Saturday, September 13, 2008

दिल्ली धमाकों में हिन्दी को 'शान्ति'


शनिवार दोपहर को अपनी किताबें सम्भाल रहा था की एक पुरानी डायरी हाथ लग गयी। धूल झाडी तो एक सूखा गुलाब उसमे से नीचे गिर गया। आमतोर पर ऐसा फिल्मो में होता है लेकिन आज मेरे साथ भी हो गया। ग़ज़ल तो नही बजी पर उस गुलाब को देने वाले का नाम सोचने के लिए दिमाग पर जोर डाला तो स्कूल के दिन ही याद आए। फिर सोचा की शायेद रात को सपने में ही गुलाब देने वाले का चेहरा नज़र आ जाए। ऐसी फिल्मी प्लानिंग शायेद दिमाग ने उस ग़ज़ल के शब्द सोचकर ही की - अब के बिछडे तो कभी ख्वाबों में मिले...कुछ सूखे हुए फूल किताबों में मिले...
शायेद रात को गुलाब देने वाले का हसीं ख्वाब आ भी जाता पर रात और उस ख्वाब से पहले तो अपनी दिल्ली को बुरी नज़र लग गयी।
{अभी मेरे पास भी एक बम फूटा। आधी रात को सब क्रिकेट खेलने में व्यस्त हैं। एक बिग बॉस (वो ख़ुद को समझते हैं) आए और बोले- भगवान् ने हाथ सिर्फ़ लिखने के लिए ही थोड़े दिए हैं, जाओ जाकर क्रिकेट खेलो। जी तो किया की उन्हें बोल दूँ की भगवान् ने मुंह दूसरो पर बेवजह टीका- टिप्पणी करने के लिए थोड़े दिया है, जिसका जो मन हो वो करे। खैर जाने दीजिये। क्रिकेट से तो अपनी दुश्मनी काफ़ी पुरानी है और वैसे भी कुछ लोग आदत से मजबूर होते हैं। }
बेवजह आए इस ब्रेक के लिए माफ़ी। बात हो रही थी गुलाब, ख्वाब और दिल्ली की। अब ये तो नींद के बाद ही पता चलेगा की ख्वाब किसका आता है? दिल्ली का या फिर गुलाब का... हो सकता है की हिन्दी का भी आ जाए, हिन्दी दिवस जो है। गुलाब वाली इस डायरी में लिखी एक कविता पढ़ी तो हँसी आ गयी। बचपन में हिन्दी दिवस पर हुई प्रतियोगिता में ये मैंने लिखी थी।
हिन्दी दिवस पर एक अखबार के ऑफिस में निर्णय हुआ की आज के दिन किसी ख़बर में कोई इंग्लिश का शब्द नही छापेगा । हालत ये हुई की लिखने वाले ज्यदटर रिपोर्टर शब्दकोष डॉट कोम खोलकर हिन्दी के शब्द खोजते नज़र आए। जो भी हो, यहाँ भी सब सजा के डर से हुआ और स्कूल में हमारे ज़माने में भी होता था और आज भी हो रहा है-हिन्दी में बात की तो मिलेगा डंडा... ये बात और है की इन स्कूलों में भी हिन्दी दिवस तो मनाया ही जाता है। हिन्दी की हालत ऐसे शायेद थी भी नही, साल में एक दिन श्रधा के फूल चढा- चढा केर, उस पर तरस दिलाते भाषण दे-देकर ये हालत कर दी गयी है। खैर इस बार तो हिन्दी सभी के तरस की भागी बन्ने से बच गयी। हिन्दी दिवस से एक दिन पहले हुए दिल्ली धमाकों में हिन्दी को 'शान्ति' मिल गयी। वो ऐसे की अब अखबार और सभी लोग दिल्ली धमाकों के निंदा प्रस्तावों में व्यस्त हो जायेंगे और इस कागजी (या फिर छपने की चाह ) संवेदनाओं में हिन्दी दिवस का मर्म कुछ दब जाएगा।

2 comments:

ज़ाकिर हुसैन said...

baat niklegi to phir door talak jayegi......
sach, aapne kmaal kar diya.
main khud bhi nahin soch pa raha ki us sukhe gulaab ke parti hamdardi jatauon, dhamakon ko lekar ninda prastawon ki bochhar karun ya hindi diwas ki subhkamnayen doon ( arthat santwana ki ye hi haal raha to aik din hindi ki punya tithi manaya karenge). achha laga aap ko padh kar

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

हिन्दी की स्थिति पर आपने अच्छा व्यंग्य किया है।