Wednesday, October 22, 2008

मन की आंखें, उजला संसार


जरा-सी देर के लिए बिजली चली जाए तो हम बेचैन हो उठते हैं। किसी को अंधेरे से डर लगता है तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अंधेरे को अशुभ मानते हैं। बात दीपावली की हो तो इस उत्सव को मनाने के लिए पहली जरूरी चीज नजर आती है रोशनी। दीपावली में कुछ ही दिन बाकी हैं। बिजली की लडि़यों, दीयों, मोमबत्तियों आदि से इस दिन को रोशन करने की तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं। आपने कभी बिना रोशनी दीपावली की कल्पना की है? जरा सोचिए, इस दिन चारों ओर अंधेरा हो, कुछ भी दिखाई न दे। ...उफ, ऐसी कल्पना भी कितनी भयानक है, लेकिन बहुत-से बच्चे ऐसे भी हैं, जिनकी जिंदगी में अंधेरा पसरा है। हम लोग भले ही इन नेत्रहीन बच्चों से हमदर्दी का भाव रखें, लेकिन इन्हें ईश्वर से कोई शिकायत नहीं। ये बच्चे कहते हैं-`हमारे पास ऐसे बहुत-से कारण हैं, जिनसे हमारी दीपावली दिल से रोशन है। हम महसूस करते हैं दीयों की महक, फुलझडि़यों की आवाज और अपनों का प्यार।´आइए, आपको ले चलते हैं इन बच्चों की खास दुनिया में। इनका जहां आंखों से न सही, लेकिन दिल से इतना रोशन है कि हर तरफ सिर्फ मुस्कुराते चेहरे ही नजर आते हैं...


दीपावली यानी दीयों की कतार। चहुं ओर रोशनी का साम्राज्य। दीपावली एक ऐसा त्यौहार है, जब हर गली, हर घर, हर कोना रोशनी से जगमगाता नजर आता है। दीपावली त्यौहार है रोशनी का, लेकिन उनका क्या जिन्होंने कभी रोशनी नहीं देखी? नेत्रहीन बच्चों की दीपावली से जुड़ी भावनाएं साझा करने जब श्री जगदम्बा अंधविद्यालय (श्रीगंगानगर) पहुंचे तो महसूस किया कि इनकी आंखों में रोशनी नहीं, लेकिन सपने बहुत हैं। साथ ही उन सपनों को पूरा करने का ज़ज्बा भी भरपूर है।

हॉल में प्रवेश करते ही हारमोनियम और ढोलक का मधुर संगीत सुनाई देने लगा। यहां रामलीला की रिहर्सल हो रही थी। एक वक्त ऐसा भी था जब नेत्रहीन बच्चे रामलीला में सिर्फ संवाद बोलते थे। पिछले कुछ सालों से इन बच्चों ने कड़ी मेहनत कर न केवल रामलीला में अभिनय करना शुरू किया, बल्कि हारमोनियम व ढोलक जैसे वाद्ययंत्र बजाना सीखकर रामलीला को और अधिक प्रभावी भी बनाया।

नेत्रहीन बच्चों के प्रति दयादृष्टि रखने का भ्रम इन बच्चों से मिले जवाबों से जैसे टूटता चला गया। `रोशनी के बिना कैसी है आपकी दीपावली?´ 14 वर्षीय विजय ने इस पहले सवाल का जो जवाब दिया, उसे सुनकर इन बच्चों के प्रति किसी की भी सोच बदल जाए। मूलत: पिलानी निवासी विजय का पूरा नाम विजयकुमार ओला है। विजय का जवाब था-`हमारी दीपावली दिल से रोशन है। सभी लोग आंखें बंद कर भगवान के दर्शन करते हैं। ऐसा है तो फिर हम भगवान को हर पल निहार रहे हैं। एक प्रसंग सुनाता हूं। न्यूयॉर्क की एक प्रार्थना सभा में किसी ने स्वामी विवेकानंद से पूछा कि प्रकाश और अंधकार कहां हैं? स्वामीजी ने उत्तर दिया-आप बाहर जो भी देख रहे हैं, वो सारा अंधकार है। प्रकाश देखना चाहते हैं तो अपने भीतर देखो।´विजय का इतना गंभीर जवाब सुनकर जैसे कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं हुई, तभी विजय जोर से हंसा तो माहौल थोड़ा दोस्ताना हुआ। विजय ने पिछले साल रामलीला में हारमोनियम बजाया था, लेकिन मेहनत की तो इस साल उसे महामंत्री का किरदार मिला। विजय का भाई बिट्स का स्टूडेंट है। विजय को दीपावली का बेसब्री से इंतजार है। विजय कहता है-`सरसों के तेल से जलते दीयों की महक मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझे पटाखे छोड़ने का ज्यादा शौक नहीं है, लेकिन भाई के साथ शगुन के तौर पर कुछ पटाखे तो छोड़ता ही हूं।´

विजय के साथ बातचीत जारी थी कि तभी एक अट्टहास गूंजा-`हा...हा...हा...हे राम, तू मुझे क्या मारेगा।´ ये आवाज थी रामलीला में रावण का किरदार निभा रहे रामसिंह की। सूरतगढ़ निवासी रामसिंह की उम्र है सिर्फ 13 साल, लेकिन उसकी आवाज में इतना दम है कि बिना माइक के एक अट्टहास से पूरा हॉल गूंज उठा। रामसिंह का कहना है-`मुझे दीपावली से ज्यादा रक्षाबंधन का त्यौहार पसंद है। अपनी बहन से बहुत प्यार करता हूं। मेरी छोटी बहन को फुलझडि़यां बहुत अच्छी लगती हैं, इसीलिए दीपावली पर उसके लिए खूब सारी फुलझडि़यां खरीदूंगा। वो बताती है कि जलती फुलझडि़यों से निकलते सितारे बहुत खूबसूरत लगते हैं। मैंने कभी इन्हें देखा नहीं, लेकिन अपनी बहन की बातों से महसूस जरूर किया है।´`नाम रामसिंह, लेकिन किरदार रावण का क्यों?´ पूछने पर रामसिंह बोला-`सभी कहते हैं कि मैं रावण की तरह अट्टहास बहुत अच्छा करता हूं। वैसे ही ओमप्रकाश भगवान श्रीराम के संवाद बढ़िया बोलता है।´ रामसिंह की बात सुनकर पास में खड़े ओमप्रकाश ने मजाक किया-`देखा आपने, रावण पहली बार भगवान श्रीराम की तारीफ कर रहा है।´ (दोनों हंसने लगते हैं।)

ओमप्रकाश मेघवाल से जब दीपावली के मायने पूछे तो जवाब मिला-`प्लीज, हमारी दीपावली में दर्द न ढूँढिये। हम इस दिन खूब एंजॉय करते हैं। मेरा घर रावतसर में हैं। दीपावली की छुटि्टयों में वहां जाऊंगा तो अपने दोस्तों की बहुत याद आएगी। खास तौर पर सुरेन्द्र की। सुरेन्द्र मेरे छोटे भाई जैसा है और रामलीला में भी छोटे भाई लक्ष्मण का रोल कर रहा है।´ओमप्रकाश ने सुरेन्द्र से मिलवाया।

14 साल के सुरेन्द्र स्वामी ने पिछली बार रामलीला में सेनापति का किरदार निभाया था, लेकिन इस बार लक्ष्मण का रोल मिलने से वो बहुत खुश है। मूलत: सूरतगढ़ निवासी सुरेन्द्र को दीपावली पर होने वाला पटाखों का शोर बिलकुल पसंद नहीं है। सुरेन्द्र का कहना है- `दीपावली पर बमों की आवाज काफी डराने वाली होती है। दीपावली मुझे सिर्फ एक कारण से ही अच्छी लगती है। इस दिन नये-नये पकवान बनते हैं तो पूरे घर में खुशबू फैल जाती है। अगले दिन रामनवमी पर सभी रिश्तेदारों से मुलाकात होती है दिल खुश हो जाता है।´सुरेन्द्र से बातचीत जारी थी कि रामसिंह ने कुलवंत सिंह को आवाज दी। रामसिंह ने कुलवंत का परिचय कुछ यूं दिया-`आप भगवान श्रीराम के भाई से तो मिल लिए। अब मेरे यानी रावण के भाई से भी मिलिए।´

`रावण के भाई का किरदार निभाकर कैसा लग रहा है?´ गांव 9एमएल के निवासी कुलवंत का जवाब था-`शुक्र है मुझे कुंभकरण नहीं बनना पड़ा, वरना सोने के अलावा और कुछ नहीं कर पाता। मैं पिछली बार की तरह इस बार भी मेघनाद का रोल कर रहा हूँ। मेरा अट्टहास थोड़ा कमजोर है, वरना मैं भी रावण का रोल करता। कहते हैं कि अपने हाथों की लकीरों को क्या देखते हो, नसीब तो उनके भी होते हैं, जिनके हाथ नहीं होते। इसी तरह हमारे लिए भी दीपावली का अर्थ है। सभी लोग पूजा की शुरुआत ज्योति जगाकर करते हैं। हमारी जिंदगी में ज्योति नहीं तो क्या हुआ, पूजा तो हम भी पूरे श्रद्धा भाव से करते हैं।´

कुलवंत सिंह की बात जारी थी कि उसे रिहर्सल के लिए बुलावा आ गया। थोड़ी देर में आने का कहकर वो चला गया, लेकिन इन बच्चों की बातें सुनकर भावनाओं का ’वार कुछ ऐसा उठा कि आंसुओं की धार भी जैसे आंखों तक आकर रुक गई। इन बच्चों के मुस्कुराते चेहरे देख यूं लगा जैसे ये सभी पूरे सकारात्मक भाव से जीने का संदेश दे रहे हों। यहां बिताए कुछ घंटों से जैसे सीख मिली कि किस तरह अपनी कमजोरी पर जीत पाई जाती है। उन बच्चों के खयाल ताजा थे कि तभी कुछ बच्चे वहां आए और बोले-`चलिए, आपको फाइनल रिहर्सल दिखाते हैं।´जिसने भी रामलीला देखी, इन बच्चों की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। वाकई रामलीला में इन बच्चों की मेहनत की झलक साफ देखने को मिली। रिहर्सल खत्म हुई तो सभी बच्चों ने एक स्वर में दीपावली की शुभकामनाएं कुछ यूं दी-

दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली आई रे...

खुशी-खुशी सब हंसते आओ, आज दीवाली आई रे...

हाथ जोड़कर पूजा कर लो, खूब मिठाई खाओ रे...

आज पटाखे खूब छुड़ाओ, आज दीवाली आई रे...

2 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

बहुत बहुत बधाई आपको दीवाली के पर्व की... बहुत ही प्यारा लेख है

शिवराज गूजर. said...

हमारी दीपावली दिल से रोशन है। सभी लोग आंखें बंद कर भगवान के दर्शन करते हैं। ऐसा है तो फिर हम भगवान को हर पल निहार रहे हैं।
bahut hi badiya dilip bhai. deepawli ki hardik shubhkamnayen.
shivraj gujar