
बेटे की बाट जोहती एक मां की सच्ची कहानी, जिसे हालात ने पेटजाए से इतना दूर कर दिया कि अब उन आंखों में इंतजार कम आंसू ज्यादा हैं।
जसप्रीत कौर। उम्र 32 साल। उन अभागी बहुओं में से एक, जिन्हें ससुराल में सुख नसीब नहीं होता। 2 जुलाई, 1999 शुक्रवार के दिन मैंने एक बेटे को जन्म दिया। वैसे तो शादी के बाद का कोई दिन मुझे याद नहीं, जो बिना रोए गुजरा हो पर इस दिन मेरी आंखों में खुशी के आंसू थे। कुछ लोग सोचते हैं कि गरीब की बेटियों के भाग्य में ही दुख होते हैं पर शादी में एक करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी मेरे हिस्से में खुशी नहीं आई।बेटा होने के बाद जिंदगी में खुशी की उम्मीद जागी थी पर यह सिर्फ उम्मीद ही रही। पापा भी मेरे दुख में ही चल बसे। बेशुमार पैसा होने के बावजूद मेरा बेटा बबलू छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसता रहता। मायके से आए खिलौने, कपड़े भी ससुराल वाले यह कहकर उसे नहीं देते थे कि इनमें टोना-टोटका है। चार साल गुजर गए। बबलू का एडमिशन सरकारी स्कूल में करवा दिया गया। किसी अच्छे स्कूल में एडमिशन के लिए जब मैंने बात की तो यही कहा गया कि पढ़-लिख कर कौन-सा डॉक्टर बनना है, संभालनी तो खेतीबाड़ी ही है। उसके भविष्य की परवाह किसी को भी नहीं थी। शराब-कबाब पर घर में रोज काफी पैसा खर्च होता पर बबलू और मेरे लिए दो वक्त की रोटी के अलावा कुछ नहीं था। पांच साल से ज्यादा का हो चुका बबलू पढ़ने-लिखने के नाम पर कुछ भी नहीं सीख पाया था। दूसरे बच्चे जब अपनी मां को अंग्रेजी में कविता सुनाते तो मन में एक डर-सा उठता कि कल जब बबलू अपने दोस्तों से पिछड़ जाएगा तो मैं उसे क्या जवाब दूंगी। बबलू के भविष्य के बारे में सोचकर मैं मायके आ गई और एक कॉन्वेंट स्कूल में उसका एडमिशन करवा दिया। दिन हफ्ते और हफ्ते महीनों में बदल गए पर ससुराल से कोई फोन, कोई संदेशा नहीं आया। हालांकि मायके रहने में कोई दिक्कत नहीं थी पर लोग जब मेरी मां से पूछते कि दो महीने हो गए, बेटी मायके क्यों बैठी है...वो परेशान हो जाती थीं। मुझे मायके आए छह महीने होने को थे कि एक दिन अचानक ये आए। बीती बातें भूलकर मेरी मां, भाभी और मैंने इनका सत्कार किया। बबलू कुछ देर बाद स्कूल से आया तो `डैडी´ कहकर इनके गले लग गया। बबलू के `डैडी´ बोलते ही वह भड़क गए-`बना दिया मेरे बेटे को अंग्रेज। मैं अपने बच्चे को लेने आया हूं।´ यह सुनकर मैं सुन्न खड़ी रह गई। मन में जो खुशी थी कि इन्हें मेरी याद आई, सब आंसुओं में बह गई। सवाल बबलू के भविष्य का था। दिल पर पत्थर रखकर मैंने अपना फैसला सुना दिया-`बबलू तभी जाएगा, अगर अच्छे स्कूल में पढ़ेगा।´मेरी बात सुनकर वह बोले-`बबलू वहीं पढ़ेगा, जहां मैं पढ़ा हूं।´ शादी के इतने सालों में मैंने पहली बार इनसे ऊंची आवाज में बात की-`यही बात है तो ना बबलू आपके साथ जाएगा और ना मैं।´इतना सुनना था कि इन्होंने बबलू को गोद से नीचे उतारा और बोले-`ठीक है तो संभाल मेरे बिना ही बबलू को।´ अपनी बात कहकर वह बाहर की ओर चल दिए। कोई कुछ सोचता इससे पहले वह वापस आए और चारपाई पर लेट गए। कुछ पूछने-बताने का मौका किसी को नहीं मिला। सब-कुछ खत्म हो चुका था। इन्होंने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी। जिस आदमी के दिल में मेरे लिए प्यार या रहम नाम की कोई चीज नहीं थी, पता नहीं क्यों उसकी मौत ने मुझे बेसुध कर दिया। कुछ घंटे बाद जब मैं होश में आई तो माहौल और भी ज्यादा भयावह हो चुका था। मेरे ससुराल वाले पुलिस के साथ पहुंच चुके थे। मेरी मां, भैया-भाभी और मुझ पर उनके कत्ल का इल्जाम लगाया गया था। पुलिस स्टेशन में मेरे परिवार ने एक रात काटी। अपने पति के अंतिम संस्कार में भी मैं शामिल नहीं हो सकी। सुबह तक काफी रिश्तेदार कोर्ट पहुंच गए। बच्चों को देखते हुए मेरी भाभी और मुझे जमानत मिल गई। तारीख पर तारीख पड़ने लगी। मां को भी जमानत मिल गई पर भाई अभी हिरासत में था। बडे़-बूढों ने पंचायत में मेरे ससुराल वालों पर केस वापस लेने के लिए दबाव डाला। बहुत समझाइश के बाद वो लोग केस वापस लेने के लिए राजी तो हो गए, लेकिन इसके लिए उन्होंने एक शर्त रखी। यही वह शर्त थी, जिसने मुझे उम्रभर के लिए आंसू दे दिए। ससुराल वाले केस वापस लेने के लिए इस बात पर राजी हुए कि बबलू हमेशा के लिए उन्हें सौंप दिया जाए। साथ ही उन्होंने मेरे दस्तख्त भी चाहे कि मैं कभी बबलू से मिलने की कोशिश नहीं करूंगी। शर्त सुनकर मैं कांप गई थी। मैं अपने बबलू को खुद से दूर करने के लिए कतई राजी नहीं थी। मुझे केस लड़ना मंजूर था, क्योंकि जो जुर्म हमने किया ही नहीं था, उसकी इतनी बड़ी सजा क्यों...। मैं अपने फैसले पर कायम थी कि भाभी मेरी बाजू पकड़कर कमरे में ले गई। उसने मेरा हाथ बबलू के सिर पर रखकर कसम दी कि कुछ भी कर अपने भाई को जल्दी रिहा करवाऊं। अब तक बहन से बढ़कर साथ निभाने वाली भाभी मेरे आगे हाथ जोड़ रही थी। वो रोती हुई चीख-चीख कर कह रही थी-`तेरी जिंदगी तो बरबाद हो गई, अब मेरी जिंदगी बरबाद ना कर। अगर मेरे पति को सजा हो गई तो मेरी और मेरे बच्चों की जिंदगी बिखर जाएगी...।´ आंसू मेरी आंखों से भी नहीं रुक रहे थे। क्या करूं और क्या नहीं...कुछ तय कर पाती, इससे पहले भाभी ने मेरे पैर पकड़ लिए। भाभी का रोना मुझसे देखा नहीं गया। मैंने भाभी को वचन दे दिया कि जैसा वो चाहेंगी, वैसा ही होगा। बस फिर कुछ ही घंटे बाद वो लोग बबलू को लेने आ गए। मेरे आगे कुछ कागज किए गए, जो बिना पढ़े ही मैंने दस्तख्त कर दिए। बबलू मुझसे दूर हो रहा था, फिर उन कागजों में मैं क्या देखती। उस दिन के बाद कई बार मन किया कि मैं भी मर जाऊं पर बबलू के मिलने की एक उम्मीद अब भी मन के किसी कोने में जिंदा थी। हर वक्त बबलू के बारे में ही सोचती रहती। क्या उसे भी मां याद आती होगी। इसी तरह लगभग दो साल और बीत गए। एक दिन मां की तबियत बहुत खराब हो गई। पापा के जाने के बाद मां कभी ठीक नहीं रही पर अब मेरा दुख भी उसे अंदर ही अंदर जैसे खा रहा था। `पूरी उम्र अकेली कैसे काटेगी बेटी´, `वक्त बीत रहा है कुछ सोचते क्यों नहीं बेटी के बारे में...´ ऐसे सवालों के साथ कुछ रिश्तेदार मेरे लिए रिश्ते भी लेकर आने लगे। दोबारा शादी के बारे में मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। मां ने इस बारे में कहा पर मैंने साफ मना कर दिया।`मेरे बाद अकेली कहां जाएगी, पूरी उम्र भाई के पास रहना आसान नहीं है, ये दुनिया तुझे जीने नहीं देगी...´ मां बोलती जा रही थी। मैं वहां से उठकर अपने कमरे में आ गई। उस दिन खूब रोई। दो दिन बाद मुझे देखने कुछ लोग भी आ गए। मेरे चाचा मुझसे 22 साल बड़े आदमी का रिश्ता मेरे लिए लेकर आए थे। सब कुछ तय हो गया पर बलजीत (जिसका रिश्ता आया था) ने कहा-`एक बार लड़की से पूछ लो।´ बलजीत ने अकेले में मुझसे बात करने की इच्छा जताई। बलजीत जब कमरे में आए तो बोले-`मैं तुम्हारे बारे में सब-कुछ जानता हूं। मेरा यकीन करो मैं तुम्हें खुश रखूंगा। मेरे तीनों बच्चे विदेश में सैटल हैं। पहली दो पçत्नयों में से एक कैंसर और एक हार्ट अटैक से चल बसी। मैं पंजाब में अच्छे प्रशासनिक पद पर हूं। किसी चीज की कमी नहीं है पर अकेलापन दूर करने के लिए एक साथी की जरूरत है। जहां तक तुम्हारे बेटे बबलू का सवाल है...´बलजीत आगे कुछ कहते मैं रो पड़ी-`मेरे बबलू से एक बार मिलवा दो।´मेरी बात सुनकर बलजीत बोले-`मेरी बहुत पहुंच है, पैसा है, मैं वादा तो नहीं करता पर इतना यकीन दिला सकता हूं कि बबलू और तुम्हें मिलवाने की पूरी कोशिश कर सकता हूं। मुझमें भी दिल है और मैं तुम्हारा दर्द अच्छी तरह समझ सकता हूं।´चाचा जी अंदर आ गए। उन्होंने मुझे कहा-`बलजीत जी बहुत अच्छे आदमी है। तुझे बहुत खुश रखेंगे।´मैं हां तो नहीं करना चाहती थी पर उस वक्त ऐसा लगा, जैसे बबलू से मिलने की यही राह है। मैंने चाचा जी से सिर्फ इतना कहा-`जैसा आप ठीक समझें।´हफ्तेभर बाद एक सादे समारोह में मेरी शादी बलजीत से हो गई। आज सालभर से ज्यादा हो गया है बलजीत के साथ रहते हुए। बलजीत मेरी खुशी के लिए हर कोशिश करते हैं, लेकिन मेरा मन हमेशा बबलू के बारे में ही सोचता रहता है। एक बार बलजीत ने अपने कुछ आदमियों को बबलू के स्कूल भेजा था। उन्होंने बबलू से उसकी मां के बारे में पूछा तो बबलू का जवाब था-`मुझे नहीं मिलना मम्मी से। वो गंदी है। उसने नानी और मामा के साथ मिलकर मेरे पापा को मार दिया।´बबलू के मन में मेरे ससुराल वालों ने मेरे लिए इतनी नफरत भर दी कि वो मेरी शक्ल भी नहीं देखना चाहता। अब बस दिल में यही ख्वाहिश बची है कि बबलू से एक बार मिलकर उसकी सारी गलतफहमियां दूर कर दूं। कभी-कभी बहुत डर भी लगता है कि कहीं ये जिंदगी बबलू से मिले बिना ही खत्म ना हो जाए पर ईश्वर पर भरोसा भी है कि कोई ना कोई चमत्कार जरूर होगा। आज नहीं तो 20-25 साल बाद ही सही, जब बबलू मेरे सामने होगा, मेरी ममता उसे हर बात सच-सच समझा देगी। मैं उसे वो सारे तोहफे दिखाऊंगी, जो मैंने उसके हर जन्मदिन पर खरीदे हैं। उसे बता दूंगी कि मुझे विश्वास था कि मेरा बबलू एक न एक दिन मुझसे जरूर मिलेगा। जब वो मुझसे मिलेगा, उस खुशी के सामने जिंदगीभर के दुख छोटे पड़ जाएंगे। भगवान के आगे हाथ जोड़कर यही विनती है कि एक मां का विश्वास टूटने ना देना। बस एक बार मैं बबलू को गले से लगाकर जी-भरकर रो सकूं। उसे बता सकूं कि उसकी मां उसे कितना प्यार करती है...।
