Friday, June 26, 2009

अमर प्रेम की गजब कहानी...


मेरी पहचान का एक शख्स अपने प्रेम को 'अमर प्रेम´ कहता है। साथ पढ़ने वाली एक लड़की प्यार को सिर्फ टाइमपास बताती है। एक वरिष्ठ प्रेम को खुदा का दूजा रूप मानती हैं। ऐसे लोग भी देखे हैं, जो तू नहीं कोई और सही...पर चलते हैं। खुद की बात करूं तो अपने जीवन के तेइस बरसों में हर रोज प्रेम को अलग रूप में देखा है। अभी-अभी एक खबर सुनी कि मेरे शहर (श्रीगंगानगर) की उस लड़की ने दम तोड़ दिया, जिस पर कुछ रोज पहले उसके इकतरफे प्रेमी ने तेजाब फेंक दिया था। कितने ऐसे किस्से आए रोज सुनने को मिलते हैं। 'मैं तुम्हे भूल जाऊं, ये हो नहीं सकता और तुम मुझे भूल जाओ, ये मैं होने नहीं दूंगा...´ एक फिल्मी डायलॉग जबान पर है। क्यों भई, जबरदस्ती है क्या।
बहुत छोटा था, तब यही मानता था कि मां-बाप के अलावा किसी से प्रेम हो ही नहीं सकता। कुछ बड़ा हुआ। फिल्मी प्रेम को महज काल्पनिक माना। फिल्में देख खूब हंसता था कि यूं भी भला कोई किसी एक के लिए दुनिया भुलाने की बात कर सकता है। कुछ और बड़ा हुआ तो प्रेमी परिंदों को देख महसूस हुआ कि फिल्मी किस्से हकीकत में भी होते हैं। खुद को पहला प्यार हुआ तो बहुत मीठा एहसास लगा। प्यार में असफल रहा तो यही प्यार जहर लगने लगा। सोच लिया कि अब किसी से दिल नहीं लगाना। कुछ मजबूरियां और जरूरतें घर से दूर बड़े शहरों में खींच लाई। यहां तो प्रेमी जोड़े इस तरह घूमते नजर आए, जैसे छोटे शहरों में इतवार को सब्जी मंडी में लगी भीड़। बड़े शहरों के लोगों से संपर्क हुआ। उनके प्रेम के किस्से सुने। 'अमर प्रेम´ कहने वाले शख्स का प्यार एक नहीं, दो नहीं, लंबी चेन के साथ बारी-बारी प्रेम रूपी पींगें झूल रहा था। प्रेमी-प्रेमिका का रोना-धोना, घूमना-फिरना, खाना-पीना सब तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार जारी था ही। अमर प्रेम की ऐसी गजब कहानियां देख अच्छा नहीं लगा। अब तक मैं पार्ट लाइम और फुल टाइम लवर का ट्रेंड भी देख चुका था। बहुत-से लोग लव मैरिज की ख्वाहिश रखते हैं। मैं भी उनमें एक था। हालत ये हुई कि किसी ने दो रोज हंसकर बात कर ली, मुझे उसी के ख्वाब आने लगते। किसी को आज तक कह नहीं सका और अब तक जिनसे हंसमुख बातचीत है, ऐसा लगता है कि उन्हें मुझसे प्यार है, लेकिन मेरे मुंह से कहलवाने की चाह है। इजहार का क्या है, मैं खुद ही कर दूं, लेकिन उनके दिल की बात जानूं कैसे! कई बार तो अपने बड़बोले व्यवहार के कारण भरी महफ़िल में साफ़-साफ़ कह भी दिया-'कोई भी मुझसे दो दिन ढंग से बात करे तो तीसरे दिन थोडा लडाई-झगडा कर मेरा भ्रम तोड़ दे कि ये मोहब्बत नहीं है...'
प्यार क्या है, इस सवाल के जवाब में कई किताबें पढ़ डाली। बहुत लोगों से पूछ डाला। आखिर में इसी परिणाम पर पहुंचा कि जहां विश्वास टूटने की गुंजाइश नहीं, किसी के आंसुओं का कारण बनना नहीं, भरपूर समर्पण भाव...शायद यही प्यार है। फिर भी मैं तो अब तक कन्फ्यूज हूं। अब तक का निचोड़ यही कि अपने तो अपने होते हैं...बाकी आप यार-दोस्त, सगे-संबंधियों, जानने-पहचानने वालों के लिए लाख अपनापन दिखा दो, जान लुटा दो, मिलती ठोकर ही है...खैर, कोई बताने वाला हो तो बता दे कि ये प्रेम होती क्या बलां है...
चलते-चलते कुछ लाईने अर्ज हैं...लिखने वाले का नाम नहीं जानता, लेकिन लिखा बहुत खूब इसलिए सलाम करता हूँ...
पता नहीं क्यूँ उसके वादे पर करार रहा,
वो झूठा था पर उसपे मुझे ऐतबार रहा!
दिन-भर मेहनत ने मुझे दम ना लेने दिया
और फिर रात भर दर्द मुझसे बेहाल रहा!

7 comments:

अनिल कान्त : said...

वाह गुरु वाह

DUSHYANT said...

जीओ बरखुरदार ..... दुआ करूंगा कि किसी दिन रंगों और मौसमों की सच्ची और मुकम्मल पहचान हो जाये...जिस दिन होगा उस दिन परिभाषा नहीं पूछोगे .....और गुजरने के बाद खुदा न करे जिसकी कसक रहती है चाहे रिश्ता किसी भी हद तक बुरी तरह क्यों न ख़त्म हुआ हो...तुम्हारी जिन्दगी प्यार खुशबू से लबरेज हो..आमीन....

varsha said...

tumhari umra shayad aise hi confusion ki hai.michael jackson ne kaha hai..."if u enter this world knowing u r loved and u leave this world knowing d same, then everything that happens in between can b dealt with "
prem bada falak hai..

www.जीवन के अनुभव said...

baakai achchhi post. sach maine bhi bade shharo mai prem ka bigadata rup dekha hai. aakrshan kabhi prem nahi ho sakta prem to aapke saath janm se hi rahata hai ek maa apane prem se vivash hokar hi apane sundary se samjhauta kar bachchhe ko janm deti hai.

garima said...

समझ नहीं आ रहा की क्या लिखूं एक तो तुम हो ही इतने क्यूट और तुम्हारे व्रितयूप पढ़ते समयतुम्हारी शरारतें और याद आती हैं तो लेख पढने का मज़ा ही कुछ और होता है लगता है हम पढ़ नहीं रहे बल्कि तुम कुढ़ कोई बात बता रहे हो ...तुम बहुत आचे और फमोउस राईटर बनाने की क्षमता रखते हो बस आपनी मजिल की ओर बढ़ते रहो हम और हमारी शुभकामना हमेशा तुम्हारे साथ हैं भगवन तुम्हे आशीर्वाद दे

somadri said...

Today I begin to understand what love must be, if it exists. When we are parted, we each feel the lack of the other half of ourselves. We are incomplete like a book in two volumes of which the first has been lost. That is what I imagine love to be: incompleteness in absence." -Goncourt

raj said...

prem dono taraf ho to maza hai...ek taraf ho to saza hai....post boht achhi hai...