Friday, April 24, 2009

मैं वोट नहीं डालूँगा!


रात करीब एक बजे का वक्त होगा। काम से फ्री हुआ ही था कि मेरे एक कलीग ने आवाज दी-`आओ, कहीं चलकर आते हैं।' बिना कुछ कहे मैं उनके साथ हो लिया। सुबह से ही किसी बात पर मैं बहुत दुखी महसूस कर रहा था। उनकी बाइक के पीछे बैठा भी सैड सॉन्ग गुनगुना रहा था। दस-पंद्रह मिनट बाद जब उन्होंने बाइक जेकेलोन अस्पताल (जयपुर में बच्चों का प्रसिद्ध अस्पताल) की तरफ मोड़ी, तब जाकर ध्यान आया कि मैंने तो उनसे पूछा तक नहीं कि जाना कहां है?
अपनी धुन से बाहर आते हुए मैंने सवाल किया-`इतनी रात हम अस्पताल क्यों आए हैं...कौन एडमिट है?'
जवाब मिला-`भांजी बीमार है?'
मैंने फिर पूछा-`कितने साल की है और क्या हुआ?'
जवाब था-`साल नहीं, बस दो महीने की है। हार्ट प्रोब्लम है।'
इस जवाब के बाद भी मेरे मन में अपने दुख का खयाल चल रहा था। उनके पीछे-पीछे चलता रहा। जूते खोलकर हम आईसीयू रूम में दाखिल हुए। अंदर पहुंचते ही यूं महसूस हुआ कि यमराज यहां बैठे सोच रहे हैं कि पहले किसे अपने साथ ले जाएं। हर पलंग पर मशीनों से लैस बच्चे और उनके पास एक बड़ा। कुछ बच्चों के बैड के पास उनकी मां बैठी थी। मां बिना पलकें झपकाए एकटक अपने बच्चे को देख रही थी। हर सैकंड मशीनों की बीप की आवाज जैसे माहौल को और भी ज्यादा खौफनाक बना रही थी।
मेरे कलीग ने भांजी के बैड पर बैठे अपने पिता से कुछ बात की। इस बीच बच्ची कराहने लगी। उसके मुंह पर मशीन लगी थी। हाथों और पैरों पर भी पट्टीनुमा कोई चीज चिपकी थी। शरीर के लगभग हर अंग से कोई ट्यूब लगी थी। इतनी चीजों के बोझ से बच्ची खुलकर रो भी नहीं पा रही थी। ये सब देखकर जाने क्यों मन से खुद का दुख काफूर हो गया। जिन बातों से दिनभर से मैं खुद को दुनिया का सबसे बड़ा दुखी इनसान मान रहा था। वह सब इन चंद पलों में मैं भूल गया। रूम से बाहर निकले तो साथी ने बताया कि यहां आए पांच दिन हुए हैं। हर दिन कुछ बच्चों की यहां मौत हो जाती है। भांजी के इलाज पर तीन-चार लाख का खर्च बता रहे हैं। दिल्ली ले जाना पड़ेगा। इतना पैसा नहीं है...।
वो बोलते जा रहे थे और मैं आंखों से बह रहे आंसुओं को रोकने की असफल कोशिश कर रहा था। जूते पहने और हम बाहर आ गए। वापसी में रास्ते में आने वाली हर चीज से जैसे मैं बातें कर रहा था। चुनाव प्रचार के लिए लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स देख दुख हुआ। इन पर खर्च हुई मोटी रकम बहुत लोगों की जान बचा सकती थी। मन ही मन तय कि इस बार वोट नहीं डालूंगा। रुपए-पैसे न होने के कारण कोई अपने बच्चे की जान न बचाए पाए...। काश, कोई नेता ऐसा भी आता, जो वादा करता कि जीतने पर कम-से-कम चिकित्सा सुविधा को फ्री करेगा। अफसोस कि ऐसा झूठा वादा भी नेताओं की लिस्ट में नहीं है। चुनावों में जूते फेंकने का फैशन चल निकला है तो मन किया है कि राजनीति के हर आदमी पर जूता फेंकूं...अगले ही पल सोचने लगा कि इतने जूते लाऊंगा कहां से...। खैर...ईश्वर से प्रार्थना कि ऐसा दुख किसी को न दे। मन दुखी था और होर्डिंग्स देख गुस्सा भी आ रहा था, इसलिए जो मन में आया लिख डाला। कुछ कम ज्यादा हुआ हो तो माफी। काश, भगवान् मुझ गंदे बच्चे को तीन-चार लाख दे दें...उस बच्ची को मैं बच्चा सकूँ...
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अभी कुछ देर पहले सूचना मिली कि वो बच्ची नहीं रही...
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6 comments:

varsha said...

oh..tumne to hame bhi dravit kar diya.

संदीप शर्मा said...

दीपू,
यहाँ पर चुनाव टिकट के लिए करोडों रूपये और फिर जीतने के लिए और लाखों खर्च करने पड़ते हैं.... (कभी टिकट के जुगाड़ में लगोगे तो पता चलेगा, कितना मुश्किल है चुनाव लड़ना). खैर जीतने के बाद पहले कर्जे पर लिए करोडों रूपये इकठ्ठे करने पड़ते हैं, एसा नहीं है की नेता देश सेवा नहीं करना चाहते, लेकिन उन्हें बाकी कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती, बेचारे क्या करें... फिर जब कमाई-धमाई करके देश सेवा का पूरा मानस बना लेते हैं, तो पता चलता है की पांच साल हो चुके हैं, और चुनाव आचार संहिता लागू हो चुकी है... बेचारे नेता क्या करें, चार लाख तो दूर किसी को सौ का पत्ता भी दे दिया तो अखबार वाले और आयोग वाले जीने देंगे उन्हें...

अब बात वोट की, तो देने तो जाना... रिटर्निंग ऑफिसर से मार्क भी लगवाना और पर्ची भी कटवाना, लेकिन साथ में एक रजिस्टर रखा होता है, उस पर "नो वोटिंग" लिखकर हस्ताक्षर कर देना.... वोटिंग हो जायेगी....

Nirmla Kapila said...

इस उम्र मे इतनी सेवा भवना देख कर खुशी हुई कि अब तुम अच्छे बच्चे बन गये हो घटना पढ कर आँखें नम हो गयी शुभकामनायें

Babli said...

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ की आपको मेरी शायरी पसंद आई!
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! आपने बहुत ही सुंदर लिखा है!

anupam mishra said...

आपकी इमोशनल फीलिंग्स की कद्र करता हूं...कहानी का दूसरा पक्ष एक तरफा है। क्योंकि नेता होते हैं समाज की सेवा के लिए। उन्हें हम और आप जैसे ही लोग चुनकर सत्ता की मलाई चाटने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन ये हमारे ऊपर ही निर्भर करता है कि किन लोगों को सत्ता की मलाई चाटने का अवसर दिया जाए। और हां आपके वोट की कीमत बहुत है

pradeep said...

duniya mai kitana gam hai mera gam kitana kam hai
auro ka gam dekha to mai apana gam bhul gaya