Thursday, January 7, 2010

मैंने किसी का दिल दुखाया है...


दो रातों से सोया नहीं हूं। मैंने किसी का दिल दुखा दिया है, क्योंकि वही दिल मुझे बेवकूफ बनाता है। मेरी आंखों में आंसू लाता है। एक बार नहीं, बार-बार। कितनी बार माफ करूं। हर बार यही सोचता हूं कि एक मौका और...पर इस बार नहीं...। भरोसा टूटता है फिर जुड़ता है पर इतनी दरारें अच्छी नहीं। कुछ इतना बुरा हो कि दिलों में नफरत पनप उठे, इससे तो अच्छा है कि दूरियां बन जाएं। उसी की दोस्त के ऑरकुट प्रोफाइल में पढ़ा कि किसी के लिए कितना ही कर लो, कम पड़ ही जाता है...। रात को घड़ी देखते, एफएम सुनते, आंखें नम...। खुद से बातें होती हैं कि दो दिन हो गए, अब मुझे मान जाना चाहिए पर अगले ही पल खयाल आता है कि ऐसे मानने से क्या होगा कि फिर दुखी होने के लिए खुद को पेश करना...
पागलों की तरह खुद से यूं ही बड़बड़ाता रहता हूं। आज जल्दी ऑफिस आना था। आते ही एक प्रेम कहानी टाइप करने को मिल गई। लेखक की सच्ची कहानी। मुझे लगता है कि हर कहानी सच्ची होती है, बस यूं ही लिखने वाले 'यह कहानी और इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं' जैसी बातें लिख देते हैं।
इस कहानी की एक लाइन थी-'मैंने तीन दिन से कुछ नहीं खाया, फिर लोग रसोई क्यों बनाते हैं?'
बहुत दर्द है इस लाइन में पर इसे वही समझे, जिसके पास दिल हो। मैंने भी कहा, अब तक मैंने गर्म कपड़े नहीं पहने, फिर लोग क्यों गर्म कपड़े खरीदते हैं। ठंड दिनोंदिन बढ़ रही है। मुझे तो वैसे भी ठंड ज्यादा लगती है। पिछले साल तक ठंड में इनर के अलावा दो-दो जींस पहनने वाला इस बार सर्दी के कपड़े पैक कर चुका हूं। ऑफिस में किसी ने बोला-तुहें ठंड नहीं लगती? झूठी मुस्कान के साथ मैंने भी झूठ बोल दिया-सुबह इतने गर्म पानी से नहाता हूं कि वो गर्मी दिनभर ठंड का अहसास ही नहीं होने देती।
कैसे बताता उसे असली कारण। बताऊं भी क्यों, जब मम्मी को नहीं बताया। दो दिन पहले फोन पर उनसे बतियाते हुए रुलाई फूट पड़ी तो फोन काट दिया। स्विच ऑफ कर दिया। घंटे बाद ऑन किया तो पहला फोन घर से। मां है न, सब समझ जाती है। बोलीं-रोया क्यों, फिर कुछ हुआ क्या?
मैंने फिर झूठ बोला-नहीं, चार्जिंग खत्म हो गई थी। अब फोन रखो, मुझे नहाने जाना है। नहाकर निकला, तब तक कुछ कॉल्स मोबाइल पर मिस हो चुकी थी। उसकी नहीं, जिसके कारण रोया, सभी कॉल घर से थी। काश...उसकी होती। खुद को चपत लगाकर बोला-आय एम मजबूत मैन।
मजबूत मैन इसलिए, क्योंकि अंग्रेजी में हाथ तंग है। मजबूत का अंग्रेजी शब्द ध्यान नहीं आया। ठंडे मारबल के फर्श पर गीला तौलिया लपेटे पूजा करते हुए भगवान में ध्यान नहीं लग रहा था। ठंड से कंपकंपी छूटते आंखों में पानी आ गया है। लग रहा था कि अगले पल जान निकल जाएगी। काश, निकल जाती...
तुमसे ना मिलके खुश रह पाएंगे,
वो दावा किधर गया...
दो रोज में गुलाब सा चेहरा उतर गया...

14 comments:

tarun said...

kya ho yaarrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr

चण्डीदत्त शुक्ल said...

बहुत मार्मिक पोस्ट. पूरी पढ़ गया एक बार में ही.
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ऐसा अक्सर होता हैजुनून-ए-इश्क में, उनकी परछाईं भी ना पड़े चाहते हैं हम, जिनकी पलकों तले जीना चाहा था हमने...।

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वक्त लगेगा, सब ठीक हो जाएगा...दुआ.

निर्मला कपिला said...

रे ये क्या गन्दे बच्चे तुम रोते क्यों रहते हो बहुत दिन बाद तुम्हारा ब्लाग नज़र आया रोया मत करो ये ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है। आशीर्वाद्

alka sarwat said...

पागल
पोस्ट पढ़ के तो मुंह से यही निकला इसलिए यही कमेन्ट कर दिया

somadri said...

aansuon ko fijul me na bahaya karo..

sudhakar soni,cartoonist said...

tumne to bali umar me bada rog pal liya yaar .tumhe to samjhane ki bhi ichha nahi hoti...itne samajhdaar hoyaar phir bhi ..........tum to unke laghu sanskaran ho jinke blog par samjhdaari wali tippni kar ke aaye the

Dileepraaj Nagpal said...

शुक्रिया...इन कुछ कमेंट्स के अलावा बहुत-से और भी कुछ सुनने को मिला। ज्यादा कुछ नहीं, सभी से बस इतना ही कि...
मुंह की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन
आवाजों के बाजारों में खामोशी पहचाने कौन...

preeti pandey said...

aapka article bhaut hi achha laga, aapke features yakinan acche hai, main bhi feature writer hun kripa mere blog par bhi apni drishti daale,
www.merikoshish.blogspot.com

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डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

प्रिय दिलीप भाई ,तुम्हारा ब्लॉग बहुत गहरे तक छू गया मन को ,पत्रकारिता मे इतनी अनुभूतियाँ ,बहुत संवेदनशील हो ,इतने कि तुम्हारी भावनाएं मेरी हो लीं /अपना सेल न. देना ,तुम जैसे दुर्लभ व्यक्ति से बात करने को जी हो रहा है /मेरा न. ९४२५८९८१३६ /निरंतर लिखते रहें ,आप मे बहुत गहरे दिखती है मुझे /हार्दिक शुभ कामनाएं ,स्नेह /आपका ही ,
डॉ.भूपेन्द्र रीवा ,एम् पी

अवनीश सिंह said...

कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया
सुन्दर प्रस्तुति

इंदु पुरी said...

सचमुच गंदे बच्चे हो.जिन्हें हमारी और हमारे फीलिंग्स की कद्र नही उन्हें अपने जीवन से हमेशा के लिए बाहर कर देना चाहिए.समझे. और २०१० के बाद एक भी पोस्ट नही डाली,गलत बात.