमाके हुए थे। आज के अखबार और न्यूज चैनल्स देख पुरानी यादों के जख्म ताजा हो उठे, लेकिन वो धमाके मुझे एक ऐसी सीख दे गए, जिसे समझ लिया जाए तो दोस्ती, प्यार और हर रिश्ता कभी दरकेगा नहीं।
करीब दो साल होने को हैं। हर मंगलवार मैं और मेरा दोस्त हिमांशु हनुमानजी के मंदिर जाते हैं। मंगलवार को मेरा ऑफिस से ऑफ होता है पर पिछले साल 13 मई (मंगलवार) को मुझे ऑफिस आना पड़ा। हम साथ मंदिर नहीं जा सके। देर शाम काम खत्म करने के बाद मैं अपने एक कलीग के साथ पास ऑफिस के पास स्थित माँ दुर्गा के मंदिर गया। मंदिर से बाहर निकले ही थे कि मेरे कलीग के मोबाइल पर मैसेज मिला कि यहां बम ब्लास्ट हुआ है। ऑफिस पहुंचने तक ये धमाके एक से ज्यादा हो चुके थे। टीवी पर धमाकों वाली जगह का लाइव टेलीकास्ट देख रहा था कि ध्यान आया यह रास्ते कुछ वैसे ही हैं, जहां से मैं और हिमांशु मंदिर आते-जाते वक्त गुजरा करते थे। मन ने एक अजीब-सा डर महसूस किया। हिमांशु को फोन लगाया पर नेटवर्क व्यस्त होने से मोबाइल काम नहीं कर रहे थे। कुछ देर बाद उसके पापा से बात हुई तो उन्होंने बताया कि वो ठीक है और घर आने वाला है। मेरा मोबाइल भी थोड़ी-थोड़ी देर बाद बज रहा था। कुशलक्षेम पूछने के लिए कुछ ऐसे परिचितों के फोन भी आए, जिन्होंने इससे पहले कभी फोन नहीं किया। हाल-चाल पूछने के लिए आने वाली कॉल्स का दौर अगले कुछ देर तक चला।
सभी भगवान का शुक्रिया अदा कर एक ही बात कह रहे थे कि हमें कुछ नहीं हुआ, लेकिन बावजूद इसके मेरा मन उदास था। कारण कुछ खास ना होकर भी दिल को परेशान करने वाला था। कुछ तीन-चार ऐसे अपने लोग थे, जिनका फोन नहीं आया था। मन में एक ही बात आ रही थी कि उनमें से किसी को भी मेरी परवाह नहीं है। जब दिल का उबाल बाहर आने लगा तो मैंने उन सभी को फोन कर एक ही राग अलापा-क्वमेरे मरने या जीने से शायद किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। इतने दिनों बाद ये पूछना भी मुनासिब नहीं समझा कि जिंदा हूं भी या नहीं...। गुस्से में काफी कुछ ऐसा भी कह गया, जो लिख नहीं सकता। इन्हीं अपनों में से एक का जवाब जैसे मेरे सारे सवालों पर भारी पड़ गया। उन्होंने कहा-तुम्हे कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि हमारी दुआएं हर पल तुम्हारे साथ हैं। इस विश्वास को हमेशा दिल में रखा है। भगवान पर भरोसा है, इसीलिए फोन कर कुछ नहीं पूछा।सुख-दुख आते हैं पर बहुत बार रिश्तों में आई गलतफहमियां उनके दरकने का कारण बन जाती हैं। ...खैर यह छोटा-सा, प्यारा-सा जवाब जब भी मुझे याद आता है, मैं एक ही बात दोहराता हूं-मैंने सभी को माफ किया। मुनव्वर राणा ने भी क्या खूब कहा है...
अभी जिंदा है मां मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा...
घर से निकलता हूं तो दुआ भी साथ चलती है...

Monday, May 4, 2009

सिर्फ प्रेमियों के लिए...


ये है एक प्यारा-सा ई-मेल, पढिये और दिल में एक ख़ुशी के साथ थोडा मुस्कुराइए...ये पोस्ट सिर्फ प्रेमियों के लिए है...यानी सभी के लिए, क्यूंकि प्यार तो सभी को होता है...जरूरी नहीं की प्यार के लिए प्रेमिका का होना जरूरी हो...और भी बहुत-से रिश्ते है...माँ से बेहतर कोई हो सकता है क्या...खैर आप पढिये और कुछ महसूस कीजिये...


u in love...check this
12 signs you LOVE someone


TWELVE:
When you're on the phone with them late at night and they hang up, you still miss them even when it was just two minutes ago.




ELEVEN:
You walk really slow when you're with them.




TEN:
You feel shy whenever they're around.




NINE:
You smile when you hear their voice.



EIGHT:
When you look at them, you can't see the other people around you, you just see him/her.



SIX:
They're all you think about.




FIVE:
You realize you're always smiling when you're looking at them.




FOUR:
You would do anything for them, just to see them.




THREE:
While reading this, there was one person on your mind this whole time.




TWO:
You were so busy thinking about that person, you didn't notice number seven was missing




ONE:
You just scrolled up to check & are now silently laughing at yourself.




NOW REPLY ME WHO THAT PERSON WAS....? :)

Friday, April 24, 2009

मैं वोट नहीं डालूँगा!


रात करीब एक बजे का वक्त होगा। काम से फ्री हुआ ही था कि मेरे एक कलीग ने आवाज दी-`आओ, कहीं चलकर आते हैं।' बिना कुछ कहे मैं उनके साथ हो लिया। सुबह से ही किसी बात पर मैं बहुत दुखी महसूस कर रहा था। उनकी बाइक के पीछे बैठा भी सैड सॉन्ग गुनगुना रहा था। दस-पंद्रह मिनट बाद जब उन्होंने बाइक जेकेलोन अस्पताल (जयपुर में बच्चों का प्रसिद्ध अस्पताल) की तरफ मोड़ी, तब जाकर ध्यान आया कि मैंने तो उनसे पूछा तक नहीं कि जाना कहां है?
अपनी धुन से बाहर आते हुए मैंने सवाल किया-`इतनी रात हम अस्पताल क्यों आए हैं...कौन एडमिट है?'
जवाब मिला-`भांजी बीमार है?'
मैंने फिर पूछा-`कितने साल की है और क्या हुआ?'
जवाब था-`साल नहीं, बस दो महीने की है। हार्ट प्रोब्लम है।'
इस जवाब के बाद भी मेरे मन में अपने दुख का खयाल चल रहा था। उनके पीछे-पीछे चलता रहा। जूते खोलकर हम आईसीयू रूम में दाखिल हुए। अंदर पहुंचते ही यूं महसूस हुआ कि यमराज यहां बैठे सोच रहे हैं कि पहले किसे अपने साथ ले जाएं। हर पलंग पर मशीनों से लैस बच्चे और उनके पास एक बड़ा। कुछ बच्चों के बैड के पास उनकी मां बैठी थी। मां बिना पलकें झपकाए एकटक अपने बच्चे को देख रही थी। हर सैकंड मशीनों की बीप की आवाज जैसे माहौल को और भी ज्यादा खौफनाक बना रही थी।
मेरे कलीग ने भांजी के बैड पर बैठे अपने पिता से कुछ बात की। इस बीच बच्ची कराहने लगी। उसके मुंह पर मशीन लगी थी। हाथों और पैरों पर भी पट्टीनुमा कोई चीज चिपकी थी। शरीर के लगभग हर अंग से कोई ट्यूब लगी थी। इतनी चीजों के बोझ से बच्ची खुलकर रो भी नहीं पा रही थी। ये सब देखकर जाने क्यों मन से खुद का दुख काफूर हो गया। जिन बातों से दिनभर से मैं खुद को दुनिया का सबसे बड़ा दुखी इनसान मान रहा था। वह सब इन चंद पलों में मैं भूल गया। रूम से बाहर निकले तो साथी ने बताया कि यहां आए पांच दिन हुए हैं। हर दिन कुछ बच्चों की यहां मौत हो जाती है। भांजी के इलाज पर तीन-चार लाख का खर्च बता रहे हैं। दिल्ली ले जाना पड़ेगा। इतना पैसा नहीं है...।
वो बोलते जा रहे थे और मैं आंखों से बह रहे आंसुओं को रोकने की असफल कोशिश कर रहा था। जूते पहने और हम बाहर आ गए। वापसी में रास्ते में आने वाली हर चीज से जैसे मैं बातें कर रहा था। चुनाव प्रचार के लिए लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स देख दुख हुआ। इन पर खर्च हुई मोटी रकम बहुत लोगों की जान बचा सकती थी। मन ही मन तय कि इस बार वोट नहीं डालूंगा। रुपए-पैसे न होने के कारण कोई अपने बच्चे की जान न बचाए पाए...। काश, कोई नेता ऐसा भी आता, जो वादा करता कि जीतने पर कम-से-कम चिकित्सा सुविधा को फ्री करेगा। अफसोस कि ऐसा झूठा वादा भी नेताओं की लिस्ट में नहीं है। चुनावों में जूते फेंकने का फैशन चल निकला है तो मन किया है कि राजनीति के हर आदमी पर जूता फेंकूं...अगले ही पल सोचने लगा कि इतने जूते लाऊंगा कहां से...। खैर...ईश्वर से प्रार्थना कि ऐसा दुख किसी को न दे। मन दुखी था और होर्डिंग्स देख गुस्सा भी आ रहा था, इसलिए जो मन में आया लिख डाला। कुछ कम ज्यादा हुआ हो तो माफी। काश, भगवान् मुझ गंदे बच्चे को तीन-चार लाख दे दें...उस बच्ची को मैं बच्चा सकूँ...
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अभी कुछ देर पहले सूचना मिली कि वो बच्ची नहीं रही...
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Saturday, April 18, 2009

मिस कॉल गर्ल!


इन दिनों बहुत परेशान हूं। मोबाइल का बिल कुछ ज्यादा ही हो गया है। बहुत सारी मिस कॉल गर्ल का इसमें योगदान है। अरे भई, यहां शब्दों का स्पेस खत्म करने के चक्कर में भावना को गलत मत समझियेगा। मेरी भावना को समझेंगे, तभी तो भावना आपको समझेगी। क्यों...दरअसल, मैं किसी कॉलगर्ल की बात नहीं कर रहा हूं। मैं एक मिसकॉल गर्ल यानी हमेशा मिसकॉल करने वाली लड़कियों की बात कर रहा हूं। अभी परीक्षाएं खत्म हुई हैं। इस बीच महसूस हुआ कि अच्छे-अच्छे करोड़पति घरों की लड़कियों को भी मिसकॉल से बड़ा प्यार है। एक बार गलती से एक मिसकॉल गर्ल का फोन अटेंड कर लिया तो मुझ पर बरस पड़ी-अरे यार, मेरा फोन क्यों उठाया। काटकर दोबारा करना चाहिए। वाह भई, काम चाहे खुद का हो, लेकिन करेंगी मिसकॉल ही। इन मिसकॉल गर्ल जैसे लोग बहुत-से लोग आपके-हमारे सर्किल में हैं। मेरे सर्किल में तो कई ऐसे मिसकॉल पर्सन भी हैं, जिनके पास बीस-पच्चीस हजार की कीमत का मोबाइल सैट है और खुद का फोर व्हीलर भी। फोन पर कॉलर ट्यून का बिल भर सकते हैं, लेकिन कॉल करने में पसीने छूटते हैं। कुछ मिसकॉल प्रेमी तो ऐसे हैं, जिनकी मिसकॉल पर तुरंत फोन नहीं किया तो रौब से कहेंगे-यार तुम तो हमारा फोन ही नहीं उठाते। ...खैर अपन तो टाइमपास के लिए कुछ लिखने बैठे थे पर अगर भूले-भटके मिसकॉल प्रेमी भावना को समझ गए हों तो प्लीज मिस्ड कॉल से रिसीवड कॉल में आने की कृपा करें।

Saturday, April 11, 2009

रिटायरमेंट कब?


कभी-कभी एक फोटो इतना कुछ कह जाता है, जितने हजार शब्द भी नहीं कह पाते। यह बात किसी किताब में पढ़ी थी, लेकिन कभी-कभी कुछ पल ऐसा महसूस करवाते हैं, जो हजार शब्द या फोटो भी नहीं कह पाते। काफी दिन पहले जवाहर कला केंद्र की सुरेख कला दीर्घा (जयपुर) में फोटो एग्जिबिशिन देखने का मौका मिला। `शहर बनाम संवेदनां नामक इस एग्जिबिशिन के रूप में राजस्थान विश्वविद्यालय के जर्नलिज्म स्टूडेंट्स का पहला प्रयास काफी अच्छा रहा था। एग्जिबिशिन में कुछ फोटो ऐसे भी थे, जो शायद सवाल कर रहे थे कि वे किसी नेता, लेखक या पत्रकार की नजर से दूर क्यों रहे।
जाते हुए विजिटर बुक में टिप्पणी लिखी तो उन फोटोग्राफ्स की छोटी-छोटी कतरनों से सजा एक ब्रोशर भी साथ ले लिया। बाहर आकर रिक्शा किया। रास्ते में ब्रोशर देखते हुए नोट किया कि काफी फोटो उसी सड़क (जेएलएन मार्ग) से खींचे गए थे, जहां से मैं गुजर रहा था। `देवी मां की खंडित प्रतिमां, `खिलौने बेचते गरीब बच्चें, `सड़क किनारे का नजारां और भी बहुत कुछ जो एग्जिबिशिन में देखा था, उसी का लाइव टेलीकास्ट देख रहा था। रिक्शा अपनी गति से चल रहा था। घर पहुंचने में कुछ ही फासला था कि अचानक मेरी नजर रिक्शा चलाने वाले पर आकर ठहर गई। महज संयोग ही था कि जिस रिक्शा में मैं बैठा था, उसे चला रहे बूढ़े आदमी का फोटो भी एग्जिबिशिन में था। इसे क्लिक किया था सविता पारीक ने। ब्रोशर में फोटो छोटा था और पीछे से मैं उस आदमी की शक्ल भी ठीक से नहीं देख पा रहा था। रिक्शे से उतरा तो ब्रोशर दिखाते हुए पूछ ही लिया-`ये फोटो आपका है? जवाब मिला-`हां, काफी रोज पहले कुछ बच्चों ने खींचा तो था। यह फोटो था खूब बोझ ढोए हुए एक बूढ़े रिक्शा वाले का। कैप्शन लगा था-`रिटायरमेंट कब? मन हुआ कि उस बूढ़े आदमी से ही पूछ लूं कि उनका रिटायरमेंट कब, लेकिन मेरे किसी और सवाल का जवाब देने तक वे वहां से जा चुके थे। उन्होंने तो इस बात में भी दिलचस्पी नहीं दिखाई कि उनका फोटो कहां छपा है? दिलचस्पी होती भी क्यों, जहां पेट के लिए आदमी ही आदमी को ढोने पर मजबूर हो, वहां गरीब आदमी का रिटायरमेंट सांसें थमने पर ही होता है।
अपनी यही फीलिंग्स कल एक परिचित के साथ बांट रहा था। उसने एक ऐसी बात बताई कि आंखें नम हो गई। दोनों घटनाओं का पात्र एक बुजुर्ग रिक्शाचालक ही है। मेरे परिचित ने बताया कि कुछ साल पहले बीच सड़क एक रिक्शाचालक का शव मिला। उसके हाथ में दस रुपए का नोट था। अपने रिक्शा में किसी सवारी को ढोते हुए अचानक गश खाकर गिरे उस बूढ़े की सुध किसी ने नहीं ली। रिक्शा पर सवार आदमी ने भी उस बूढ़े के हाथ में किराया थमाया और चलता बना। शायद वो किसी गरीब का हक नहीं रखना चाहता था। बूढ़ा मरा है या सिर्फ बेहोश हुआ है, ये देखने की जहमत कौन उठाता। उस रिक्शाचालक की सांसें थम गई थी। यही उनके रिटायरमेंट का वक्त था और हाथ में दस रुपए का नोट उनकी पेंशन...।

Monday, March 30, 2009

लेडिज टेलर के सपने


काफी वक्त पहले का एक धारावाहिक तो याद ही होगा। नाम था-`मुंगेरीलाल के हसीन सपनें। इन दिनों मैं बना हूं मुंगेरीलाल। सपनों में हसीनाएं आती हैं पर सपने जरा भी हसीन नहीं हैं। सुना था कि दिन के सपने सच होते हैं। अगर सच में ऐसा है तो फिर मुझ जैसे नाइट ड्यूटी करने वालों के तो सभी सपने सच होने चाहिए! वैसे नाइट ड्यूटी वालों की हालत बड़ी खस्ता होती है। कुछ दिन पहले एक सहकर्मी अपना रोना रो रहे थे। ड्यूटी से फ्री होकर घर जाते हैं। सोते-सोते घड़ी की सुइयां चार बजे को पार कर जाती हैं। पत्नी से प्यारभरी बात शुरू करें, इससे पहले घर के सामने वाले मंदिर की घंटियां माहौल भक्तिमय कर देती हैं। उन जनाब की बात सुनकर सभी के चेहरे पर उन्हें सांत्वना देने के भाव उमड़ रहे थे पर किसी को हम कुंवारों का दर्द नहीं दिखा। भई बीवी-बच्चे न सही, लेकिन हमारे सिरदर्द के कारण और हैं। दूसरों की छोड़ूं और अपना दुखड़ा बयान करूं। बात हंसने की नहीं, रोने की है पर समझे कौन!
छोटे शहरों से आए मुझ जैसे लोगों को बड़े शहरों के घरों में तंग जगह बड़ी अखरती है। मेरे कमरे के पीछे वाले कमरे में एक लेडिज टेलर साहब रहते हैं। वैसे बहुत-से पुरुष लेडिज टेलर को देख आहें भरते हैं। बहुत-से पुरुषों का ड्रीम जॉब है लेडिज टेलर। बस किन्हीं कारणों से लेडिज टेलर नहीं बन पाए, लेकिन ख्वाहिशे पीछा छोड़ती हैं क्या! ऐसी ख्वाहिशे रखने वाले ये देख लें कि दूर के ढोल सुहावने ही होते हैं। बात लेडिज टेलर और सपनों से शुरू हुई थी। ड्यूटी से फ्री होकर घर जाता हूं। एफएम पर सुबह पांच बजे भजन आते हैं। उन्हें सुनते हुए ही अक्सर आंख लगती है। भक्ति में लीन हुई मेरी आंखें खुलती हैं सूट और ब्लाउज के झगड़ों से। दो-तीन घंटे की नींद के बाद कुछ हलचल-सी होती हैं। पीछे वाले लेडिज टेलर से कोई महिला लड़ने पहुंच जाती है। डायलॉग कुछ ऐसे होते हैं-
`बीस दिन हो गए, मेरा सूट नहीं सिला...परेशान हो गई चक्कर काटते-काटतें
`एडवांस पैसा लिया और ये क्या किया। ब्लाउज इतना टाइट...सत्यानाश हो गया मेरी नई साड़ी कां

और भी ऐसे बहुत-से डायलॉग, जिन्हें सुनकर आंखों के साथ-साथ कानों से आंसू आने लगें। रोज सुबह सूट-ब्लाउज के इस वाकयुद्ध से परेशान मैं बेचारा कभी कानों पर तकिया रखता हूं तो कभी बिना नींद पूरी किए ही उठ जाता हूं। अब कुछ दिन से एक नई मुसीबत शुरू हो गई है। मुझे सपने भी लेडिज टेलर और सूट-ब्लाउज के आने लगे हैं। सपनों में कभी लेडिज टेलर ही मैं होता हूं तो सूट लेने आई महिला के साथ आया उसका पति भी मैं। अब सपने हैं तो इन पर किसी का जोर थोड़े है। पति और टेलर दोनों की हालत बहुत खराब होती है। चिल्लाना महिला का काम होता है। चुपचाप खड़े रहना टेलर और पति का काम। वैसे अब यकीन होने लगा है कि सुबह के सपने सच होते हैं। क्या कहते हैं आप!

Sunday, March 22, 2009

लड़की होने का फायदा!


एक लड़की ने दूसरी से पूछा-तू अगले जन्म में लड़की होना चाहेगी या लड़का? जवाब मिला-लड़का। हम पर कितनी बंदिशें हैं। बाहर ना जाओ, ये ना पहनो, ये ना खाओ, ज्यादा मत हंसो, कम बोलो...उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। लड़का होने में बहुत मजा आता होगा ना?
इन बातों को सुनकर या पढ़कर एक बार चाहे हंसी आए पर ये छोटी-छोटी बातें गहरा दर्द लिए हैं।
लड़की होने का दर्द जो भी है पर कुछ रोज पहले मेरी क्लासमेट्स ने लड़की होने के खूब सारे फायदे गिना डाले। इन्हें सुनकर एक बार तो खुद पर तरस आने लगा।
फाइनल एग्जाम के लिए हमें प्रेक्टिकल तैयार करना था। लास्ट डेट थी 28 फरवरी। रातें जाग-जागकर ढाई-तीन महीने की मेहनत से अपन ने 25 फरवरी तक फाइल तैयार कर ली। राहत की सांस लेते हुए अपनी क्लास की लड़कियों से पूछा तो उनमें से ज्यादातर ने फाइल अभी शुरू भी नहीं की थी। हैरान था कि जिस काम में मुझे ढाई-तीन महीने लग गए, वह ये लड़कियां दो दिन में कैसे कर लेंगी। उन्हीं से पूछा तो पहला जवाब मिला-बॉयफ्रेंड को जिम्मेदारी सौंप दी है, वह किस दिन काम आएगा? कुछ भी करेगा पर 27 शाम तक फाइल तैयार होकर ला देगा।
दूसरी क्लासमेट का जवाब था-कैंटीन के कंप्यूटर सैंटर वाले से बात कर ली है। उसने टाइपिंग शुरू कर दी है। कल तक हो जाएगा।
मैं एक बार फिर हैरान। उसी कंप्यूटर वाले ने हताभर पहले क्लास के लड़कों को यह कहकर मना कर दिया था कि काम ज्यादा है, वो फाइलें तैयार नहीं कर पाएगा।
क्लासमेट को बताया तो जवाब मिला-तुम लड़कों को कंप्यूटर वाला मना कर सकता है पर मैं कहूं तो दो-चार फाइलें और तैयार करवा लाऊं।
वो कैसे?
लड़की होने का कुछ फायदा तो उठाना ही पड़ता है। जरा-सा हंसकर हिल-डुल कर बात करूंगी। वो समझेगा कि मुझ पर लट्टू हो रही है। काम हो जाएगा। उसके बाद तू कौन और मैं कौन? अपना काम बनता, ऐसी-तैसी करवाए जनता।
मैं बोला-देख, लड़की होने का यूं फायदा उठाना गलत बात है।
जवाब मिला-कुछ गलत नहीं है। कोई उल्टा काम थोड़े ना किया है। अगर हमारे हंसने, हिलने-डुलने से लड़के ज्यादा मेहनती और ज्यादा बेवकूफ बनते हैं तो फिर हंसने में कमी क्यों रखें।
मैं क्या बोलता? बात में दम तो है। लड़कियों के हंसनेभर से लड़के बेवकूफ बनते हैं तो गलती लड़कों की ही है। इसे इमोशनल अत्याचार कहें या कुछ और...।

Saturday, March 7, 2009

वो तो...रांड है!


शीर्षक पढ़कर प्लीज यह मत सोचिएगा कि कुछ अश्लील लिखा है। दरअसल शीर्षक कुछ और भी हो सकता था, लेकिन इन चंद शब्दों का असर जिन साहब पर चाहता हूं, उन्हें ब्लॉग-व्लॉग पढ़ने का शौक नहीं है। ब्लू फिल्मों की तरह कभी-कभार ब्लॉग पर कुछ `ब्लू´ पढ़ने को मिल जाए तो वे नजरें वहीं जमा लेते हैं। इससे पहले की मेरी पोस्ट (गुलाब ज्यादा बिके या कंडोम) भी वे शीर्षक पढ़कर ही पूरी चट कर गए पर अफसोस जैसा मसाला वे चाहते थे, उन्हें नहीं मिला। पिछली पोस्ट लिखकर एक बात तो महसूस हुई कि कंडोम जैसे शब्द लिखनेभर से आपको बहादुर और आधुनिक मान लिया जाता है। पिछली पोस्ट पढ़कर कई परिचितों के फोन आए। `जयपुर जाकर तू बहुत बोल्ड (बहादुर) हो गया है...´ ऐसे कमेंट देने वाला और कोई नहीं, वे ही लोग थे जो दिनभर में अनगिनत बार कंडोम, रांड (वेश्या) और मां...बहन... बोलते हैं। भगवान की दया से अपन को बात करते वक्त मां...बहन... करने की आदत नहीं। अफसोस है कि इस बात की तारीफ कभी किसी ने नहीं की। इतना जरूर सुनने को मिला-ये तो मर्दों की निशानी है। ...खैर छोडि़ए, गाली देकर मर्द बनना अपन के तो आज तक समझ नहीं आया।
बात शुरू हुई थी `वो तो...रांड है!´ अपन के पहचान वाले तो इस तकिया कलाम से ही समझ गए होंगे कि ये किन साहब की बात हो रही है। इन साहब को दुनिया की 99 प्रतिशत महिलाएं वेश्या नजर आती हैं। राह चलती 5 साल की बच्ची हो या 50 साल की महिला...इनकी आंखें बेशर्म होकर ही उठती हैं। करीब दो साल से मेरा इन साहब से परिचय है। इन दो साल में मुझे दो बार भी याद नहीं कि किसी महिला को देखकर इन्होंने उसे वेश्या ना बताया हो। महिला दिवस है तो उसकी तैयारियों में सभी व्यस्त थे। कई फोटोग्राफ सामने थे। मजदूर महिला, राजनीतिज्ञ, खिलाड़ी, ब्यूटिशियन...और भी न जाने कितने। परदे से लेकर खुले मुंह वाली महिलाओं सभी के लिए इन साहब का यही तकिया कलाम-ये तो रांड है...मैं जानता हूं इसे।
मुझे याद है एक बार एक ऐसे लड़के का इंटरव्यू किया था, जो लड़की के वेश में डांस और मॉडलिंग करता है। उसकी एक लाइन चौंकाने वाली थी कि `लड़की होना अपने आपमें चुनौतीभरा है।´ पुरुषों को शिकायत रहती है कि पुरुष दिवस क्यों नहीं मनाया जाता। उस लड़के की बात सभी पुरुषों का जवाब है। महिला होना चुनौतीभरा है, इसलिए महिला दिवस भी है। वे चाहे परदे में रहें, उंगलियां उठाने वाले बाज नहीं आते। बेशर्म हो आंख तो घूंघट व्यर्थ है। महिला दिवस की बधाई। नारीशक्ति को प्रणाम के साथ उन साहब से एक गुजारिश कि अपना तकिया कलाम छोड़ दें, क्योंकि हर औरत वेश्या नहीं होती। औरत मां, बहन, बेटी, पत्नी और भी बहुत खूबसूरत रिश्तों का नाम होती है।

Friday, February 13, 2009

गुलाब ज़्यादा बिके या कंडोम?


वेलेंटाइन्स-डे है तो विरोध के स्वर भी गूंजने लगे हैं। वेलेंटाइन्स समर्थक प्यार के विरोधियों का विरोध कर रहे हैं तो विरोधी यह कहकर विरोध जारी रखे हैं कि इससे भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुंच रहा है। दोनों में कौन सही और कौन गलत...ये तो थोड़ी दूर की बात है। अभी कुछ दिन पहले एक अखबार में पढ़ा था कि वेलेंटाइन्स-डे पर सिर्फ जयपुर में करोड़ों रुपए के गुलाब बिकेंगे। इसी बीच किसी ब्लॉग पर लेखक की चिंता भी पढ़ी कि ज़्यादातर लड़के-लड़कियांे के लिए यह दिन फिजिकल रिलेशन बनाने का बहानाभर है। शुक्रवार को डिनर के बाद टहलने निकले। एक साथी के सिर में दर्द था। मेडिकल स्टोर पर डिसप्रिन लेने पहुंचे, तभी दो लड़के जल्दबाजी में वहीं आए- दो पैकेट `कोहिनूर´ देना। दुकानदार ने कंडोम के पैकेट दिए तो दोनों इस जुमले के साथ निकल लिए-`हो गई वेलेंटाइन की तैयारी।´ उम्र में बहुत छोटे दिख रहे इन प्रेमियों के जाने के बाद अपन ने दुकानदार की चुटकी ली-`अंकल, बच्चों को भी कंडोम बेच रहे हैं?´ जवाब मिला-`इन दो दिनों में सब बिक गए। कल वेलेंटाइन्स-डे है। कंडोम का सीजन।´ ...खैर क्या करें? कुछ नहीं तो सिर्फ इतना जरूर करें कि ऐसों को `प्रेमी´ तो ना कहें, क्योंकि इश्क, मोहब्बत, प्यार, चाहत इसे समझने में उम्र बीत जाएगी।
सबमें रब दिखता है...
प्यार के मौसम में एक गाना खूब बज रहा है-`तुझमें रब दिखता है यारा मैं क्या करूं...।´ बात वेलेंटाइन्स-डे की चली है तो लगभग हफ्तेभर पुराना एक वाकया भी बता दूं। किसी काम से यूनिवçर्सटी जाना हुआ। वहां एफएम पर यही गाना बज रहा था। एक सहेली ने दूसरी से पूछा-`तुझे किसमें रब दिखता है?´ जवाब आया-`मुझे तो सबमें रब दिखता है। कोई स्मार्ट लड़का श्रीकृष्ण तो कोई गुरुनानक, कोई रामजी तो कोई भोले बाबा... लिस्ट बहुत लंबी है।´
...खैर यहां भी क्या कर सकते हैं। चमक-धमक टाइप लड़कियों के मुंह से और कुछ सुनें, इससे पहले अपुन ने मदर टेरेसा की लाइन पढ़ डाली-`हर इंसान में ईश्वर (रब) देखो, हर इनसान से प्यार करो।´ बशर्ते वो प्यार ही हो जनाब और कुछ नहीं। चलते-चलते इतना ही कि एक सर्वे भी करवा लिया जाए कि प्यार के महीने में गुलाब ज़्यादा बिके या फिर...।