Wednesday, July 29, 2009

जवाब मिल गया है...


कुछ सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। स्वयं का अनुभव है कि कोई सवाल परेशान कर रहा हो तो भगवान से उसका जवाब मांगें। देर हो सकती है, लेकिन खुली या बंद आंखों में ख्वाब बनकर ऊपर वाला जवाब जरूर देता है। ...खैर, यह ख्वाब से जवाब का अनुभव कुछ व्यक्तिगत है, इसलिए नहीं बता सकता। हां, एक बहुत पुराने सवाल का हल शायद मिल गया है। लगभग दो महीने पहले बेस्ट फ्रेंड था तो एक छोटी-सी पोस्ट के जरिए सभी ब्लागर्स से यह जानने की कोशिश की कि दोस्ती है क्या? दुख हुआ कि बिना पढ़े टिपियाने की आदत से मजबूर बंधुओं ने ई-मेल और ब्लॉग पर टिपियाने की औपचारिकता पूरी की। नतीजतन, वह सवाल सिर्फ सवाल ही रह गया। अब इतवार को फ्रेंडशिप-डे है तो स्टोरी के लिए कुछ लोगों के इंटरव्यू किए। 'दोस्ती´ पर न जाने कितना कुछ सुनने के बाद भी यूं लगा कि जवाब नहीं मिल पा रहा है। डेली न्यूज की बुधवारीय पत्रिका 'खुशबू´ में संपादक वर्षा भंभाणी मिर्जा की पाती की कुछ पंक्तियों से जैसे जवाब मिल गया है। उस पाती का एक अंश कुछ यूं है...
...दोस्ती ऐसा अनूठा भाव है जो इस दुनिया को जीने लायक बनाता है। दोस्ती वह कंधा है, जो हर मुश्किल में मजबूत सहारा देता है। एक ऐसा दिल है, जहां आपकी सारी परेशानियां गहरे कुएं में दफन हो जाती है। ऐसा दिमाग है जो आपको तकलीफों के हल यूं सुझाता है जैसे कोई जादूगर अपने रुमाल से सफेद कबूतर निकालता है। यकायक भीतर से आवाज आती है कि ऐसा दोस्त आजकल मिलता कहां है...सब किताबी बातें हैं... मतलब के यार हैं सब... लेकिन क्या आपने कभी ऐसे दोस्त बनाने की कोशिश की है? किसी के आगे इतना समर्पण किया है? दोस्ती ऐसा ही समर्पण चाहती है। भक्त का भगवान के सामने जो समर्पण है, वैसा ही। अहं को त्याग जिस तरह एक सच्चा भक्त मंदिर में दाखिल होता है, वैसा प्रवेश अगर सखा के सामने हो तो मित्रता की सूरत कुछ और होगी। बेशक यह चयन आपका है...।

अब तक मिले जवाबों में मुझे यह बातें ज्यादा मन को छूने वाली लगी। किसी की राय इससे इतर भी हो सकती है। बिना पढ़े टिपियाने की बजाए कुछ और बेहतर बताएंगे तो अच्छा लगेगा। शुक्रिया...

4 comments:

राजीव जैन Rajeev Jain said...

gud

raj said...

chiliya jwab mila to sahi....or jwab hai bhi sahi.....

दिगम्बर नासवा said...

आज के समय में ऐसा दोस्त मिलना मुश्किल है..........

Linkpartner said...

Hi Frnd,

Jaisa ki aap kah rahe the ki apko dosti ka matlab jaanna hai aur uske liye apne kai logon se jaanne ki kosis bhi ki aur apko jabab mila to ek patrika jiska naam "khusbhu" hai. lekin main us jabab se santust nahin hua mujhe laga ki ab kuch aur shesh hai. So suniye dosti wo cheese hai jiska bhavnatmak bhi bakhan nahin kiya ja sakta. main aisa nahin kah raha hun ki jisse kahin ahm najar aye main kebal apko jabab dene ki kosis ker raha hun. jahan tak mera khayal hai main dosti ko ek fool ki khusbu samajhta hun. agar fool se khusbu ko alag ker diya jaye to fool ka koi mahtwa nahin rah jata. usi prkar dosti wo sambandh hai jo sakla aur surat, unch-neech, chota bada dekh ker nahin kiya jata wo to do atmao ka milan hota hai. ya youn kahiye ki 2 sarir aur ek atma hoti hai. aap kisi per apni jaan ko newchawar to kerke dekhiye bina kisi swarth ke to sacchi dosti kya hoti hai yeh apko aur sansar ko bhi malum ho jayega. aap aisa kyon sochte ho ki duniya main acche dost nahin milte lekin aisa kyon nahin kahte ki mujhse kharab dost hai hi kaun. apne suna hoga ki yadi aap ek ungli kisi ki taraf uthate ho to char unliya apki taraf hoti hai. so pahle khud acche bano to apko dost bhi acche milenge. Appko agar meri baat buri lage to maaf kerna lekin sach kadwa hota hai yeh aap bhi jaante ho.

apka mitra

Rajesh Prajapati