Wednesday, October 8, 2008

यकीन मानिए, ये लड़का है...


वो है तो लड़का, लेकिन जब लड़की बनकर स्टेज पर आता है तो तमाम प्रतिद्वंद्वी लड़कियों को भी पीछे छोड़ देता है। जब हम उसके घर पहुंचे तो कमरे में हर तरफ मोमेन्टो सजे हुए थे, दीवारें मैडल्स और सटिüफिकेट्स से अटी हुईं थीं। लगभग पांच मिनट बाद गगनदीप अरोरा कमरे में आया तो एक बार आंखों को उसके लड़की होने का धोखा हुआ। तभी उसने कुछ एलबम सामने रख दिए। एलबम में एक से बढ़कर एक फोटो थे। ट्रेडिशनल लुक से लेकर वेस्टनü लुक तक में गगन एकदम परफेक्ट दिख रहा था। इंटरव्यू शुरू करते इससे पहले गगन की मम्मी चाय लेकर आ गईं। चाय रखकर उन्होंने अलमारी से कुछ ड्रेसेज और ’वैलरी निकाली और बताया कि ये गगन ने खुद डिजाइन की हैं। गगन की फाइल में न्यूज पेपर्स की बहुत-सी कटिंग्स देखी। सिंगर गुरदास मान, शान, कॉमेडियन जसपाल भट्टी, ख्याली सहारण, एक्ट्रेस रवीना टंडन, उमिüला मातोंडकर, एक्टर आर्यन वैद्य, प्रियांशु जैसी बहुत-सी सेलिब्रिटीज के साथ वो शो कर चुका है। मिस फोटोजेनिक, बेस्ट कैटवॉक, बेस्ट मेकअप, बेस्ट एक्ट्रेस जैसे कई अवॉर्ड उसके हिस्से में आ चुके हैं। आखिर एक लड़के का एक लड़की के रूप में कैसा है सफर। जानते हैं खुद गगन से...


भूल गया मैं लड़की हूं...


मुझे अच्छी तरह याद है, तब मेरी उम्र करीब सात-आठ साल रही होगी। स्कूल के वार्षिकोत्सव की तैयारियां लगभग पूरी थी कि क्लास की गल्र्स ने टीचर से कहा कि वे किसी कल्चरल एçक्टविटीज में हिस्सा नहीं लेंगी। कारण हर बार की तरह इस बार भी वही था। स्कूल के लड़के उन पर फçब्तयां कसते थे, मजाक उड़ाते थे और हद तो तब हो जाती, जब छोटी लड़कियों से भी छेड़छाड़ होती। मुझे कल्चरल प्रोग्राम्स का बहुत शौक था, इसलिए मैं चाहता था कि फंक्शन जरूर हो और लड़कियां भी इसमें पाटिüसिपेट जरूर करें। किसी तरह अपनी क्लास की आठ लड़कियों को मैंने प्रोग्राम के लिए राजी किया। लड़कियां कम थीं, इसलिए मैंने भी उनके साथ एक डांस में लड़की बनने का फैसला किया। डांस के बाद सभी लड़कियों के साथ स्टेज पर प्राइज लेने जा रहा था कि लड़कों ने उल्टी-सीधी हरकतें शुरू कर दीं। मैंने देखा, हमारे ग्रुप की लड़की का हाथ एक लड़के ने पकड़ रखा था। पता नहीं उस समय मुझे क्या हुआ और मैंने जाकर उस लड़के की जबरदस्त धुनाई कर दी। गुस्से में मैं यह भी भूल गया कि मैं लड़की के गेटअप में हूं। टीचर ने हमें छुड़वाया और वे मुझे एक तरफ ले गईं। अगले कई दिन तक वो लड़का स्कूल नहीं आया। लड़कियां बहुत खुश थीं, क्योंकि उनसे बेहूदा हरकतें करने वाले लड़के अब उनसे डरने लगे थे।


मां से हिम्मत, पिता से आशीर्वाद...


मैं डर रहा था कि यह बात घर पर मालूम चली तो बहुत पिटाई होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डांस में मुझे फस्र्ट प्राइज मिला। प्रिंसीपल ने मेरी मम्मी के सामने मेरी तारीफ की तो उन्हें बहुत खुशी हुई। पापा ने भी आशीर्वाद दिया। हमारी फैमिली छोटे शहर में रहती आई है। बचपन में कई बार देखा कि गली की कोई बहू अपने ससुरालियों से पिट रही होती तो मम्मी मोहल्ले वालों की तरह तमाशबीन नहीं बनती थीं। बहुत बार उन्होंने ऐसे लोगों को सबक भी सिखाया। जब पुरुष खड़े तमाशा देखते रहते थे, तब मम्मी की हिम्मत देख मेरी हिम्मत भी बढ़ी।लोगों का काम है कहना...लगभग 15 साल से मैं लड़की बनकर परफॉमेZस दे रहा हूं। जहां लोगों को मालूम होता है कि मैं लड़का हूं, वहां तरह-तरह की बातें की जाती हैं, सोचा जाता है कि मैं होमो (समलैंगिक) हूं, लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं। मैं जानता हूं कि मैं जो कर रहा हूं, उसमें कुछ भी गलत नहीं। मुझमें टैलेंट है कि मैं ड्रेस डिजाइनिंग, ’वैलरी डिजाइनिंग, डांस, मॉडलिंग सब कर सकता हूं, फिर लड़की बनकर ये सब करना हर किसी के बस की बात नहीं।


लड़की बनकर जुटाई चैरिटी...


चैरिटी शो की शुरुआत मैंने कब की, मुझे खुद याद नहीं। गुजरात भूकंप, सुनामी जैसी आपदाओं के समय मैंने ग्रुप के साथ शो कर सहायता राशि इकट्ठी कर सरकारी राहत कोष में जमा करवाई है। राजस्थान ही नहीं, पंजाब, हरियाणा व यूपी में भी चैरिटी शो कर चुका हूं। कई बार हम लड़के मिलकर सहायता राशि इकट्ठी करने जाते तो कुछ खास नहीं जुटा पाते, वहीं जब भी लड़की बनकर मैंने राखी सावंत जैसे लटके-झटके वाले आइटम डांस किए तो सहायता राशि उम्मीद से कहीं गुना बढ़ जाती थी।


बेस्ट फोटोजेनिक अवॉर्ड...


मुझे कभी मेकअपमैन की जरूरत महसूस नहीं हुई। अभी दिसम्बर में चंडीगढ़ में मैंने 80 लड़कियों में से टॉप-10 में आकर मिस फोटोजेनिक और बेस्ट मेकअप का अवॉर्ड जीता। रोहतक में बेस्ट आइज, बेस्ट लुक अवॉर्ड मुझे मिल चुके हैं। दरअसल, किसी दूसरे से मेकअप करवाकर मैं सेटिस्फाई नहीं हो पाता। कभी-कभी तो दूसरी मॉडल्स मेकअपमैन से मेकअप करवाने के बाद मुझसे ही पूछती हैं-टि्रपल कलर लिपçस्टक कैसे लगाई, डॉलफिन टैटू कैसे बनाया...। मुझे पालüर जाना पसंद नहीं है। यहां तक कि अपनी थ्रेडिंग तक भी मैं खुद ही बना लेता हूं।


नहीं बनना ऐसा मर्द...


बहुत बार लोगों को मालूम नहीं होता कि मैं लड़का हूं। ऐसे में मैंने लड़कियों को होने वाली परेशानियां महसूस की हैं। मैं लड़की तो नहीं हूं पर इतना कह सकता हूं कि लड़की होना अपने आप में चुनौती भरा है। हर वक्त कोई न कोई नजर आपको घूरती रहती है। चौबिसों घंटे आप इनसिक्योर फील करते हैं। लड़कियों में चाहे जितनी भी प्रतिभा हो, उन्हें काçस्टंग काउच जैसी समस्याओं से रूबरू होना ही पड़ता है। बहुत दुख होता है कि खुद को मर्द कहलाने के लिए वे भद्दे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, लड़कियों पर फçब्तयां कसी जाती हैं और उन्हें छूने का मौका ढूंढा जाता है। अगर मर्द होने के लिए यही गुण होने चाहिएं तो मुझे ऐसा मर्द नहीं बनना। महिलाएं पुरुषों से कहीं बेहतर हैं। उनमें इमोशन हैं, वे सेंसेटिव हैं और खुद से पहले दूसरों के बारे में सोचती हैं। पुरुषों को भी चाहिए कि ऐसे विनम्र वे भी बनें।


और उसे प्यार हो गया...


डांस मेरा पैशन है और मॉडलिंग प्रोफेशन। पिछले दो साल से मैं चंडीगढ़ में रह रहा हूं। कई म्यूजिक एलबम्स में मॉडलिंग कर चुका हूं। कई धामिüक एलबम्स में भी काम किया है। लिटिल चैम्प्स फेम पावनी पांडे को भी डांस सिखा चुका हूं और टेली फिल्मों के लिए कोरियोग्राफी भी की है। शो के लिए अब तक बहुत-से शहरों में गया। इस दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए। एक बार शो के बाद पैकिंग की तैयारी में था कि एक लड़का हाथ में फूल और बॉक्स लेकर आया और बोला-`आय लव यू, शादी करूंगा तो सिर्फ तुमसे।´ मैं कुछ कहता, इससे पहले सिक्योरिटी ने उस बाहर निकाल दिया। उस वक्त मेरी जो हालत हुई, मैं बता नहीं सकता। शो के दौरान फें्रडशिप के प्रपोजल तो बहुत मिलते हैं, लेकिन ऐसी दीवानगी मैंने पहली बार देखी थी। अब भी बहुत-से कॉल्स और लेटर्स आते हैं पर क्या करूं, मुझे कुछ समझ नहीं आता।


बेगम की क्या मजाल...


बहुत दुख होता है जब इतनी खूबियां होने के बाद भी आगे बढ़ने में रुकावटें आती हैं। पिछले काफी दिनों से मीडिया की नजरें पाकिस्तानी कलाकार बेगम नवाजिश अली पर टिकी हैं। बहुत बार मुझे सिर्फ इस कारण शो नहीं मिले, क्योंकि ऑगेüनाइजर जानते थे कि मैं लड़का हूं। विदेशी प्रतिभा को सभी सर-आंखों पर बिठाने को तैयार हैं, फिर ऐसा क्यों? बेगम की क्या मजाल कि वो डांस, मॉडलिंग, एçक्टंग, डिजायनिंग सब-कुछ एकसाथ कर सकें। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मौका मिले तो मैं उनसे कई गुना बेहतर परफॉमेZस दे सकता हूं। आखिर कब तक मैं घर की मुगीü दाल बराबर बना रहूंगा।


(30 जनवरी-2008 को जब डेली न्यूज की बुधवारीय पत्रिका `खुशबू´ में मेरी ये स्टोरी प्रकाशित हुई तो दिनभर फोन की घंटी बजती रही। हर कोई गगन से मिलना चाहता था। जब मैंने गगन का इंटरव्यू किया, तब गगन से ’यादा उसकी मम्मी उत्साहित नजर आ रही थीं। कुछ टीवी चैनल्स वालों के भी फोन आए, लेकिन गगन को इंटरव्यू छपने की कोई खुशी नहीं थी। बुधवार को इंटरव्यू प्रकाशित हुआ और उससे ठीक एक रात पहले (29 जनवरी) को एक सड़क दुर्घटना में गगन की मम्मी का देहांत हो गया। ताउम्र दुख रहेगा कि वो ये इंटरव्यू नहीं देख सकीं।)

2 comments:

अनूप शुक्ल said...

इंटरव्यू पढ़कर अच्छा लगा लेकिन गगन की मम्मी के बारे में जानकर दुख हुआ।

दर्द-ए-दर्द said...

बहुत सुखद परन्तु घोर दुखद साक्षात्कार