Monday, January 5, 2009

माँ, मैं और मौत!


कभी-कभी ज़िन्दगी में हम ऐसे दौर से गुज़रते हैं, जब सवाल तो बहुत सारे होते हैं, लेकिन उनका जवाब लाख कोशिशों बाद भी नही मिलता। ऐसा ही एक सवाल काफी वक्त से मुझे परेशान किए है। कुछ ख़ास लोगों को अपने दिल का हाल कहा तो जवाब में ख़ुद को पागल, सनकी और न जाने क्या-क्या सुनना पडा।
दरअसल मेरी माँ और मेरे बीच मौत के ख्याल से में डरने लगा हूँ। ऐसा एकदम से नही हुआ, बल्कि पिछले डेढ़ साल में मेरी ज़िन्दगी में हुई दो अलग-अलग घटनाओ से हुआ। मार्च 2००६ की बात है। एक नए शख्स से मेरी दोस्ती हुई। मेरे इस दोस्त की मम्मी को गुज़रे काफ़ी वक्त हो चुका है। जयपुर में अकेला था, इसलिए कभी-कभी इसी दोस्त के घर जाने लगा। पहली बार जब में अपने इस दोस्त के घर गया तो वहां माँ की कमी को मैंने दिल से महसूस किया। सब-कुछ होने के बावजूद वहां जैसे कुछ नही था। रात भर सो नही पाया। इक अजीब सा डर मुझे खाए जा रहा था। पता नही क्यूँ मेरा मन मुझे उस दोस्त की जगह ख़ुद को रखने के बारे में सोचने के लिए मजबूर करने लगा था। मेरी माँ मुझसे दूर हो जाए ...ऐसा सोचना ही मेरी आँखों में पानी ला देता है। भगवान् कभी मुझे ऐसा दिन न दिखाए। अब तो बस हर रोज़ पूजा में भगवान् से यही मांगने लगा था। दुआ करता था की मेरी माँ से पहले मुझे मौत मिले ताकि मुझे अपने दोस्त की जगह कभी होना ही न पड़े।
इसी डर के साथ ज़िन्दगी चल रही थी की मेरे मकान मालिक का ४० साल का बेटा चल बसा। उसके जाने का दुःख मुझे रत्ती भर भी नही था। आधी रात को उठकर अपनी माँ को गालियाँ देने वाले आदमी को तो मार देना चाहिये, लेकिन एक माँ के लिए उसकी औलाद कितनी अहमियत रखती है, ये दूसरो के लिए समझ पाना बहुत मुश्किल है। बेटा चला गया था लेकिन उसकी मौत वाली रात को भी दिए की कम होती लो उस माँ को बेचैन किए थी। उस माँ ने गरम दिया हाथ में लिया और उसे बुझने से बचा लिया। उस माँ की नज़र में एक अपशगुन होने से बच गया। कितनी अजीब बात है, मौत से बडा अपशगुन और क्या होगा? लेकिन ये माँ की भावना है और इसे एक माँ ही समझ सकती है। उस दिन के बाद मैंने एक माँ को रोज़ रोते हुए देखा। में भी आपका बेटा ही हूँ...जैसा दिलासा देने की हिम्मत भी में नही जुटा पाया।
कुछ दिन पहले में माँ के बिना ख़ुद के बारे में सोच कर डर जाता था, लेकिन बेटे के जाने के बाद उस माँ का हाल देखकर जैसे मैं ख़ुद से नफरत करने लगा था। मैं भगवान् से अपनी माँ से पहले ख़ुद की मौत मांगने लगा था, ताकि मुझे बिना माँ के होने वाली तकलीफ से न जूझना पड़े। ख़ुद के बारे में ही सोचा...भूल बैठा की उसके बाद माँ का क्या होगा? अब जब बेटे की मौत के बाद एक माँ का हाल देखा तो उस माँ की जगह अपनी माँ का ख्याल आते ही दिल कांप उठा।
आज भी मन अजीब असमंजस में है। पहले मौत किसकी होगी-माँ या मेरी...? हालाँकि जो होना है वो तो होकर रहेगा। मौत एक दिन आयेगी ही, लेकिन चाहकर भी ये बुरा ख्याल मन से निकाल नही पा रहा हूँ। जाने क्या होगा...काश, ऐसा हो की मेरी माँ और मेरी मौत की घड़ी एक हो, ताकि दोनों उस दर्द से बच जायें, जिसकी कल्पना भी इतनी भयानक है। काश ऐसा हो जाए...

6 comments:

Amit said...

बहुत अच्छा लगा पढ़ कर...

Dew said...

कहते है देवता भी माँ बनने के लिए तरसते है, तो सोचो माँ की महत्ता कितनी ऊपर है...
ये ख्याल हर उस बच्चे को आता है, जो माँ के प्रति समर्पित है, क्यूंकि...
माँ तू कितनी अच्छी है, प्यारी-प्यारी है, जग से दुलारी है..ओ माँ...ओ माँ.

P.N. Subramanian said...

माँ तो आख़िर माँ ही होती है. सबसे बुरी बात तो किसी माँ के सामने ही उसके नवजवान बेटे की मौत होती है.आदमी बहुत अधिक निर्भर रहना चाहता है. प्राणी जगत मे देखें. बच्चे कितने जल्दी स्वावलंबी बन कर स्वतंत्र हो जाते हैं. हमें उनसे सीखना चाहिए. आपकी माता दीर्घायु हो इसकी हम कामना करते हैं.

suhana said...

khuda aapki baat poori karega. aankhe nam kar di aapne.

Harkirat Haqeer said...

wah aaj kal ma pr bhot likha ja raha hai...abhi hind yugm pr ek kavita padh kr aa rahi hun ....lagta hai hmare bacche sudhane lage hain...BDHAI!

pari said...

भावुक हो उठा मन'