Thursday, July 2, 2009

मैं सुधर गई हूं!


मेरे एक सहकर्मी की कॉलर ट्यून सुनिए-'आज की ताजा खबर...आओ काका जी इधर, आओ मामाजी इधर...ले लो दुनिया की खबर...´
'सन ऑफ इंडिया´ फिल्म का यह गाना पत्रकारों की कॉलर ट्यून के लिए एकदम फिट है। अखबार में काम करने वाला हर श�स (पत्रकार भी और गैर-पत्रकार भी) दुनिया की नजर में पत्रकार ही होता है। कोई मिलता है तो 'हाय-हैलो´ की जगह ताजा खबर पूछता ही दिखता है।
वैसे आज की ताजा खबर तो सभी को मालूम ही है। भारत में समलैंगिकों को कोर्ट की मंजूरी से कुछ पत्रकारों को भी मुसीबत झेलनी पड़ी। मेट्रो सिटिज को छोड़ें तो छोटे शहरों में ऐसे विषयों पर खबर लिखने वाले को भी तीखी नजरों का सामना करना पड़ता है। लगभग दो साल पहले लेस्बियन पर स्टोरी के दौरान मैंने एक समलैंगिक लड़की का फोटो सहित इंटरव्यू किया था। आज जैसे ही इसी टॉपिक पर खबर के आदेश हुए, सभी की नजर अपन की ओर दौड़ी। 'यार, कोई समलैंगिक का नंबर दो...´ पहले तो मैं सकपकाया, फिर दो साल पुरानी बात भी याद आई। तब कोम्प्लिमेंट कम और कमेंट ज्यादा मिले थे। खैर...उसी लेस्बियन लड़की को फोन घुमाया, जिसका इंटरव्यू किया था। ताजा खबर सुनाई तो उसके मुंह से निकला-'वाउ...´। मैंने कहा, इंटरव्यू दोगी? जवाब मिला-नहीं, अब तो मैं सुधर चुकी हूं। लड़कों में इंट्रेस्ट लेना भी शुरू कर दिया है।
'सुधर गई हूं´ जवाब सुनकर यह एहसास तो हुआ कि कहीं-न-कहीं ये लोग भी स्वीकार तो करते हैं कि समलैंगिता 'बिगड़ेपन´ की निशानी है। टाइम थोड़ा आगे बढ़ा। हमारी रिपोर्टर ने इसी टाइप की एक और लड़की को फोन घुमाया। उसने उलटे रिपोर्टर का इंटरव्यू ले डाला। आखिर में 'अब मैं वैसी नहीं रही हूं। चोटी भी बनाने लगी हूं...´ और सॉरी कहकर फोन रख दिया। रिपोर्टर ने जैसे-तैसे इसी मुद्दे पर एक अलग एंगल से स्टोरी तैयार की। विज्युअल के लिए डिजाइनर के पास गई तो वहां भी हंसते हुए मेरी ओर इशारा कर दिया गया। अपन को हंसी के साथ खूब गुस्सा भी आया। एक स्टोरी क्या लिख दी। अपन को समलैंगिक लोगों का स्पेशलिस्ट राइटर मान लिया गया कि फोटो, कॉन्टेक्ट, मैटर...सब मेरे पास उपलब्ध हो।
कुछ देर बाद रिपोर्टर से पूछा-कैसी रही स्टोरी? जवाब मिला-पसीना आ गया। सवाल पूछने वाले को भी शक की नजर से देखते हैं।
उनकी बात से महसूस हुआ कि ऐसे मुद्दे पर बायलाइन मिलना किसी पाप से कम नहीं। आज की खबर से मानवाधिकार दिवस पर छपी मेरी एक स्टोरी का भी खयाल आया। किन्नरों पर की वह स्टोरी 'खंडित वजूद´ जितनी पसंद की गई, उससे ज्यादा नेगटिव कमेंट भी मिले। 'हम हिजड़ों की स्टोरी नहीं पढ़ते...´ ऐसे कमेंट भी हुए। थोड़ा गुस्सा आया, लेकिन किन्नरों के इंटरव्यू के दौरान कही बात याद आई कि किन्नरों से नफरत करने वाले लोग भूलें नहीं कि लैंगिक विकलांग संतान तो किसी को भी पैदा हो सकती है। ऐसे कमेंट करने वालों को भी। तभी एक किन्नर ने दुख जताते हुए यह भी कहा था कि समलैंगिक लोगों के प्रति तो हमदर्दी जताई जा रही है, जबकि उन्हें भगवान ने स्त्री या पुरुष रूप में संपूर्ण भेजा है। उनकी विकृति तो मानसिक है। उन्हें इलाज की जरूरत है। किन्नरों की विकलांगता लैंगिक है और जन्म से भी, जिसमें उनका कोई दोष नहीं। क्यों सभी उनसे नफरत और भय का भाव रखते हैं। ...जवाब देंगे?

11 comments:

विवेक सिंह said...

विचारणीय मुद्दे हैं जो सोचने पर मजबूर करते हैं !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अच्छा लेख है।
बधाई।

sandhyagupta said...

Aapka lekh sochne ko majboor karta hai.

दिगम्बर नासवा said...

ऐसे मुद्दे सोचने को मजबूर करते हैं........

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah....

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

''खबरदार '' पर प्रशंसा पूर्वक टिपियाने का हार्दिक आभारी हूँ और सबसे बड़ी बात एक पत्रकार ने देखा मन धन्न-धन्न हुआ | खैर यह तो मेरी बात अब आप जैसे गंदे बच्चे की बात
शैली बड़ी गन्दी प्रवाह महागन्दा विषय धुर गन्दा वैसे बच्चे गंदे भी प्यारे लगते है जो प्रश्न आप ने किया है उसका उत्तर दे रहा हूँ
वास्तिकता यह है कि 'अतिथि देवो भवः ' कि भावना के अर्न्तगत हर आक्रमण कारी आततायी को अपनी दुर्बलता छिपाने के लिए अतिथियों की श्रेणी रख उनकी चाटुकारिता हेतु उनकी मान्यताएं और उनके निषेध अपना कर उनके निकट होने का दंभ पालते रहे ,वरना क्या कारण था जिस वृहन्नला के रूप का उपयोग अर्जुन ने पांडवों के अज्ञात वास के समय अपनाया तथा महल में रह कर राजकुमारी उत्तरा को नृत्य-गान विद्या की शिक्षा देते थे और जिसे राजा विराट ने अपने छद्म रूप दरबारी युधिष्ठिर की संस्तुति पर , कौरवों द्वारा गौओं का हरण करने पर उनके विरुद्ध युद्ध हेतु राजकुमार उत्तर के साथ उसके सारथि के रूप वृहन्नला रूपी अर्जुन को भेजना स्वीकार किया | यह गाथा स्पष्ट करती है की थर्ड जेंडर को भारतीय सभ्यता में कभी भी निकृष्ट एवं घृणित नहीं मानावास्तव में वह भारतीय सभ्यता थी न कि ये जिसे गंगा - जमुनी संस्कृति जो वास्तव में ' एक दोगली संस्कृति है | और उसी श्रेणी में यह ' गे कलचर ' उसी ढोंगी दोगली संस्कृति की परिचायक है | आज ही समाचार पत्र में पढ़ा की डी यु जिसे मैं दिल्ली युनिवर्सिटी ही समझ रहा हूँ के कोई एक प्रोफेसर बत्रा अपने लिए बहु तलाश में है परन्तु उन्हें अपने बेटे के लिए कोई कन्या नहीं एक 'स्त्रैण ' लड़का चाहिए ,अब यह सोच लें की ऐसा शिक्षक अपने छात्रों को कैसी शिक्षा देगा ? उसके शिष्य कितने संस्कारी होंगे ?
कृपया अवश्य अवलोकित करें :----
" स्वाइन - फ्लू और समलैंगिकता [पुरूष] के बहाने से "

vishal said...

nice one bro...............

raj said...

nice post.....

राजीव जैन Rajeev Jain said...

अच्छा लेख

kalaam-e-sajal said...

Good write-up. Good subjects picked up and rightly dealt with. Ammazing photography. Keep on clicking. KEEP ON WRITING.

JAGMOHAN RAI

kalaam-e-sajal said...

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