Wednesday, December 9, 2009

हंगर ज़ीरो


कल मानव अधिकार दिवस है।
हम कैसे इस दिवस को मना सकते हैं जब हम लोगों को दो जून की रोटी नहीं दे पाए हैं। इस निजाम ने तो इनसान के निवाले छीनने शुरू कर दिए हैं। दाल-रोटी के ही दाम आसमान चीरते जा रहे हैं। अधिकारों की बात तो तब हो, जब पेट भरा हुआ हो।
महंगाई का ग्राफ घर की लक्ष्मियों के ही प्राण हर रहा हो तो कल्पना कीजिए उस गरीब की जिसकी आय में कोई स्थिरता नहीं है।
सामर्थ्यवान मॉल्स-रेस्त्रा में हजारों रुपए का बिल भले ही चेहरे पर शिकन लाए बिना चुका देते हैं, लेकिन मेहनतकश को एक-एक रुपया भी माथे पर बल डालकर देते हैं, वह भी उसका पसीना सूखने के बाद...


अजमेर रोड के किनारे झुग्गी के बाहर बैठी सरिता को नहीं मालूम कि उसे आज रात का खाना नसीब होगा या नहीं। बढ़ती महंगाई ने आम आदमी का बजट तो बिगाड़ा है, साथ ही भीख मांगकर गुजारा करने वालों का निवाला भी छीन लिया है। सरिता कहती हैं कि अब लोग रोटी गिनकर बनाने लगे हैं। सब्जी भी उतनी बनाते हैं, जितनी जरूरत। बासी रोटी-सब्जी बचती नहीं और हमें खाली हाथ लौटना पड़ता है। सरिता जैसे न जाने कितने लोग आधा पेट भरकर संतोष करते हैं या किसी रोज भूखे पेट सोना भी उनकी मजबूरी है। कल मानवाधिकार दिवस है। जब तक देश का एक भी नागरिक भूखे पेट सोने पर मजबूर है, तब तक बाकी मानवाधिकारों की बात करना बेमानी ही है। 'दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओं' जैसे मुहावरे भी आज आम आदमी की पहुंच से दूर हो गए हैं, क्योंकि दालें अब 90 रुपए तक पहुंच गई हैं। चीनी के दोगुने हुए दामों ने आम आदमी की जिंदगी में बची मिठास भी गायब कर दी है। राशन कार्ड पर कुछ किलो दाल, चावल मुहैया करवाकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। हंगर जीरों और प्रत्येक नागरिक को सम्मान के साथ भोजन देने की घोषणाएं अभी दूर दिखाई देती हैं, लेकिन बढ़ती महंगाई ने आम आदमी को पेट काटने पर मजबूर कर दिया है। भीख मांगकर गुजारा करने वालों से लेकर बिजनेस क्लास फैमिली तक महंगाई के जैसे सवाल पूछे तो दर्द शब्दों में फूट पड़ा...
नहीं मिलता बासी खाना
दो बच्चों की मां अनुराधा परेशान है। कई दिन हुए घर का चूल्हा नहीं जला। भीख में रोटी की जगह आटा-दाल देने वाले लोग अब महंगाई के ताने देने लगे हैं। अनुराधा कहती हैं कि पहले रोटी नहीं मिलती थी तो घरों से मिले आटे से खुद खाना बनाकर पेट भरते थे पर अब लोग हमें आटे-दाल का भाव सुनाकर भगा देते हैं। खुद तो कभी भूखे भी रह सकते हैं, लेकिन छोटे बच्चों को तो खाना खिलाना ही है। मेरे पति गलियों में झूला चलाते हैं। अब लोग रोटी-सब्जी की बजाए एक-दो रुपए दे देते हैं पर इतने पैसों से खाने का कुछ भी नहीं मिलता। पंद्रह-बीस लोगों से मिली चिल्लर से आटा खरीद लें तो उसे पकाने व सब्जी की समस्या रहती है। घरों से कुछ नहीं मिलता तो मंदिर-गुरुद्वारे से मिल जाता है। दूध के भाव भी बढ़ गए हैं तो बच्चे का दूध कम कर दिया है। चीनी महंगी हुई तो अब नहीं खरीदते। प्रसाद में बताशे मिलते हैं, उन्हें कूटकर दूध में मिला देती हूं। कभी कोई सदस्य बीमार हो जाए तो आफत आ जाती है। दवाई खरीदने में ही जान निकल जाती है।
अब घर कैसे जाएं
चार साल पहले झारखंड से परिवार सहित जयपुर आकर बसी बसंती देवी घरों में बाई का काम करती हैं। पति चौकीदारी करते हैं। दो बेटे व दो बेटियां हैं। वे बताती हैं हम दोनों की कमाई से पहले मकान का किराया, बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च चल जाता था, लेकिन बढ़ी महंगाई ने जैसे खुशियां ही छीन ली हैं। पहले हम सभी हर छह महीने बाद परिवार से मिलने झारखंड जाते थे, लेकिन अब इतनी बचत नहीं हो पाती कि घर जाने के लिए किराया जुटा सकें। इसी कारण अब तय किया है कि सालभर से पहले गांव नहीं जाएंगे। बेटे ने देखा कि महंगाई के कारण अब घर चलाना मुश्किल हो रहा है तो उसने पढ़ाई छोड़ दी। अब वह दवाई की फैक्ट्री में काम करता है। इससे कुछ आर्थिक मदद तो मिली पर उसकी पढ़ाई छूटने से मन बहुत दुखी है।
बच्चों की पढ़ाई में कटौती
हम दोनों पति-पत्नी झाड़ू-बुहारी करके तीनों बेटों को खूब पढ़ाने-लिखाने का सपना संजोए थे, लेकिन बढ़ती महंगाई ने परेशान कर दिया है। सफाईकर्मी सीमा डंगोरिया कहती हैं कि बेटों की परीक्षाएं नजदीक हैं तो सोचा था कि बच्चों को ट्यूशन दिलाऊंगी पर अब यह मुश्किल लगता है। डर है कि कहीं बच्चों की पढ़ाई बीच में ना रुकवानी पड़े। आटा, दाल, चीनी, सब्जी के भाव बढ़ने से रसोई पर संकट आ गया है। बाकी चीजों के बिना गुजारा हो सकता है, लेकिन रोटी खाए बिना तो नहीं रह सकते। सब्जी महंगी थी तो दाल-चावल से काम चलता था पर अब तो दालों के भाव भी आसमान छू रहे हैं। कीमतें बढ़ानी हों तो अमीरों के काम आने वाली चीजों की बढ़ाएं। वे लोग तो अपनी बचत व फालतू खर्च में कटौती कर सकते हैं, लेकिन गरीब दो वक्त की रोटी भी नहीं खाएगा फिर काम कैसे करेगा।
लौटना पड़ा काम पर
तीन साल पहले तक कीर्ति एक स्कूल में पढ़ाती थीं। मां बनने के बाद उन्होंने जॉब नहीं करने का फैसला किया। कीर्ति बताती हैं कि मैं अपना पूरा ध्यान बेटे की परवरिश पर देना चाहती थी, लेकिन महंगाई बढ़ने से घर का बजट बिगड़ने लगा था। बेटे का स्कूल में एडमिशन करवाया तो बढ़ती फीसों से सिर चकराने लगा। यहीं आकर मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा और मैंने दोबारा जॉइन की। इससे बच्चे को कुछ कम टाइम दे पाती हूं, लेकिन अब जॉब करना बहुत जरूरी हो गया है। पति प्राइवेट जॉब में हैं। दोनों मिलकर मैनेज कर रहे हैं। मुझे हैरानी होती है कि मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी चीजों के दाम बढ़ाकर आम आदमी का जीना दूभर क्यों किया जा रहा है। सरकार चाहे तो इलेक्टि्रक आइटस और लग्जरी चीजों के दाम बढ़ाए, ताकि आम आदमी पर असर नहीं पड़े।
मनोरंजन की छुट्टी
आर्थिक रूप से संपन्न होने का मतलब यह नहीं कि महंगाई बढ़ने से कुछ असर ही ना पड़े। सोसायटी के साथ खुद को अपडेट रखना जरूरी होता है, लेकिन महंगाई बढ़ने से मैनेज करना मुश्किल हो गया है। हाउसवाइफ रेणुका शर्मा बताती हैं कि रसोई महंगी हुई है, लेकिन छोटे बच्चे हैं और हेल्थ के साथ समझौता नहीं कर सकते, इसलिए खाने में कटौती नहीं की। पहल पूरी फैमिली हफ्ते में एक-दो मूवी देखती थी, वीकेंड पर घूमने निकलते थे, वहीं अब ऐसे मनोरंजन के खर्च कंट्रोल कर लिए हैं। पति बिजनेसमैन हैं। उनसे कहा है कि वे पॉकेटमनी बढ़ाएं।

3 comments:

परमजीत बाली said...

महँगाई की सच्ची तस्वीर दिखा दी आपने। सच है सभी पर इस का असर पड़ा है।

अन्तर सोहिल said...

एक-एक सीन सार्थक है। एकदम सच्ची पोस्ट।
आपने काफी दिनों आये हैं।

प्रणाम स्वीकार करें

योगेश स्वप्न said...

bhai aapke lekh ne jhakjhor diya, bilkul satya likha hai,